गर्भावस्था में पोषण के स्रोत एवं आहार पूरी जानकारी.

गर्भावस्था में पोषण की बात करें तो किसी भी नारी के जीवन में गर्भावस्था सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समय होता है । माँ के आहार में माँ और भ्रूण दोनों के लिए सही मात्रा में पौष्टिक तत्त्वों का होना आवश्यक है । विकासशील देशों में अधिकांश माताएँ अपनी बाल्यावस्था एवं किशोरावस्था में कुपोषण का शिकार हुई रहती हैं, जिसका प्रभाव बाद में गर्भावस्था के समय भ्रूण के स्वास्थ्य पर पड़ता है । गर्भावस्था में पोषण की कमी से माँ का वजन कम रहता है और जन्म के समय नवजात का वजन भी कम होने की संभावना रहती है । इन बच्चों का शारीरिक एवं मानसिक विकास भी बाद में प्रभावित होता है तथा जन्म के कुछ महीनों या वर्षों बाद उनकी मृत्यु की संभावना भी अन्य बच्चों की अपेक्षा अधिक रहती है ।

गर्भावस्था में पोषण

गर्भावस्था में पोषण एवं उसके स्रोत:

  1. जल एवं तरल पदार्थ:

गर्भावस्था में पोषण की बात करें तो पोषण के आवश्यक स्रोतों में जल एवं तरल पदार्थों का पहला स्थान है | गर्भवती को प्रतिदिन 8 से 10 गिलास पानी अवश्य पीना चाहिए । इससे पाचन क्रिया में मदद मिलती है तथा शरीर का तापमान सामान्य रहता है । खून की बढ़ती हुई मात्रा एवं उल्व द्रव के लिए भी अतिरिक्त जल की जरूरत होती है ।

  1. कैलोरी:

गर्भवती को स्वयं तथा अपने भ्रूण के गर्भावस्था में पोषण के लिए अतिरिक्त ऊर्जा की जरूरत पड़ती है, जो कार्बोहाइड्रेट्स, वसा एवं प्रोटीन द्वारा प्राप्त किया जाता है । गर्भावस्था में प्रतिदिन 300 कैलोरी अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है ।

  1. प्रोटीन :

गर्भावस्था में पोषण प्रदान करने के अलावा प्रोटीन माँ एवं शिशु के ऊतकों का निर्माण करता है, आयरन तंत्र को बरकरार रखता है और आयरन के साथ मिलकर रक्त बनाने में सहायक हैं । इससे नए ऊतकों की उत्पत्ति एवं टूटे-फूटे ऊतकों की मरम्मत होकर उनका पुनः स्थापन हो जाता है । प्रोटीन के टूटने पर अमीनो अम्ल बनते हैं और शक्ति मिलती है । गर्भिणी को प्रतिदिन लगभग 40 ग्राम अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है । प्रोटीन के मुख्य शाकाहारी स्रोत दूध, पनीर, दाल, सेम, मटर, अनाज, फलियाँ इत्यादि हैं तथा मांसाहारी स्रोत मांस, मछली, दूध, अंडा इत्यादि हैं । सब्जी से मिलनेवाले प्रोटीन कम संकेंद्रित (Concentrated) होते हैं और पशु प्रोटीन की तुलना में कम आसानी से अवशोषित होते हैं । जब शाकाहारी व्यक्ति दाल-चावल, इडली-डोसा, रोटी-दाल मिलाकर खाता है तो अवशोषण में काफी हद तक सुधार होता है । यदि गर्भस्थ शिशु कमजोर है तो माँ को प्रोटीन-युक्त भोजन अधिक मात्रा में देने से सुधार की आशा रहती है ।

  1. गर्भावस्था में कार्बोहाइड्रेट्स की आवश्यकता:

कार्बोहाइड्रेट्स का शरीर से अवशोषण शीघ्र ही हो जाता है । इनसे तुरंत शक्ति मिलती है । भोजन का मुख्य भाग कार्बोहाइड्रेट्स होता है । यह चावल, दाल, गेहूँ, अन्य अनाजों, फल तथा मिठाइयों में पाया जाता है ।

  1. वसा:

