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कान की बनावट ear-structure-and-functions

कान की बनावट एवं कार्य – Ear Structure and Functions in Hindi.

कान की बनावट पर वार्तालाप करने से पहले यह जान लेना बेहद जरुरी है की कान भी मानव शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है वैसे तो प्रकृति ने हर जीव को बड़ी सोच समझकर बनाया है और उन्हें उसी आकार प्रकार के अंग प्रदान किये हैं लेकिन मनुष्य प्रकृति की एक अदभुत रचना है जिसे प्रकृति ने सबसे अलग ढंग से बनाया है | आज हम हमारे इस लेख के माध्यम से मानव के कान की बनावट एवं उसकी कार्यप्रणाली को समझने की कोशिश करेंगे |

कान की बनावट ear-structure-and-functions

पूरा आर्टिकल (लेख) एक नज़र में.

कान की बनावट:

शरीर के जिस अंग अर्थात इन्द्रिय से हम सुनते हैं उसे कान या श्रवेणन्द्रीय कहा जाता है | कान की बनावट में कान के मुख्यत: तीन भाग होते हैं |

बाह्य कर्ण: सामान्य भाषा की यदि हम बात करें तो वास्तव में बाह्य कर्ण को ही कान के नाम से जाना जाता है, यह कान के छेद के चरों तरफ सीपों की तरह एक भाग होता है जिसमे बालियाँ इत्यादि पहनी जाती हैं इसे कर्णशुश्कुली कहते हैं | कर्णशुश्कुली में एक गड्ढा होता है जो कपाल के अन्दर चला जाता है उसे श्रवणनलिका कहते हैं |

मध्यकर्ण: यह एक छोटी से कोठरी होती है इसकी बाहर की दिवार पर एक पर्दा सा लगा रहता है जिसे कर्णपटल कहते हैं | मध्यकर्ण में तीन छोटी छोटी हड्डियाँ मुदगर, नहाई और रकाब आपस में जंजीर की तरह जुड़ी रहती हैं |

अंत: कर्ण: इसकी बनावट बड़ी पेचीदा है इसलिए इसे घोघाकार कर्ण या भूल भूलैया भी कहते हैं | इसमें तीन अर्धचन्द्राकार पलियां कर्णकुटीर और कोकलियां आदिभाग होते हैं | कोकलियां की शक्ल घोंघे जैसी होती है इसमें बहुत से छेद होते हैं जिनके द्वारा नाड़ियाँ भीतर जाती हैं | कोकलीयों के अन्दर ही श्रवण नाड़ी रहती है | इस श्रवण नाड़ी के दूसरे सिरे का सम्बन्ध मस्तिष्क से होता है |

कान की कार्यप्रणाली:

आवाज की तरंगे जो वायुमंडल में उत्पन्न होती हैं ये तरंगे कान के बाहरी भाग कर्ण शुश्कुली में एकत्रित हो जाती हैं, ये तरंगे श्रवण नलिका द्वारा कर्ण पटल से जा टकराती हैं, जिससे कर्ण पटल में गति उत्पन्न होती है | कर्ण पटल का सम्बन्ध मध्य कर्ण से होता है, इसलिए कर्ण पटल में कंपन होने से मध्य कर्ण की वायु में थरथराहट पैदा हो जाती है | फिर ये आवाज की तरंगे मध्य कर्ण की तीन छोटी अस्थियों मुदगर, नेहाई और रकाब को कंपा देती हैं | इन तीनों अस्थियों को कंपाकर, आवाज की तरंगे, झिल्ली निर्मित घोंघाकार कर्ण में होती हुई पहले कोकलियों से, फिर स्वास नाड़ी से जाकर टकराती है जिससे वात संवेदना पैदा होती है | यह वात संवेदना ब्रहतमस्तिष्क के श्रवण केंद्र में चली जाती है जिससे श्रवण क्रिया पूर्ण होती है इस प्रकार हमें शब्द सुनाई देते हैं यदि उपर्युक्त अंगों में से कोई भी अंग खराब हो जाय तो हम ठीक प्रकार से सुन नहीं सकते हैं |

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