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Ear Diseases and Treatment – कानों के रोग एवं ईलाज |

Ear Diseases से हमारा अभिप्राय कान के रोगों यानिकी बीमारियों से है हालांकि शरीर में जितने भी अंग हैं उन सबकी अपनी एक अहम् भूमिका होती है और किसी एक अंग के बिना भी जीवधारियों का शरीर अधूरा लगता है | लेकिन इन सबके बावजूद किसी भी जीव के शरीर में कान अर्थात Ear नामक इस अंग की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है | इसलिए अक्सर होता क्या है की जब कोई भी व्यक्ति कान की समस्याओं अर्थात Ear Diseases problem से जूझता है तो तब उसे उस अंग की अहमियत का अंदाज़ा अधिक होता है और वह व्यक्ति कैसे भी करके उस रोग अर्थात बीमारी से मुक्ति पाना चाहता है ताकि यह रोग रोज रोज उसे परेशान न कर सके और वह अन्य क्रियाकलापों में अपना ध्यान लगा सके | हालांकि आज हम अपने इस लेख Ear Diseases and Treatment in hindi के माध्यम से कान के कुछ सामन्य रोगों एवं उनके ईलाज के बारे में जानने की कोशिश करेंगे लेकिन उससे पहले यह जान लेते हैं की यह कान मानव शरीर में कार्य कैसे करता है |

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कान कैसे कार्य करता है |

मानव शरीर में निर्मित कान शरीर का ऐसा जटिल अंग है जिसमें लगभग एक घन इंच में रिसीवर बनाया गया होता है । यह एक नली जिसे Eustachian tube कहते हैं के माध्यम से  नाक व गले से भी जुड़ा हुआ होता है, जिस कारण गले व नाक के रोगों से भी शरीर का यह अंग कान प्रभावित होता रहता है । सामान्यतया कान का जो बाहरी छेद हमें दिखाई देता है उस छेद से लगभग एक इंच गहराई पर कान का पर्दा होता है जो अंदर तीन छोटी छोटी सुनने की हड्डियों से जुड़ा हुआ होता है । कान का पर्दा व ये छोटी छोटी हड्डियां ही आवाज की Intensity को बढ़ाकर अन्त:कर्ण यानिकी कोकलिया तक पहुंचाती है जहां यह विद्युत तरंगों में बदल दी जाती है और नसों अर्थात Nerves द्वारा दिमाग तक पहुंचाई जाती हैं | उसके बाद जब यह विद्युत् तरंगे दिमाग तक पहुँच जाती हैं तब दिमाग अपने अनुभव के अनुसार उनका मतलब समझता है, और उसी आधार पर मनुष्य प्रतिक्रिया करता है ।

कानों के रोग एवं ईलाज (Ear Diseases and treatment in Hindi):

कान की कुछ बीमारियाँ जन्मजात भी होती हैं लेकिन जन्मजात बीमारियों के अलावा कान के रोग चोट लगने या इंफेक्शन के कारण भी होते हैं, इनमे कुछ मुख्य Ear Diseases अर्थात कानों के रोगों की सूची एवं उनका ईलाज निम्नवत है ।

  1. कान में मैल जमना :

कान में मैल जमना कानों के रोग में एक सामान्य सा रोग है कान में मैल जमने के निम्न लक्षण हो सकते हैं |

  • कान में मैल जमने के कारण कान में भारीपन हो सकता है |
  • सांय-सांय या मैल फूलने के कारण दर्द की शिकायत भी हो सकती है ।

कान में मैल जमने का ईलाज:

कान से मैल को हटाने के लिए कान में मैल नर्म को नरम करने वाली दवाइयां जैसे Waxrid, NoWax इत्यादि दिन में पांच-छह बार चिकित्सक की सलाह पर डालनी चाहिए व 4-5 दिन बाद कान भी साफ करना चाहिए । यदि कान साफ न हो पाए तो फिर से विशेषज्ञ को दिखा कर मशीन (Suction) या छोकर (Syringing) से साफ करवाया जा सकता है | लेकिन ध्यान रहे राह चलते कनमैलिए से कान साफ करवाने पर कर्णनालिका या परदे को नुकसान हो सकता है इसलिए इनसे कान साफ़ कराने से बचें ।

कान में फफूंद लगना (Otomycosis):

कान में फफूंद लगने को Otomycosis कहा जाता है, किसी भी व्यक्ति के यदि नहाते समय कान में पानी चला जाए तो सीलन के कारण हवा में उड़ते फफूदी के बीज (Spores) कान में फफूंद लगने का कारण बन सकते हैं । जिसके निम्नवत लक्षण दिखाई दे सकते हैं |

