डायबिटीज में इंसुलिन के स्रोत किस्मे एवं लेने की विधि

डायबिटीज के उपचार में इंसुलिन संजीवनी के समान है । टाइप-2 डायबिटीज में इंसुलिन कठिन समय की साथी है और टाइप-1 डायबिटीज में जीवन-अमृत | जब-जब कठिन घड़ी आती है, यह डायबिटीज के रोगी को जीवन प्रदान करती है । जरूरत के समय इससे बचना सरासर गलत है; इससे रोग अनावश्यक ही बिगड़ जाता है । पर इसके इस्तेमाल के अपने नियम हैं । जिनसे परिचित होना जरूरी है । अब इंसुलिन अपने शुद्ध प्राकृतिक रूप में भी उपलब्ध है-वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीके खोज ली हैं कि दवा कंपनियाँ इसकी खेती करने लगी हैं ।

डायबिटीज में इंसुलिन

पूरा आर्टिकल (लेख) एक नज़र में.

डायबिटीज में इंसुलिन की महत्वता:

इंसुलिन को अगर हम संजीवनी कहें तो जरा भी गलत नहीं होगा । सच्चाई यह है कि टाइप-1 डायबिटीज में उसके बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती । इसी तरह टाइप-2 डायबिटीज में भी जब दवाओं से काम नहीं चलता, तब इंसुलिन से ही बात बनती है । सचमुच डायबिटीज में इंसुलिन मुश्किल वक्त पर काम आनेवाली सबसे अच्छी साथी है । कैसी भी कठिनाई हो-शरीर पर रोगाणुओं का तेज हमला हो, फेफड़ों या शरीर के किसी अंग की टी.बी. हो जाए, आँखों या गुर्दो में डायबिटीज के दुष्परिवर्तनों से स्थिति अधिक बिगड़ जाए, दिल का दौरा | या फालिज हो जाए, किसी बड़े ऑपरेशन की जरूरत आ पड़े, डायबिटीज इतनी बिगड़ जाए कि शरीर की जैव-रासायनिकी बिल्कुल असंतुलित हो जाए और बेहोशी घिरने लगे-इंसुलिन ही जीवन-नैया पार लगाती है । ऐसे में डायबिटीज-रोधी गोलियाँ काम नहीं कर पातीं ।  किसी स्त्री को डायबिटीज हो और वह गर्भधारण करना चाहे, तो उसके लिए भी इंसुलिन से बढ़िया कुछ नहीं । डायबिटीज-रोधी गोलियाँ गर्भ में पनप रहे शिशु के स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकती हैं । डायबिटीज में इंसुलिन के बारे में समाज में अनेक गलतफहमियाँ व्याप्त हैं । यह सोच आम है कि अगर कोई एक बार इंसुलिन लेना शुरू कर दे तो सारी जिंदगी उसके चंगुल में फंसा रहता है । टाइप-2 डायबिटीज के कई रोगी इसी गलतफहमी में जरूरी होने पर भी इंसुलिन नहीं लेते और अनावश्यक ही अपने रोग को बिगाड़ लेते हैं । सच यह है कि टाइप-2 डायबिटीज में इंसुलिन को कठिन समय से पार पाने के बाद आसानी से बंद किया जा सकता है और दुबारा डायबिटीज-रोधी गोलियों पर लौटा जा सकता है ।

इंसुलिन के स्रोत (Sources Of Insulin in Hindi):

