किडनी की पथरी कैसे बनती है? ईलाज एवं खानपान की जानकारी.

किडनी की पथरी की बात करें तो पेट के भीतर स्थित दो अंगों-गुर्दो एवं पित्ताशय (गॉल ब्लैडर) में पथरी का बनना आम बीमारी है । दोनों अंगों में पथरी बनने का कारण, उनके लक्षण और इलाज की विधियाँ पूर्णतया अलग-अलग होती हैं । इसलिए इस लेख से पहले हम पित्त की थैली की पथरी के बारे में वार्तालाप कर चुके हैं  इसलिए यहाँ पर हम किडनी की पथरी के बारे में वार्तलाप करेंगे |

किडनी की पथरी

पूरा आर्टिकल (लेख) एक नज़र में.

किडनी की पथरी के लिए ऐतिहासिक तथ्य:

मनुष्यों में किडनी की पथरी के प्रमाण ऐतिहासिक अवशेषों में भी मिलते हैं । इजिप्ट के पिरामिडों में दफनाई गई ‘ममी’ की एक्स-रे जाँच में उनके किडनी में पथरियाँ दिखी हैं । भारतीय चिकित्सा शास्त्र के जनक ‘सुश्रुत के आलेखों में किडनी की पथरी एवं मूत्र तंत्र की पथरी की शल्य चिकित्सा का विवरण मिलता है । गुर्दे की पथरी एक आम एवं कष्टकारी समस्या है । पेट में तेज दर्द होने का यह एक प्रमुख कारण है । आबादी के लगभग 10 प्रतिशत व्यक्तियों को जीवन काल में कम-से-कम एक बार गुर्दे की पथरी की शिकायत होती है । यह पुरुषों में, स्त्रियों की अपेक्षा ज्यादा होती है | 20 से 50 वर्ष के ऐसे व्यक्तियों में, जो ज्यादातर धूप-गर्मी-पसीने वाली जगहों में कार्य करते हैं, पथरी बनने की सम्भावना ज्यादा रहती है । हमारे देश के पंजाब प्रांत में, जहाँ धूप भरे खेतों में काम करने वाले व्यक्तियों में पसीना ज्यादा निकलता है तथा वे दूध-लस्सी ज्यादा पीते हैं, उत्सर्जन तंत्र की पथरियाँ ज्यादा होती हैं ।

किडनी की पथरी कैसे बनती है (Process to occur Kidney Stone)

गुर्दे शरीर में चयापचय (मेटाबोलिज्म) के दौरान बने विषैले अवशिष्ट पदार्थों को जल में घुला कर मूत्र के रूप में निकालते हैं । जब इनमें से कुछ पदार्थ घोल से बाहर आकर ठोस कणों का रूप धारण कर लेते हैं, तब पथरी बनती है । किसी कारण से जब पेशाब की मात्रा कम बनती है, या मूत्र तंत्र में कहीं मूत्र का जमाव होता है, तब पथरी ज्यादा बनती है । किडनी की पथरी निम्न पदार्थों से बनी हो सकती है  |

  • कैल्शियम ऑक्जेलेट
  • फॉस्फेट (कैल्शियम, मैग्नेशियम के साथ)
  • यूरिक एसिड
  • सिस्टोन

कुछ लोग सोचते हैं कि भोजन के साथ पेट में चली गई कंकरी मूत्र में पथरी के रूप में आती है, जो सत्य नहीं है । मूत्र तंत्र की पथरियाँ उत्सर्जन तंत्र में ही बनती हैं, न कि खाने के साथ शरीर में जाती हैं । गुर्दो के द्वारा छाने जा रहे मूत्र में जब उपरोक्त पदार्थों के क्रिस्टल (महीन कण) ज्यादा आते हैं तो वे आपस में चिपक कर पथरी का केन्द्र (न्युक्लियस) बनाते हैं । धीरे-धीरे इस सूक्ष्म केन्द्र पर प्रोटीन एवं नये कण चिपक कर पथरी का आकार बढ़ा देते हैं । मूत्र तंत्र में कहीं रुकावट होने पर जमा मूत्र के क्रिस्टल प्रक्षेपित (Precipitate) होकर पथरी बना सकते हैं ।

  1. कैल्शियम ऑक्जेलेट स्टोन (Calcium Oxalate Stone)

