काली खांसी (Whooping-Cough) के कारण लक्षण उपचार |

काली खांसी को अन्य नामों जैसे Whooping-Cough, परट्यूसिस एवं कुकुर खांसी के नाम से भी जाना जाता है । इस प्रकार की यह खांसी का प्रकार गंभीर खांसी के प्रकारों में सम्मिलित है इस प्रकार की खांसी से सामान्यत: श्वसन तंत्र यानिकी Respiratory System प्रभावित होता है | इस खांसी की यदि बात करें तो यह अधिकतर रूप से बच्चों को अपना निशाना बनाती है | अर्थात काली खांसी या Whooping-Cough बच्चों में पाया जाने वाला एक खतरनाक संक्रामक रोग है | इस रोग में प्रभावित बच्चे को बार बार खांसी के दौरे उठते हैं और लम्बी आवाज के साथ सांस आती है |

काली खांसी whooping cough

काली खांसी के कारण (Cause and reason of whooping Cough):

काली खांसी के कुछ मुख्य कारण इस प्रकार से हैं |

  • काली खांसी का मुख्य कारण Bordetella pertussis नामक जीवाणु होता है इसी जीवाणु के कारण यह रोग फैलता है ।
  • यह संक्रामक रोग अधिकतर पांच वर्ष से पन्द्रह वर्ष की उम्र तक के बच्चों को अपना शिकार बनाता है ।
  • काली खांसी नामक यह रोग अधिकतर सर्दियों में होता है ।
  • यह रोग रोगाणु बलगम, थूक, रोगी द्वारा इस्तेमाल किए गए सामान को दुसरे द्वारा प्रयोग में लाने से फैलता है ।
  • यह रोग कम जगह में अधिक लोगों के एक साथ रहने से भी फैल सकता है |

काली खांसी के लक्षण (Symptoms of Whooping Cough):

  • इस रोग के शुरूआती दौर में नाक से पानी बहना, छींकें आना, हल्का बुखार, भूख न लगना व कभी-कभी खांसी उठने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं ।
  • इस प्रकार के लक्षणों के बाद खांसी हो सकती जो धीरे-धीरे दौरे के रूप में परिवर्तित हो सकती है और इस प्रकार की खांसी रात के समय ज्यादा हो सकती है ।
  • यदि इस प्रकार की यह खांसी अर्थात काली खांसी एक दो सप्ताह से अधिक रहती है तो खांसी का दौरा पहले के मुकाबले जल्दी जल्दी होने के कारण या laryngeal spasm के कारण प्रभावित व्यक्ति का दम सा घुटने लगता है |
  • खांसी के बाद रोगी लम्बी सी ‘हूप’ की आवाज के साथ सांस लेता हुआ दिखाई दे सकता है । कभी कभी यह खांसी का दौरा इतना तेज हो सकता है की उस समय बच्चा उल्टी कर सकता है व कभी-कभी अचानक टट्टी-पेशाब निकल जाता है, नाक से खून निकलता है व जीभ काट लेता है और उसे दौरा भी पड़ सकता है ।
  • काली खांसी के दौरे के बाद कफ, नाक या मुंह से निकल सकता है, जिससे बच्चा बेहद थका हुआ सा महसूस करता है ।
  • जहाँ तक इस रोग के समयकाल का सवाल है यह लगभग एक से चार सप्ताह तक रह सकता है । उसके बाद खांसी कम हो जाती है पर धुंए आदि से एकदम से खांसी का दौरा पड़ सकता  है। जहाँ तक इस रोग की जटिलताओं का सवाल है उसमे ब्रोकोन्यूमोनिया, न्यूमोथेरेक्स, सर्जीकल एम्पाइमा, उल्टियां लगना, खून की उल्टी, आंख में खून आना,  हर्निया इत्यादि सम्मिलित हैं ।

काली खांसी का ईलाज (Treatment of Whooping Cough in Hindi)

काली खांसी का ईलाज करने के लिए शीर्ष श्वसन तंत्र से लिए गए ‘स्मीयर में जीवाणु की उपस्थिति का पता लगाया जा सकता है हालांकि शुरूआती लक्षणों से काली खांसी की पहचान मुश्किल होती है पर बाद में’ विभिन्न लक्षण इसकी पहचान में सहायक होते है । काली खांसी की पहचान के बाद इसके ईलाज के लिए निम्न सावधानियां बरती जा सकती हैं |

  • प्रभावित बच्चे को पानी, अन्य तरल एवं भोजन थोडा थोडा करके खाने को दें |
  • चिकने पदार्थ खाने में देने से परहेज करें |
  • यदि किसी बड़े को यह रोग है तो उन्हें बीड़ी-सिगरेट, तम्बाकू का सेवन करने से मना करें |
  • संक्रमण को रोकने के लिए चिकित्सक की सलाह पर टैब इरीथ्रोमाइसिन या कैप, टेट्रासाइक्लीन दे सकते हैं ।
  • सांस लेने में कष्ट होने पर चिकित्सक की सलाह पर ऐफिड़ीन दी जा सकती है ।
  • शुरूआती दौर में ही काली खांसी का यदि ईलाज किया जाय तो यह सफल होता है उसके बाद यह इतना लाभकारी नहीं रहता उसके बाद यह रोग अपना समयकाल पूरा करके ही ठीक होता है, हालांकि एक बार इसका ईलाज शुरू करने पर 12-14 दिन तक शुरू रखना चाहिए |
  • चूँकि यह एक संक्रामक रोग होता है इसलिए मरीज को चार से छसप्ताह के लि अलग  अलग रखा जा सकता है जब
  • जब तक की प्रभावित व्यक्ति की रिपोर्ट में कल्चर नेगेटिव न आ जाए |
  • जिन लोगों में काली खांसी के होने की संभावना हो उनमें वैक्सीन लगाये जा सकते हैं । O जिस बालक को पहले वैक्सीन न दे रखा हो उसे भी चिकित्सक की सलाह पर वैक्सीन जरुर दें इसकी एक खुराक एक हफ्ते बाद भी चिकित्सक के परामर्श के अनुसार दी जा सकती है
  • काली खांसी यानिकी Whooping Cough नामक इस बीमारी से बचने के लिए बच्चों को P.T की तीन खुराक एक एक महीने के अन्तर से दूसरे तीसरे एवं चौथे महीने में एवं बूस्टर एक साल व तीन साल पर दी जा सकती हैं ।

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