इंसुलिन का सबसे बड़ा प्राकृतिक स्रोत जंतु-अग्न्याशय है । गाय, बैल और भैंसों के अग्न्याशय से बोवाइन इंसुलिन और सूअरों के अग्न्याशय से पोर्सीन इंसुलिन प्राप्त की जाती है । जंतुओं के शरीर से प्राप्त कर इसका विशुद्धीकरण किया जाता है और इसे शीशियों में भरा जाता है, जो रोगियों के काम आती है । मनुष्य के शरीर में बननेवाली इंसुलिन, बोवाइन और पोर्सीन इंसुलिन, तीनों ही 51 एमिनो एसिड से बनी हैं । पर तीनों की बनावट में थोड़ा-थोड़ा अंतर है । मानव इंसुलिन | और पोर्सीन इंसुलिन के बीच 50 एमिनो एसिड एक जैसे हैं लेकिन एक एमिनो एसिड फर्क है, जबकि मानव और बोवाइन इंसुलिन की बनावट में 48 एमिनो एसिड एक जैसे हैं और तीन एमिनो एसिड फर्क-फर्क हैं । इस फर्क के कारण ही कुछ लोगों को बोवाइन या पोर्सीन इंसुलिन माफिक नहीं आती । पर फिर भी ऐसा बहुत कम होता है कि किसी को दोनों ही किस्म की इंसुलिन माफिक न आए । बाजार में बोवाइन, पोर्सीन और मानव, तीनों ही किस्म की इंसुलिन मिलती है । स्वाभाविक सी बात है कि तीनों का असर एक-दूसरे से थोड़ा-थोड़ा फर्क है । अपने लिए इंसुलिन खरीदते हुए यह छोटी सी बात सदा ध्यान रखें और हर बार एक जैसी इंसुलिन ही लें । मानव इंसुलिन हूबहू हमारे शरीर में बननेवाली इंसुलिन जैसी होती है । इसे जीन-इंजीनियरिंग करके बनाया गया है और यह विशुद्ध रूप से शाकाहारी है । पर यह थोड़ी महँगी है और सिर्फ उन्हीं रोगियों के लिए आवश्यक है, जिन्हें जंतु-इंसुलिन माफिक नहीं आती ।

इंसुलिन की किस्में (Types of insulin in Hindi):

डायबिटीज में इंसुलिन की बात करें तो बाजार में कई किस्म की इंसुलिन मिलती हैं । प्रत्येक की अपनी खूबियाँ और खामियाँ हैं । यह शरीर में पहुँचने के बाद कितने घंटों तक काम करती है, इस आधार पर उसके तीन प्रमुख वर्ग हैं ।

  1. सामान्य (रेगुलर) इंसुलिन :

कुछ इंसुलिन थोड़े समय के लिए ही काम करती हैं । इन्हें प्लेन या रेगुलर इंसुलिन कहते हैं । जैसे, एक्टरैपिड (नोवो नारडिस्क कंपनी), पोर्सीन फास्टएक्ट (यूएसवी कंपनी), ह्यूमइंसुलिन-आर (एलाई लीली कंपनी), और ह्यूमन एक्टरैपिड (नोवो नारडिस्क कंपनी)। ये पानी की तरह दिखती हैं । इनका असर टीका लगने के आधे घंटे बाद शुरू होता है और दो से चार घंटे में चरम पर पहुँच जाता है । इस इंसुलिन का असर छह घंटे तक रहता है ।

  1. लेंटे तथा एन.पी.एच. इंसुलिन:

दूसरा वर्ग मध्यम दर्जे की लेंटे तथा एन.पी.एच. इंसुलिन का है । लेंटे इंसुलिन बाजार में ह्यूमन मोनोटाङ (नोवो नारडिस्क कंपनी) और ह्यूमन जिन्यूलिन (साराभाई कंपनी); तथा एन.पी.एच. इंसुलिन, बोवाइन लोंगएक्ट (यूएसवी कंपनी), ह्यूमन लोंगएक्ट (यूएसवी कंपनी) और ह्यूमन इंस्यूलाटार्ड (नोवो नारडिस्क कंपनी) सहित कई नामों से मिलती है । इनका रंग दूधिया होता है । ये दो घंटों में अपना असर दिखाना शुरू करती हैं, इनका असर आठ घंटों में अपने शिखर पर पहुँच जाता है, फिर यह धीरे-धीरे कम होता जाता है और 24 घंटों में बिल्कुल खत्म हो जाता है ।

  1. पी.जेड.आई. और अल्ट्रालेंटे इंसुलिन:

कुछ इंसुलिन काफी लंबे समय तक काम करती हैं । पी.जैड.आई. इंसुलिन और अल्ट्रालेंटे इंसुलिन (ह्यूमइंसुलिन-यू, एलाई लीली कंपनी) पी. जैड. आई. और अल्ट्रालेंटे इंसुलिन

इनमें प्रमुख हैं । ये भी दूधिया रंग की होती हैं और इनका असर सात घंटों पर शुरू होकर, 22 घंटों में शिखर पर पहुँच जाता है । इनका कुल असर 36 घंटे तक रहता है । इसीलिए उन पर नियंत्रण रख पाना थोड़ा मुश्किल साबित होता है और उनका कम इस्तेमाल होता है ।

  1. इंसुलिन सम्मिश्रण

डायबिटीज में इंसुलिन की बात करें तो कभी-कभी प्लेन और लेटे या एन.पी.एच. इंसुलिन को मिलाकर लेने की भी जरूरत होती है । ऐसे में यह सावधानी बरतनी जरूरी है कि पहले सिरिंज में प्लेन इंसुलिन भरें और फिर लेटे या एन.पी.एच. इंसुलिन । बाजार में बने-बनाए इंसुलिन सम्मिश्रण भी मिलते हैं । जैसे, ह्यूमइंसुलिन के नाम से मिलनेवाले मिश्रण में 30 प्रतिशत एक्ट्रापिड इंसुलिन और 70 प्रतिशत आइसोफेन इंसुलिन होती है ।

डायबिटीज में इंसुलिन की खरीद और रख-रखाव:

अलग-अलग ताकत की इंसुलिन सबकी सहूलियत के लिए इंसुलिन दो अलग-अलग ताकत में भी बनाई जाती है । किसी शीशी में बंद इंसुलिन किस ताकत की है यह मालूम करने के लिए यह जानना जरूरी है कि एक मिलीलीटर में इंसुलिन के कितने यूनिट हैं । या तो प्रति मिलीलीटर इंसुलिन के 40 अंतरराष्ट्रीय यूनिट (आई.यू.) होते हैं, और या यह 100 अंतरराष्ट्रीय यूनिट (आई.यू.) प्रति मिलीलीटर की ताकत में होती है । इसीलिए कैमिस्ट से इंसुलिन खरीदते समय यह जरूर ध्यान रखें कि आप अपनी जरूरत की इंसुलिन ही ले रहे हैं ।

शीशी में कितनी इंसुलिन आती है  

डायबिटीज में इंसुलिन की जरुरत होने पर ध्यान रहे की इंसुलिन छोटी-छोटी शीशियों में आती है । इन शीशियों पर रबड़ का ढक्कन चढ़ा रहता है । एक शीशी में 10 मिलीलीटर इंसुलिन होती है । एक बार में जितनी इंसुलिन चाहिए हो, उतनी सिरिंज में भरने के बाद बची हुई इंसुलिन आप आगे इस्तेमाल कर सकते हैं ।

एक्सपायरी डेट का ध्यान रखें

इंसुलिन की हर शीशी पर एक्सपायरी डेट अंकित होती है । इस तारीख के बाद यह इस्तेमाल नहीं की जानी चाहिए । खरीदते हुए और इंसुलिन लेते समय यह देख लें कि यह तारीख निकल तो नहीं गई है ।

घर पर और सफर में इंसुलिन का रखरखाव:

डायबिटीज में इंसुलिन की जरुरत पड़ने पर यह जान ल्रेना जरुरी है की इंसुलिन की शीशियाँ एक-दो महीने के लिए बड़ी आसानी से घर पर 25 से 30 डिग्री सेल्सियस के सामान्य तापमान पर रखी जा सकती हैं।  लेकिन ध्यान रखें कि उन पर सीधी रोशनी न पड़े । गर्मियों के दिनों में इन्हें आप या तो फ्रिज में या पॉलीथिन में लपेटकर ठंडे पानी के घड़े में रख सकते हैं । फ्रिज में रखें तो ध्यान रहे कि इन्हें फ्रीजर (बर्फ जमानेवाले खाने) में नहीं, बल्कि मक्खन के लिए बने हुए खाने में रखें ।  सफर के दौरान इंसुलिन की शीशियों को पॉलीथिन में लपेटकर ठंडी थर्मस में रखें । हवाई जहाज की यात्री केबिन चूँकि वातानुकूलित होती है, इसलिए इन्हें अपने पास हैंडबैग में रखना सबसे बेहतर है । अधिक तापमान पर रहने से इंसुलिन असर खो देती है, इसलिए उसके रख-रखाव में सावधानी बरतना बहुत जरूरी है । कभी भी ठंडे तापमान से निकली इंसुलिन एकदम से इस्तेमाल न करें । कम से कम आधे घंटे के लिए उसे पहले कमरे के सामान्य तापमान पर रखें, इसके बाद ही प्रयोग में लाएँ । ठंडी इंसुलिन का टीका लेने से यह काफी दर्द करता है ।

डायबिटीज में इंसुलिन कैसे लें     

डायबिटीज में इंसुलिन लेने के लिए दस वर्ष से अधिक उम्र के सभी मरीजों के लिए अच्छा यही है कि खुद टीका लगाना सीख लें । डॉक्टर, नर्स या कम्पाउंडर पर आश्रित रहना व्यावहारिक नहीं है । अगर टीका खुद न लगा सकें, तो अच्छा यही होगा कि यह दायित्व कोई परिवारजन सँभाल ले । डायबिटीज में इंसुलिन लेने का काम जरा भी मुश्किल  नहीं है और इसे कोई भी सीख सकता है । शुरू में एक-दो बार डॉक्टर की देखरेख में अभ्यास कर लें तो हिम्मत बँध जाएगी और आगे जरा भी परेशानी नहीं होगी । घर पर इंसुलिन की शीशी, स्पिरिट, रूई और इंसुलिन-सिरिंज की एक निश्चित जगह बना लें ताकि एक-एक चीज के लिए हर बार भागना न पड़े । सलीके से रखी चीजें आसानी से मिल जाती हैं और उन्हें तलाशने में समय नष्ट नहीं होता ।

सिरिंज में इंसुलिन कैसे भरें

डायबिटीज में इंसुलिन लेने के लिए इंसुलिन को  सिरिंज में भरने की आवश्यकता होती है जिसकी सही विधि का वर्णन हम निम्नवत करेंगे |

  • सबसे पहले पानी और साबुन से हाथ धोएँ ।
  • यदि दूधिया किस्म का इंसुलिन इस्तेमाल करें, तो घोल को एकरूप करने के लिए शीशी को हथेली पर रखकर दोनों हाथों के बीच धीरे-धीरे घुमाएँ, शीशी को झटके से न हिलाएँ ।
  • अब शीशी पर लगे रबड़ के ढक्कन को स्पिरिट के फाहे से साफ करें ।
  • जिस मात्रा में इंसुलिन लेनी हो, सिरिंज में उतनी ही हवा भरें ।
  • इंसुलिन की शीशी सीधी रखते हुए, सूई से उसका ढक्कन बींधकर सूई शीशी के अंदर ले जाएँ । सिरिंज का पिस्टन दबा दें ताकि हवा शीशी में चली जाए ।
  • शीशी सिरिंज पर उलट लें, अब सिरिंज का पिस्टन बाहर की ओर खींचें । जितनी मात्रा में इंसुलिन चाहिए, उससे पाँच यूनिट अधिक इंसुलिन सिरिंज में भर लें । यदि सिरिंज में हवा के बुलबुले न हों, तो अतिरिक्त मात्रा शीशी में लौटा दें ।
  • डायबिटीज में इंसुलिन लेते समय यदि सिरिंज में हवा के बुलबुले आ जाएँ, तो उन्हें निकालना
  • जरूरी है । सिरिंज में जहाँ बुलबुले हों, वहाँ उँगुली से हल्की-हल्की थाप दें । इससे बुलबुले ऊपर की ओर चले जाएँगे । अब पिस्टन से उन्हें शीशी में वापस कर दें । ये बुलबुले खुद में खतरनाक नहीं होते, पर इनके रहने से इंसुलिन की सही मात्रा मालूम नहीं हो पाती ।
  • अब सूई और सिरिंज को इंसुलिन की शीशी से बाहर खींचकर समतल सतह पर रख दें । ध्यान रखें कि सूई किसी चीज से छुए नहीं ।