मूत्र में घुले कैल्शियम एवं ऑक्जेलेट की मात्रा ज्यादा होने पर दोनों पदार्थ मिल कर, कणों के रूप में प्रक्षेपित होते हैं तथा पथरी बनाते हैं । ऐसा इन पदार्थों की मात्रा के ज्यादा सेवन करने से या शरीर के मेटाबोलिज्म में परिवर्तन आने से होता है । कैल्शियम ऑक्जेलेट स्टोन की सतह खुरदरी होती है, जिस कारण ये रक्तस्राव (Bleeding) कराते हैं । इनकी सतह पर रक्त पिगमेंट के जमने से इनका रंग कत्थई हो जाता है ।  मानव शरीर के किडनी में होनेवाली पथरियों में लगभग अस्सी प्रतिशत कैल्शियम ऑक्जेलेट की बनी होती है ।

  1. मैग्नेशियम अमोनियम फॉस्फेट पथरी (Struvite Stone) :

किडनी एवं मूत्र तंत्र में संक्रमण होने पर, बैक्टीरिया के प्रभाव से अमोनियम ऑयन निकलते हैं, जो फॉस्फेट के साथ यौगिक लवण बनाते हैं एवं पथरी का रूप धारण करते हैं । अमोनियम के अलावा इनमें कैल्शियम एवं मैग्नेशियम भी मिला होता है । अतः इन्हें ट्रिपल फॉस्फेट स्टोन’ भी कहते हैं । आकार में धीरे-धीरे बढ़कर यह गुर्दे की मूत्रग्राही थैली (पेल्विस) की आकृति (शेप) धारण कर लेते हैं । इन पथरियों की सतह चिकनी होती है, अतः वे दर्द कम कराते हैं और धीरे-धीरे आकार (साइज) में बढ़ते जाते हैं । इस प्रकार की पथरियों में कई शाखाएँ हो सकती हैं तथा इन्हें ‘स्टैग हॉर्न स्टोन’ (बारहसिंगे के सींग के आकार का) का विशेषण दिया जाता है ।

  1. यूरिक एसिड पथरी (Uric Acid Stone):

मूत्र में यूरिक एसिड के ज्यादा उत्सर्जित होने से बनने वाली किडनी की पथरी भूरे पीले रंग की, तथा इनकी सतह चिकनी होती है । इस प्रकार की पथरी से ग्रसित  10-20 प्रतिशत लोगों को जोड़-दर्द (गाउट) की शिकायत होती है । इन पथरियों में कैल्शियम की मात्रा नहीं होने के कारण ये एक्स-रे में नहीं दिखती हैं ।

  1. सिस्टीन पथरी (Cystine Stone) :

बच्चों में चयापचाय की गड़बड़ी से होने वाली सिस्टीन पथरियाँ बहुत कम पाई जाती हैं । उपरोक्त पदार्थों में यूरिक एसिड से बनी पथरियों को छोड़कर अन्य सभी को पेट के सादे एक्स-रे में देखा जा सकता है । मूत्र तंत्र की लगभग नब्बे प्रतिशत पथरियों को पेट के सादे एक्स-रे में देखा जा सकता है ।

किडनी की पथरी का ईलाज (Treatment of kidney Stone):

किडनी की पथरी का ईलाज निम्न तीन विधियों द्वारा चिकित्सकों द्वारा किया जा सकता है |

लिथोट्रिप्सी विधि  (Extracorporeal shockwaveLithotripsy):

बिना शरीर पर चीरा लगाए, विशेष उपकरणों से  किडनी की पथरी को चूर करने की प्रक्रिया को लिथोट्रिप्सी कहते हैं एवं उपकरण को लिथोट्रिप्टर (Lithotripter) कहते हैं । इस विधि में मशीन के द्वारा शरीर पर काट-छाँट किए बिना ही पथरी को चूर किया जा सकता है । मध्यम आकार (2 से.मी. तक) की, कैल्शियम डाईहाइड्रेट की बनी मुलायम पथरियाँ लिथोट्रिप्सी से तोड़ी जा सकती हैं । गुर्दे की कुछ पथरियाँ (कैल्शियम मानो हाइड्रेट युक्त) अत्यन्त कड़ी होती हैं । और लिथोट्रिप्टर उन्हें तोड़ने में असफल हो सकता है ।

लिथोट्रिप्सी कैसे की जाती है :

बिना ऑपरेशन के गुर्दे की पथरी तोड़ने की मशीनों की उपलब्धता, पथरी के इलाज में एक बड़ा कदम माना जाता है । जर्मनी की डोर्नियर कम्पनी के द्वारा इन मशीनों से रोगी के पथरी को निशाना बनाकर यांत्रिक तरंगों के झटके दिए जाते हैं, जिससे पथरी टूट कर कणों में बदल जाती है । पथरी के छोटे-छोटे टुकड़े और महीन बालू के समान कण मूत्र के साथ बाहर निकल जाते हैं । पहले ये मशीनें एक्स-रे चित्र के सहारे पथरी पर, यांत्रिक तरंगों को केन्द्रित करती थीं । अब ऐसे बेहतर उपकरण आ गये हैं जो अल्ट्रासाउंड के द्वारा किडनी की पथरी को देख कर निशाना बनाते हैं, साथ ही ताकतवर अल्ट्रासाउंड तरंगों के सहारे उन्हें तोड़ते हैं । लिथोट्रिप्टर के द्वारा किडनी की पथरी को चूर करने के बाद उसके कणों के मूत्र में आने से दर्द, रक्तिम मूत्र और मूत्र संक्रमण की सम्भावना रहती है, अतः उपचार की अवधि में चिकित्सक के देख-रेख में रहना उचित होता है ।