गर्भावस्था में पोषण की बात करें तो वसा वसीय अम्लों एवं ग्लिसराल के यौगिक होते हैं । इनका शरीर में शीघ्र पाचन नहीं होता और इनसे शक्ति देर से उपलब्ध होती है; पर इनसे बहुत शक्ति मिलती है । ये एक सुरक्षित इंधन भंडार के रूप में शरीर में संचित हो जाते हैं, जिसका उपयोग उपवास या बीमारी के समय होता है । ये घी, मक्खन एवं तेल में अधिक पाए जाते हैं ।

  1. फैटी एसिड:

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, गर्भावस्था में पोषण के लिए 2.6 ग्राम ओमेगा-3 फैटी एसिड और 100-300 मिलीग्राम DHA रोज लेना चाहिए । ये शिशु के मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र, हॉर्मोन व दृष्टि इत्यादि के लिए अति आवश्यक हैं । गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप तथा प्रसूति काल में अवसाद से बचाव में भी ये सहायक हैं । कुछ अध्ययनों से यह भी पता चला है कि समय पूर्व वेदना रोकने एवं शिशु के विकास में भी इनकी भूमिका है । मछली का तेल (Fish oil), समुद्री भोजन (Sea food), मेवे, अंडे, बादाम (almond), तीसी इत्यादि इसके मुख्य स्रोत हैं ।

  1. फाइबर (रेशा) :

गर्भावस्था में पोषण के स्रोतों में फाइबर भी एक मुख्य स्रोत है, हम भले ही रेशेदार खाद्य पदार्थ को पचा नहीं सकते हैं, पर रेशेयुक्त भोजन का हमारे स्वास्थ्य को ठीक रखने में बहुत बड़ा योगदान है । कब्ज, बवासीर, मधुमेह जैसी परेशानियों को यह नियंत्रित रखता है । यह फल के छिलके (सेब, अँगूर), ताजे फल, सब्जियाँ, मोटे दानेवाले साबुत अनाज, गेहूँ का आटा, छिलकेवाली दालों व मटर इत्यादि में पाया जाता है ।

  1. खनिज (Minerals) :

    खनिज भी गर्भावस्था में पोषण के प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं इनके लवण सभी कोशिकाओं एवं ऊतक तत्त्वों में विद्यमान रहते हैं । कुछ मुख्य खनिजों की लिस्ट इस प्रकार से है |

  • कैल्सियम (Calcium) : यह हड्डियों एवं दाँतों को मजबूती प्रदान करता है, रक्त का थक्का बनाने में सहायता करता है, गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप से बचाव करता है और तंत्रिका तंत्र की संवेदनशीलता को नियमित करता है । यह गर्भ के अंतिम महीनों में भ्रूण में जमा (deposit) होता है । गर्भावस्था में प्रतिदिन 2 ग्राम कैल्सियम की आवश्यकता होती है । दूध व दुग्ध उत्पाद, बादाम, काली खांड, सोयाबीन, चना, मछली, अंडा, गहरे रंगवाली साग-भाजी इत्यादि कैल्सियम के मुख्य प्राकृतिक स्रोत हैं ।
  • लौह (Iron) : वयस्क के शरीर में लगभग 4,300 मि.ग्रा. लौह होता है, जिसका 55 प्रतिशत हीमोग्लोबिन में, 10 प्रतिशत मांसपेशियों में तथा 35 प्रतिशत यकृत एवं प्लीहा के भंडारों में जमा रहता है । गर्भावस्था में पोषण की लिस्ट में यह इसलिए सम्मिलित है क्योंकि भ्रूण में लगभग 400 मि.ग्रा. लौह होता है, जिसका अधिकांश भाग हीमोग्लोबिन में तथा शेष यकृत एवं प्लीहा में जमा होता है, जिससे जन्म के बाद शिशु में हीमोग्लोबिन बनता है । इसके अतिरिक्त 100 मि.ग्रा. लौह अपरा में होता है । गर्भिणी को प्रतिदिन 40 मि.ग्रा. लौह की आवश्यकता होती है । इसका समुचित मात्रा में सेवन अत्यंत आवश्यक है । इसकी कमी से एनीमिया होता है, जिसके कारण गर्भावस्था की अनेक जटिलताओं के खतरे बढ़ जाते हैं और कभी-कभी मृत्यु का भी भय रहता है । लौह के मांसाहारी स्रोत लिवर, चिकेन, अंडे की जर्दी एवं मांस हैं और शाकाहारी स्रोत सेब, पालक, पत्तागोभी, आँवला, खजूर इत्यादि हैं । अधिक लौह ग्रहण हो सके, इसके लिए विटामिन सी युक्त खाद्य पदार्थ, जैसे-टमाटर इत्यादि अवश्य खाना चाहिए । लौह की गोलियाँ भी उपलब्ध हैं । लौह एवं कैल्सियम के अलावा फास्फोरस, मैग्नीशियम, आयोडीन, फ्लोरीन और जिंक की आवश्यकता भी गर्भावस्था में पोषण के तौर पर होती है ।
  • फॉस्फोरस (Phosphorus): गर्भावस्था में पोषण के लिए फॉस्फोरस भी जरुरी होता है क्योंकि यह हड्डी एवं दाँतों को मजबूती प्रदान करता है । आयोडीन (Iodine)-थायरॉक्सिन हारमोन के निर्माण के लिए आयोडीन अति आवश्यक है । इसकी कमी से घेघा (Goitre) होने का भय रहता है । समुद्री भोजन और आयोडाइज्ड नमक इसके अतिरिक्त स्रोत हैं, अन्यथा सामान्य भोजन और जल से यह उपलब्ध हो जाता है ।
  • मैग्नीशियम (Magnesium): इससे ऊर्जा मिलती है । यह ऊतकों के विकास, मांसशियों की गतिविधि तथा प्रोटीन एवं ऊतकों की प्रक्रियाओं में सहायक है । यह बादाम, कोका, हरी सब्जी, अनाज इत्यादि में पाया जाता है ।
  • जिंक (Zinc) : गर्भावस्था में पोषण प्राप्त करने के लिए जहाँ तक जिंक की उपयोगिता का सवाल है, यह हड्डियों एवं नसों के विकास में मददगार है तथा मांस, लिवर, अंडा, समुद्री भोजन इसके स्रोत हैं ।
  1. विटामिन्स (Vitamins) :

