टाइफाइड कारण, लक्षण एवं उपचार

टाइफाइड कारण, लक्षण एवं उपचार

Typhoid को हिंदी में भी सामान्य तौर पर टाइफाइड के नाम से ही जाना जाता है लेकिन इसके अलावा इस बीमारी को और भी अनेक नामों जैसे Enteric Fever, मियादी बुखार, मोतीझारा, आन्त्र ज्वर इत्यादि के नाम से भी जाना जाता है । Typhoid नामक इस रोग की यदि हम बात करें तो इस प्रकार का यह रोग एक संक्रामक एवं लम्बी अवधि का बुखार है जिसका होने का सबसे प्रमुख कारण Salmonella Typhi नामक एक जीवाणु है | इस संक्रामक रोग से ग्रसित व्यक्ति या मरीज को तेज बुखार के साथ बैचैनी, भूख न लगना, पेट दर्द इत्यादि लक्षण हो सकते हैं | टाइफाइड नामक इस रोग के बिगड़ जाने पर ग्रसित व्यक्ति को आँतों से रक्तस्राव इत्यादि जैसे लक्षण हो सकते हैं |    

टाइफाइड कारण, लक्षण एवं उपचार

टाइफाइड होने के कारण (Cause of typhoid in Hindi):

हालांकि जैसे की हम उपर्युक्त वाक्य में बता चुके हैं की टाइफाइड नामक इस रोग के होने का मुख्य कारण salmonella typhi नामक जीवाणु होता है लेकिन यह जीवाणु गन्दगी अर्थात साफ़ सफाई न होने पर पनपता है, इसलिए निम्न कारणों को इसके होने के कारण माना जा सकता है |

  • गंदगी होने पर व सफाई में कमी के कारण ही यह बीमारी फैलती है ।
  • यदि किसी व्यक्ति को यह रोग हो अर्थात ग्रसित व्यक्ति यानिकी रोगी के मल-मूत्र के माध्यम से यह जीवाणु बाहर निकलते हैं, जो कि कम तापमान व नमी में अच्छी संख्या में पनपते हैं । इन जीवाणुओं को मक्खी मच्छर इत्यादि खाद्य सामग्री जैसे भोजन, दूध इत्यादि तक पहुंचा देते हैं, इसलिए जहाँ मक्खी, मच्छर अधिक होते हैं वहाँ यह बीमारी अधिक होने की संभावना है ।
  • मक्खी, मच्छर के माध्यम से इस रोग के जीवाणु खाने के जरिए मनुष्य की आंत में पहुंच कर, पनपते हैं और Typhoid नामक इस बीमारी को फैलाते हैं ।

Typhoid की उत्पति शरीर में कैसे होती है

टाइफाइड के जीवाणु शरीर में प्रवेश होने पर छोटी आंत के लसीका ऊतक में एकत्र होकर अपनी संख्या को बढ़ाने लगते हैं, इससे उतार-चढ़ाव के साथ बुखार का रहना, भूख न लगना, कमजोरी महसूस होना, किसी काम में दिल न लगना जैसे लक्षण हो सकते हैं । टाइफाइड के जीवाणु पित्त की थैली में एकत्रित हो, बाइल के द्वारा आंत में प्रवाहित होकर मल-मूत्र के द्वारा शरीर में बाहर निकल जाते हैं और संक्रमण का कारण बनते हैं । यह जीवाणु आंत को क्षतिग्रस्त करके, परफोरेशन कर देते हैं और वहां खून निकलना शुरू हो जाता है ।

Symptoms of Typhoid in Hindi (टाइफाइड होने के मुख्य लक्षण):

Typhoid नामक इस रोग के मुख्य लक्षण कुछ इस प्रकार से हैं जैसा की यह रोग मरीज को लगभग 10-14 दिनों अर्थात दो हफ़्तों तक परेशान कर सकता है इसलिए रोग की अवधि के आधार पर इसके प्रमुख लक्षण कुछ इस प्रकार से हैं |