पी.सी.एन.एल. (परक्यूटेनियस नेफ्रोलिथोटोमी):

किडनी की पथरी बड़ी होने पर किडनी के पास एक चीरा लगाकर निकाला जा सकता है । इस प्रक्रिया में एक छोटा छेद बनाकर किडनी में पथरी के स्थान तक मार्ग बनाया जाता है । इस मार्ग के द्वारा दूरबीन डालकर पथरी को देखा जाता है तब या तो चिमटी से पकड़कर उसे बाहर निकाल लेते हैं या यांत्रिकी तरंगों (मेकेनिकल शॉक वेव्स) से उन्हें चूर कर दिया जाता है ।

किडनी की पथरी की सर्जरी:

किडनी की पथरी बेहद बड़ी होने पर, विशेषकर जिनमें शाखाएँ-सी बनी हों (ब्रान्च स्टोन, स्टैग हार्न स्टोन, बारहसिंगे के सींग के आकार की) उन्हें बाहर निकालने के लिए पूरी शल्य चिकित्सा की जरूरत पड़ सकती है जिसमें 12-15 से.मी. का चीरा लगाना पड़ सकता है ।

किडनी की पथरी में कैसे हो खान पान:

जिन व्यक्तियों को किडनी की पथरी की बीमारी एक बार हो चुकी है, वे अपने खान-पान में परिवर्तन कर दोबारा पथरी होने की सम्भावना को कम कर सकते हैं । आइये जानते हैं कैसे?

पानी एवं द्रव्य पदार्थों का अधिकाधिक सेवन:

किडनी की पथरी के रोगियों को पानी एवं अन्य द्रव्य शरबत, नीबू-पानी, नारियल पानी और फलों का रस आदि ज्यादा लेना चाहिए । इससे मूत्र में अघुलनशील कण (Insoluble Crystals) जो पथरी बनाने में मदद करते हैं, की मात्रा घटती है । पानी एवं द्रव्य की आवश्यकता व्यक्ति की उम्र, कद, वजन, मौसम का तापमान, आर्द्रता और व्यक्ति की शारीरिक गतिविधियों आदि अनेक बातों पर निर्भर करती है । अतः सही मात्रा की सिफारिश भी कठिन है । फिर भी हमें कम-से-कम इतना पानी पीना चाहिए कि दिन के अधिकतर पेशाब का रंग हल्का पीला (पुआल के रंग का, स्ट्रॉ-कलङ) हो । कम मात्रा (वॉल्यूम) में गहरे रंग के पेशाब में, अघुलनशील ठोस कण ज्यादा रहते हैं जो किडनी की पथरी बनने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं ।

 भोज्य पदार्थ का सेवन ध्यान से करें

कुछ खाद्य पदार्थों के लेने से पथरी बनने की सम्भावना घटती है, एवं बनी हुई पथरी घुल भी सकती है । किडनी के पथरी के रोगी को पालक का साग, टमाटर, काजू,खीरा, आंवला, चीकू इत्यादि खाद्य पदार्थ कम खाने चाहिए | खान-पान में परिवर्तन कर किडनी की पथरी एवं मूत्र तंत्र की पथरी से बचा जा सकता है । कहने का अभिप्राय यह है की किडनी की पथरी एवं मूत्र तन्त्र की पथरी से बचने के लिए ऑक्जेलेट, यूरिक एसिड एवं प्युरिन की ज्यादा मात्रावाली खाद्य पदार्थों का सेवन कम करना चाहिए ।

किडनी की पथरी से बचने के लिए क्या खाना चाहिए और क्या नहीं?