    गर्भावस्था में पोषण के लिए विटामिन का भी अहम् योगदान है ये जटिल कार्बनिक रसायन होते हैं, जो अधिकांश खाद्य पदार्थों में पाए जाते हैं । कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन एवं वसा का उपयोग करने हेतु शरीर को इनकी आवश्यकता होती है । परंतु ये हमेशा पर्याप्त मात्रा में शरीर में उपलब्ध नहीं होते हैं । विटामिन्स कई प्रकार के होते हैं, जिन्हें दो वर्गों में विभाजित किया गया है पहली श्रेणी में वसा में घुलनशील विटामिन जैसे विटामिन A, D, E और K  को रखा गया है और दूसरी श्रेणी में जल में घुलनशील विटामिन जैसे विटामिन B तथा C को रखा गया है |

  • विटामिन: गर्भावस्था में पोषण के लिए यह इसलिए जरुरी है क्योंकि यह संपूर्ण वृद्धि एवं विकास के लिए आवश्यक है तथा यह दृष्टि व प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है । अधिक मात्रा में विटामिन ‘ए’ एवं ‘डी’ भ्रूण के लिए हानिकारक है । शरीर की वृद्धि के लिए रोजाना 3,500 अंतरराष्ट्रीय मानक विटामिन ‘ए’ की आवश्यकता होती है । विटामिन ‘ए’ पालक, गाजर, मक्खन, नारंगी, पपीता, हरी व पीली सब्जियों, आम, अंडे, अंजीर, मछली के जिगर के तेल इत्यादि में पाया जाता है । विटामिन ए की और अधिक जानकारी के लिए यह पढ़ें |
  • विटामिनडी: यह कैल्सियम एवं फॉस्फोरस के अवशोषण में मदद करता है और नवजात शिशु को रिकेट्स (Rickets) की बीमारी से सुरक्षित रखता है । बच्चे के दाँत एवं हड्डियों को भी यह मजबूत बनाता है । धूप के संपर्क से शरीर स्वयं विटामिन ‘डी’ तैयार करता है । यही कारण है की गर्भावस्था में पोषण के लिए यह जरुरी होता है, दूध, दुग्ध उत्पाद, मछली के तेल और अंडे की जर्दी इसके अच्छे स्रोत हैं । विटामिन डी की और अधिक जानकारी के लिए यह पढ़ें |
  • विटामिन बी: इसके कई घटक होते हैं और इन सबों को एक साथ विटामिन बी कॉम्पलेक्स कहा जाता है ।
  • विटामिन बी‘ (Thiamine): इसका संबंध कार्बोहाइड्रेट के चयापचय से है । इसकी कमी होने से बेरी-बेरी और न्यूराइटिस होती है । यह सामान्य रूप से ईस्ट, संपूर्ण अनाज की रोटी, अंडे की जर्दी, मटर एवं सेम में पाया जाता है।
  • विटामिन बी2′ (Riboflamine): गर्भावस्था में पोषण की बात करें तो इसका संबंध भ्रूण के विकास से है । माँ में इसकी कमी से भ्रूण की हड्डियों में विकृतियाँ एवं कटे तालू (Cleft palate) की संभावना बढ़ जाती है । बहुत कमी होने पर जीभ सूख जाती है एवं फट जाती है । यह ईस्ट, दूध, मक्खन, पनीर, अंडे एवं मांस में पाया जाता है ।