रोग की आरम्भिक अवस्था अर्थात पहले हफ्ते में लक्षण:

  • टाइफाइड नामक इस रोग की आरम्भिक अवस्था अर्थात शुरुआत में धीरे-धीरे ज्वर बढ़ता चला जाता है । यह एक सीढ़ीनुमा तरीके से बढ़ता हुआ प्रदर्शित होता है । इसके उपरांत इसमें स्थिरता आ जाती है और बुखार 99°F-100°F(39°-40°C) पर रूक जाता है । कुछ रोगियों में बुखार सर्दी के साथ भी चढ़ता है ।
  • अधिकतर रोगियों में ज्वर के साथ शरीर में टूटन, बेचैनी, सिरदर्द व पेट दर्द के लक्षण मिलते हैं । कभी-कभी केवल सिरदर्द ही सर्वप्रथम प्रदर्शित होता है ।
  • Typhoid के प्रारम्भिक दिनों में रोगी खाने में अरुचि, कब्ज, पेटदर्द व पेट फूला हुआ रहने की शिकायत करता है ।
  • सूखी खांसी, नक्सीर यानिकी Nose Bleeding, उल्टी, नींद न आना, किसी कार्य में मन न लगना, आलस्य, ढीलापन एवं बुखार की तुलना में नाड़ी का का धीमी गति से चलना इत्यादि लक्षण मिल सकते हैं |
  • लम्बी अवधि से बुखार के कारन रोगी अपने आप को थका हुआ, असहाय, कमजोर व दिमागी तौर पर शून्य महसूस कर सकता है |
  • टाइफाइड नामक इस रोग में अधिकतर कब्ज की शिकायत रहती है लेकिन बच्चों में दस्त एवं उल्टी के लक्षण भी देखे जा सकते हैं |

Typhoid के दुसरे सप्ताह के लक्षण:

  • दूसरे सप्ताह के शुरू होते होते छोटे-छोटे मोती जैसे लाल रंग के दाने पे के ऊपर हिस्से व छाती पर निकलते हैं। जो दबाने से अदृश्य हो जाते हैं इनको गोरी त्वचा पर सरलता से देखा जा सकता है । लेकिन अधिकतर भारतवासियों में इनको देखना कठिन है ।
  • टाइफाइड नामक इस रोग की इस अवस्था तक आते हुए रोगी को बेचैनी, सुस्ती, पेट फूला हुआ, शुष्क व खांसी हो जाती है ।
  • जहाँ तक बच्चों का सवाल है बच्चों में ज्यादातार ब्रोंकाइटिस व ब्रोंकोन्यूमोनिया (Bronchitis & Broncho pnumonia) इत्यादि के लक्षण देखे जा सकते हैं |
  • टाइफाइड से ग्रसित मरीज के लीवर एवं प्लीहा भी बढ़ जाते हैं और सीकम के दबाने पर गुड़गड़ाहट हो सकती है ।
  • ज्वर अधिक होने पर भी रोगी की नब्ज की गति कम रहती है ।

तीसरा सप्ताह :-

  • यदि दो हफ़्तों के अन्दर टाइफाइड ठीक नहीं हुआ तो तीसरे सप्ताह शुरू होते ही विषाक्तता (Toxaemia) बढ़ जाती है । रोगी को में या मल में, रक्त निकल सकता है। पेट में तेज या हल्का दर्द रहता है। रोगी धीरे-धीरे गहरी मूच्छा की अवस्था में चला जाता है और उसकी मृत्यु भी हो सकती है ।
  • चौथे सप्ताह में ‘मरीज की आंत के घाव स्वत: ही भरने पर धीरे-धी उसकी हालत में सुधार होता जाता है। ज्वर कम होने के साथ व भूख लगने लगती है। पेट का दर्द व अफारा कम हो जाता है। जीभ साफ हो जाती है ।
  • आधुनिक चिकित्सा में अब इन उपद्रवों पर काबू पा लिया गया है जिससे मृत्यु दर भी नगण्य सी रह गई है। साथ ही रोग की अवधि भी कम हो गई है।