किडनी की पथरी से बचने के लिए खान पान का ध्यान रखना बेहद जरुरी होता है इसलिए यहं पर हम उस खान पान की लिस्ट पेश कर रहे हैं जो किडनी की पथरी से बचाव करने में सहायक हो सकती है |

किडनी की पथरी से बचाव के लिए इनका सेवन कम करें

  • पालक के साग का सेवन कम करें
  • टमाटर का सेवन कम करें
  • पथरी के रोगी को काजू का सेवन भी कम करना चाहिए |
  • खीरे का सेवन भी कम करना चाहिए |
  • किडनी की पथरी के रोगी को आंवले का सेवन भी कम करना चाहिए |
  • चीकू का सेवन भी कम करना चाहिए |
  • फूलगोभी का इस्तेमाल भी कम करना चाहिए |
  • कद्दू का इस्तेमाल भी कम करना चाहिए |
  • किडनी के पथरी के रोगी को मशरूम का सेवन भी कम करना चाहिए |
  • बैगन का इस्तेमाल भी कम करना चाहिए |

चूँकि उपर्युक्त खाद्य पदार्थों में आक्जेलेट, यूरिक एसिड एवं प्युरिन की अधिकता होती है इसलिए किडनी की पथरी के रोग से बचने के लिए इनका सेवन कम ही करना चाहिए |

किडनी की पथरी से बचाव के लिए इनका सेवन अधिक करें

  • नारियल-पानी (Coconut Water) का सेवन किडनी की पथरी से बचाव के लिए अधिक करना चाहिए | क्योंकि यह पथरी पर कैल्शियम के जमाव को रोकता है एवं उस पर जमे कैल्शियम के लवणों की मात्रा को हटाता है ।
  • अन्नानास का रस (Pineapple Juice) का भी अधिक सेवन करें इसमें ऐसे एंजाइम होते हैं, जो पथरी बनने से रोकते हैं ।
  • केला (Banana) का सेवन करें इसमें विटामिन बी 6 (पाइरिडोक्सिन) की मात्रा अच्छी होती है, जो ऑक्जेलिक एसिड़ मेटाबोलिज्म को प्रभावित कर पथरी बनने से रोकता है ।
  • कागजी बादाम (Almond) का सेवन करें इसमें पाए जाने वाले मैग्नेशियम एवं पोटाशियम, किडनी की पथरी बनने से रोकते हैं ।
  • नीबू (Lemon) का इस्तेमाल करें इसका साइट्रिक एसिड अंश कैल्शियम ऑक्जेलेट पदार्थ की पथरी बनने से रोकता है ।
  • गाजर (Carrot) का अधिक सेवन करें इसमें विटामिन ‘ए’ होता है जिसकी कमी मूत्राशय और गुर्दे की की पथरी का सम्भावित कारण मानी जाती है । गाजर के अलावा पपीता, आम एवं मछली में भी विटामिन ए की अच्छी मात्रा होती है ।
  • कुर्थी दाल (Horse Gram) का सेवन करें इसे अर्थात कुर्थी दाल को धोकर रात भर पानी में भिगो देते हैं, और सुबह उस जल को पीने से पथरी की साइज घटती है ।
  • करेला (Bitter Gourd) का सेवन अधिक करें क्योंकि इसमें ऐसे तत्त्व हैं जो किडनी की पथरी बनने से रोकते हैं । इनके अलावा बार्ली तथा मक्के-बाल की चाय (CornSilk Tea) भी पथरी बनने की प्रक्रिया को रोकते हैं ।

 बार-बार किडनी की पथरी होने पर जांच

  • मूत्र तंत्र की पथरी और किडनी की पथरी से बार-बार पीड़ित होने वाले व्यक्तियों में कुछ जाँच करके इसके मूल कारण का पता लगाने का प्रयास किया जाता है, जिससे भविष्य में पथरी बनने की सम्भावना को कम किया जा सके ।
  • चौबीस घंटे के मूत्र को एकत्र करके उसकी मात्रा (वॉल्यूम), ऑस्मोलेलिटी, pH और विशिष्ट गुरुत्व की जाँच की जाती है । साथ ही, इसमें विसर्जित कैल्शियम, ऑक्जेलेट, यूरिक एसिड, साइट्रेट, फॉस्फेट, सल्फेट और सोडियम की जाँच की जाती है ।
  • मूत्र की कल्चर जाँच कर संक्रमण के उपस्थिति और प्रकार की जानकारी प्राप्त की जा सकती है ।
  • रक्त में यूरिया, क्रिएटिनीन, सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम, फॉस्फेट,पैराथॉयरायड हार्मोन एवं यूरिक एसिड के स्तर की जाँच की जा सकती है ।
  • एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड एवं सी.टी. स्कैन के चित्रों से किडनी की पथरी की वर्तमान स्थिति की जाँच की जा सकती है ।

इन जाँचों से व्यक्ति के चयापचय एवं रासायनिक क्रियाओं में हो रही असामान्य बातों का पता लगता है । तथा चिकित्सक को बचाव हेतु उपाय एवं दवाओं के निर्णय में सहायता मिलती है ।

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