  • विटामिन बी5′ (Nicotinic Acid): इसका संबंध तंत्रिकाओं की चालकता से है । इसकी कमी से विखंडित मनस्कता (Schizophrenia) और पक्षाघात के लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं । मामूली कमी होने पर त्वचा के रंग में बदलाव, दस्त एवं विक्षिप्तता होती है । यह मांस, मछली एवं ईस्ट में पाया जाता है ।
  • विटामिन बी6′ (Pyridoxin): इसका संबंध वसा चयापचय एवं केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से है। इसकी कमी से मानसिक अक्षमता एवं अवसाद होता है ।
  • विटामिन बी‘ (Folic Acid): गर्भावस्था में पोषण के लिए यह भी जरुरी इसलिए है क्योंकि भ्रूण के विकास में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है । यह शिशु के दिमाग एवं नाड़ी तंत्र विकास तथा स्वस्थ रक्त कोशिकाएँ बनाने में सहायक है । इसकी कमी से माँ को रक्त की कमी (Megaloblastic anaemia) होती है । प्रारंभिक तीन महीनों में फोलेट की गोली तथा इससे भरपूर भोजन अवश्य लेना चाहिए। गहरी हरी पत्तेदार सब्जियाँ, पालक, पता गोभी, केला, नारंगी, सूखी मटर, सेम, अनाज आदि इसके स्रोत हैं ।
  • विटामिन बी12′ (Cyanocobalamin): इसका संबंध लाल रक्त कोशिकाओं एवं श्वेत रक्त कोशिकाओं की उत्पत्ति तथा तंत्रिकाओं के आवेगों को संचारित करने की क्षमता से है । इसकी कमी से पर्नीसियस एनीमिया (Pernicious anaemia) होता है । यह दूध, पनीर, मांस, मछली, अंडा तथा यकृत में पाया जाता है ।
  • विटामिन सी: यह प्रतिकारक तंत्र को सशक्त करता है । इसका संबंध नए ऊतकों की वृद्धि तथा क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत से है । इसकी गंभीर न्यूनता से स्कर्वी (scurvy) रोग हो जाता है, जिसमें बहुत से स्थानों से रक्तस्राव होने लगता है, जोड़ों में दर्द होता है और कमजोरी आ जाती है । इसलिए गर्भावस्था में पोषण के लिए यह भी जरुरी है | रसदार ताजा फल, हरी सब्जियाँ, आँवला, हरी मिर्च, आलू, टमाटर इसके अच्छे स्रोत हैं । विटामिन सी की और अधिक जानकारी के लिए यह पढ़ें |
  • विटामिन ‘ (Tocoferol): इसका संबंध जनन क्षमता से है । यह सामान्यतः अनाजों में, विशेष रूप से अंकुरित गेहूँ, हरी सब्जियों तथा अंडे की जर्दी में पाया जाता है ।

विटामिन ई की पूरी जानकारी के लिए यह पढ़ें |

  • विटामिन के : इसका संबंध यकृत में Prothrombin बनाने से है, जिससे रक्त के जमने में मदद मिलती है । इसकी कमी से रक्तस्राव हो सकता है । यह विटामिन K के रूप में पालक, सोयाबीन, फूलगोभी, पत्तागोभी, दूध, अंडा, मछली, मांस आदि में पाया जाता है और विटामिन K, के रूप में प्राकृतिक जीवाणुओं के द्वारा आँत में भी बनाया जाता है । विटामिन के की पूरी जानकारी के लिए यह पढ़ें |