Typhoid की जांच व निदान

रोग के लक्षणों व चिन्हों द्वारा टाइफाइड को पहचाना जा सकता है, इस रोग के प्रथम सप्ताह में रक्त में सफ़ेद कणिकाओं की संख्या कम मिल सकती है | ब्लड कल्चर कराने पर लगभग 70-90 प्रतिशत मरीजों के रक्त में इस प्रकार का यह जीवाणु पाया जाता है | इस बीमारी के दुसरे सप्ताह में विडाल टेस्ट कराने पर उसमे सामान्य से लगभग चार गुना अधिक टाईटर मिल सकता है |

टाइफाइड से क्या Complications हो सकती हैं?

  • टाइफाइड से उत्पादित Complications में आंत से होने वाला रक्तस्राव आता है | इसमें रोगी को मल में खून आना शुरू हो जाता है । तापमान एकाएक कम हो, नाड़ी तेज चलने लगती है । ऐसा होने पर मरीज को तुरन्त हस्पताल में भर्ती करवा देना अति आवश्यक है ताकि समय रहते उसका सही इलाज कराया जा सके ।
  • Perforation या भेदन नामक यह सबसे खतरनाक उपद्रव है । इसमें आत की सारी भित्तिया नष्ट हो जाती हैं और आरपार छिद्र बन जाते हैं। उदरावरणशोथ होकर रोगी की हालत गंभीर हो जाती है। ऐसे में तुरंत ऑपरेशन की आवश्यकता होती है नहीं तो रोगी की मृत्यु हो सकती है ।

टाइफाइड का ईलाज (Treatment of Typhoid in Hindi):

जैसे ही चिकित्सक द्वारा जांचों के आधार पर इस बात की पुष्टी कर ली जाती है की रोगी को टाइफाइड नामक रोग ही है तो ऐसे में घर के सदस्यों को रोगी की अच्छे से देखभाल करनी चाहिए और चिकित्सक के लगातार संपर्क में रहना चाहिए |

  • चूँकि इस रोग में रोगी को कब्ज होती है इसलिए रोगी की कब्ज दूर करने के लिए जुलाब इस्तेमाल न करें । रोगी का भोजन बंद न करें ।
  • मरीज को पूर्ण विश्राम की आवश्यकता होती है इसलिए उसे पूर्ण विश्राम करवाएं |
  • मरीज की मुहं की सफाई का ध्यान रखे एवं प्रतिदिन गर्म पानी से शरीर को स्पंज करके कपड़े बदलवाए जा सकते हैं |
  • रोगी के मलमूत्र Disinfect करने के बाद उसे नष्ट करने की उचित व्यवस्था करवाएं ।
  • टाइफाइड से ग्रसित मरीज को पर्याप्त व संतुलित आहार दें जिसमें उचित मात्रा में प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट्स व विटामिन्स हो ।
  • रोगी को इलेक्ट्राल का घोल भी देना चाहिए जिससे उसके शरीर का Electrolyte Balance ठीक ठाक बना रहे |
  • मरीज को तरल पदार्थ ज्यादा दें । इसमें नारियल पानी, मौसमी का रस, पतला दही, चाय, दूध में हालिक्स, बोर्नविटा या GRD मिलाकर देने के साथ । दाल का पानी, मूंग की दाल की पतली खिचड़ी भी दे सकते हैं । ज्यादातर रोगी मानते हैं कि चावल हानिकारक होता है । परन्तु यह गलत है ।
  • रोगी के मुंह का स्वाद बदलने को उसे फल खाने को दें। बाजार की बनी हुई व तली चीजें खाने को नहीं दें। पानी उबाल कर ठंडा कर लें व उसमें ग्लूकोज मिलाकर दें। एक दिन में रोगी को 2-3 लीटर तरल पदार्थ देने चाहिए ।

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