  • कान में फफूंद लगने से कान में खारिश हो सकती है |
  • कान में दर्द हो सकता है |
  • प्रभावित व्यक्ति के सुनने में कमी हो सकती है |
  • कान में पानी आना जैसे अन्य लक्षण हो सकते हैं ।
  • कान में काला, सफेद गीले कागज जैसा गंद निकल सकता है ।

कान में फफूंद अर्थात Otomycosis का ईलाज:

कान में फफूंद के ईलाज के लिए  चिकित्सक द्वारा कान की सफाई करने के बाद कान में फफूंद रोकने की दवाइयां जैसे Raystart, Raybiotic, Rathcure इत्यादि Ear Drops दिन में तीन बार लगभग तीन चार हफ्ते तक प्रयोग करने को कहा जा सकता है । बीच में 5-6 दिन बाद मशीन से सफाई करते रहने को भी कहा जा सकता है । इसके ईलाज में देर करने पर कान का परदा भी गल सकता है, यदि कान के फफूंद का पूरा इलाज न हो तो जीवन भर इस बीमारी का खतरा बना रहता है मुख्य रूप से बारिश के मौसम में इसका खतरा और अधिक हो जाता है ।

कान के अन्दर कुछ फँस जाना:

इस Ear Diseases अर्थात कानों के रोग में कभी कभी अचानक बड़ों के कान में भी कुछ कीट पतंगे मच्छर इत्यादि चले जाते हैं लेकिन छोटे बच्चे तो अक्सर कान में कुछ छोटी-छोटी चीजें कभी भी फंसा लेते हैं ।इसलिए यदि व्यक्ति अपने आप उसे निकालने की कोशिश करेगा तो वह और भी गहरी जा सकती हैं व परदे को नुकसान पहुंचा सकती है । अत: जब तक पूरा विश्वास न हो बिना विशेषज्ञ के खुद निकालने की कोशिश न करें । इसलिए प्रभावित व्यक्ति को तुरंत किसी विशेषज्ञ के पास जाना चाहिए क्योंकि अपने अनुभव व उपकरणों के माध्यम से चिकित्सक उस जीव को आसानी से निकालने में कामयाब हो पायेगा | इसके अलावा चिकित्सक यह भी देखेगा की यदि कान में कोई जिंदा जीव (कीट, पतंगा, मच्छर) आदि घुसकर तंग तो नहीं कर रहा है यदि ऐसी स्थति है तो चिक्सित्सक द्वारा मरीज को लिटाकर कान में साफ तेल, एंटीबायोटिक Ear Drops इत्यादि डाली जा सकती है । क्योंकि एंटी बायोटिक के कारण दम घुटने से जीव मर जाएगा व फिर विशेषज्ञ उसे कान से उपकरणों एवं अपने अनुभव की बदौलत तुरंत निकलवा देगा ।

  1. कान में मवाद आना:

कान से मवाद आना भी एक Ear Diseases अर्थात कानों का रोग है अक्सर होता क्या है की यदि गले या नाक की बीमारियों में लापरवाही बरती जाय तो इस स्थिति में मवाद Eustachian tube से कान तक पहुंच कर परदे को गलाकर कान से बाहर निकलने की कोशिश करता है । हालांकि यदि मरीज को कान का दर्द होता है तो इस स्थिति में चिकित्सक द्वारा कान में कोई दवा नहीं डाली जाती है | बल्कि कुछ एंटीबायोटिक  दवाएं जैसे Capsule Novamax 500 Mg या Tablet Bacholeu 625 mg इत्यादि दी जा सकती हैं | लेकिन जब दर्द कम हो जाता है या बिलकुल बंद हो जाता है तो चिकित्सक द्वारा मरीज को कुछ एंटीबायोटिक Ear Drops जैसे Amoflox-d, Caplox, Rajtrine कान में डलवाने को दी जा सकती हैं | जब कान सूख जाए और सुनने में कमी का आभास हो तो मरीज को किसी विशेषज्ञ से मिलना चाहिए । कानों की दूरबीन जांच व सुनाई जांच के बाद विशेषज्ञ यह बताने में समर्थ हो पाएंगे की परदे का घाव दवाओं से भर सकता है या इसके लिए कानों के आपरेशन की आवश्यकता होगी । कोई भी Ear Diseases अर्थात कानों के रोग हों इनके होने पर यदि संक्रमण को समय पर न संभाला गया तो हड्डी भी गलनी शुरू हो सकती है व कुछ मरीजों में बीमारी दिमाग तक पहुंच कर जानलेवा भी साबित हो सकती है ।

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Ear Diseases अर्थात कानों के रोग का यदि समय पर ईलाज या आपरेशन करवा लिया जाए तो खर्चा व खतरा दोनों कम होते हैं | वर्तमान में अत्याधुनिक मशीनों जैसे Operating microscope, Micromotonal, Biprarlaetin की मदद से अधिकतर आपरेशन सफल ही होते हैं ।

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