गर्भावस्था में पोषण के लिए आहार:

गर्भावस्था के दौरान माँ के अंगों तथा भ्रूण और प्लासेंटा की वृद्धि तथा विकास के लिए सामान्य स्त्री को प्रतिदिन 300 कैलोरी अधिक उर्जा की आवश्यकता होती है । शुद्ध संतुलित आहार से ही जरूरी तत्व माँ एवं शिशु को मिल पाते हैं । तो आइये जानते हैं गर्भावस्था में पोषण के लिए एक माँ का आहार कैसा होना चाहिए |

  • ऊर्जा के लिए संपूर्ण अनाज, अंकुरित दाल, सेम, मटर इत्यादि की फलियाँ, मांस व अंडा से प्रोटीन प्राप्त कर सकते हैं ।
  • विटामिन एवं मिनरल्स के लिए मौसमी फल व हरी पत्तेदार सब्जियाँ पर्याप्त मात्रा में लेनी चाहिए ।
  • गर्भावस्था में पोषण के लिए दूध, दही और पनीर का सेवन प्रतिदिन करें, क्योंकि ये कैल्सियम, विटामिन ‘डी’ एवं ‘बी12’ के उत्तम स्रोत हैं ।
  • फल का रस पीने की अपेक्षा छिलके वाला फल अधिक फायदेमंद है,क्योंकि इसमें रेशा होता है, जो पेट को साफ रखता है ।
  • संतृप्त वसा की अपेक्षा असंतृप्त वसा लेना बेहतर है ।
  • गर्भवती महिलाओं को जल्दी भूख लगती है । जब भूख लगे, अपनी पसंद के अनुसार बार-बार थोड़ा-थोड़ा आहार लेना चाहिए ।
  • गर्भावस्था में वजन कम करने की कोशिश न करें, क्योंकि यह शिशु के विकास के लिए हानिकारक है ।
  • गर्भावस्था में व्रत व उपवास करने से पानी की कमी होती है, जो भ्रूण के लिए हानिकारक है । तरल पदार्थ, खास तौर पर 7-8 गिलास पानी प्रतिदिन अवश्य पिएँ ।
  • अधिक घी, शक्कर, कुरकुरे, आलू के चिप्स, चॉकलेट, केक, सॉफ्ट डिंक इत्यादि से परहेज करना चाहिए । तला हुआ भोजन देर से पचता है । और उससे गला जलता है ।
  • फल एवं सब्जियाँ अच्छी तरह धोकर खाएँ |
  • सब्जियों को बहुत अधिक न पकाएँ । इससे उनके तत्त्व व विटामिन्स नष्ट हो जाते हैं।
  • दूध बिना उबाले न पिएँ ।
  • कैफीन, कोला भ्रूण के लिए फायदेमंद नहीं हैं । इनके अधिक उपयोग से समय पूर्व प्रसव एवं कम वजन के नवजात होने का खतरा बढ़ जाता है ।
  • धूम्रपान, मद्यपान एवं मादक द्रव्यों का सेवन गर्भ और भ्रूण दोनों के लिए काफी हानिकारक है । गर्भाधान के पहले से ही इन्हें छोड़ना चाहिए और गर्भावस्था में बिल्कुल सेवन नहीं करना चाहिए ।
  • आयोडाइज्ड नमक का प्रयोग उत्तम है ।
  • गर्भावस्था में पोषण के लिए फॉलिक एसिड (5 मि.ग्रा.) की गोली शुरू के तीन महीनों में अवश्य लेनी चाहिए । जिन्हें वंशानुगत रोगों या भ्रूण में विकृतियों का भय हो, उन्हें गर्भाधान की योजना बनाते ही इसका सेवन शुरू कर देना चाहिए ।
  • आयरन की आवश्यकता भोजन द्वारा पूरी नहीं की जा सकती है, अतः 60 मि.ग्रा. की एक गोली चौथे माह से बराबर लेनी चाहिए । गर्भ के शुरुआती तीन महीनों में आयरन लेने से उलटी की संभावना बढ़ जाती है ।

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About Author:

Post Graduate from Delhi University, certified Dietitian & Nutritionists. She also hold a diploma in Naturopathy.

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