टीका लगाने की विधि:

    • डायबिटीज में इंसुलिन को त्वचा के ठीक नीचे (सबक्यूटेनियस टीशू में) इंजैक्ट
    • करना चाहिए, मांसपेशी में नहीं ।
    • इंसुलिन बाँह के ऊपरी भाग में बाहर की तरफ, जाँघ के ऊपरी भाग में आगे की तरफ, कूल्हे पर या पेट के किसी भी हिस्से में (नाभि या कमरबंद का क्षेत्र छोड़कर) कहीं भी ली जा सकती है । टीका लगाते समय कहीं गलती से सूई ज्यादा गहरी न चली जाए इससे बचने के लिए कम से कम 1/2 इंच लंबी सूई का इस्तेमाल करें । मांसपेशी में इंसुलिन लगाना ठीक नहीं होता; इससे इंसुलिन बहुत तेजी से जज्ब हो जाती है ।
    • टीका हर बार किसी नई जगह पर लगाएँ । स्थान बदलते रहने से शरीर में गाँठे नहीं बनतीं । इंसुलिन लेने के तुरंत बाद खेलकूद या व्यायाम का कार्यक्रम हो, तो टीका जाँघों या बाँहों पर न लगाएँ । व्यायाम करने पर इन अंगों से इंसुलिन अधिक तेजी से जज्ब हो जाती है ।
    • शरीर के जिस भाग में टीका लगाना हो, उसे स्पिरिट के फाहे से साफ करें । इसके लिए फाहे को त्वचा पर गोलाकार रूप से घुमाएँ, पहले बीच वाला हिस्सा साफ करें और फिर बाहर की ओर जाते जाएँ । कुछ सैकेंड तक स्पिरिट के सूखने का इंतजार करें ।
    • अब अपने दाहिने हाथ की अँगुलियों में सिरिंज पकड़ लें । ध्यान रखें कि सूई किसी चीज से न छुए । दूसरे हाथ की अँगुलियों से, त्वचा की दो इंच मोटी तह ऊपर उठाएँ । अब सूई 45 डिग्री से 90 डिग्री के कोण पर झटके से त्वचा के भीतर घुसा दें ।
  • त्वचा की तह नीचे छोड़ दें । एक हाथ से सिरिंज को स्थिर रखते हुए, दूसरे हाथ के अँगूठे से सिरिंज का पिस्टन नीचे की तरफ दबाएँ ताकि इंसुलिन शरीर में चली जाए ।
  • टीका पूरा होते ही सूई और सिरिंज बाहर खींच लें । त्वचा को स्पिरिट के फाहे से साफ़ करें पर मलें नहीं |

डायबिटीज में इंसुलिन के लिए बारीक सूइयाँ, पेननुमा सिरिंज

अब इंसुलिन लेने के लिए शीशे की सिरिंज और मोटी सूइयों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं रही है । आधुनिक टेक्नोलॉजी से बनी अत्यधिक बारीक सूइयाँ और प्लास्टिक के डिसपोजेबल सिरिंज उपलब्ध होने से अब इंसुलिन लेना लगभग पीड़ारहित हो गया है । शीशे की सिरिंज के साथ यह सीमा है कि उसे इस्तेमाल करने से पहले हर बार उबालना पड़ता है । प्लास्टिक की डिसपोजेबल इंसुलिन सिरिंज इस्तेमाल करने से यह झंझट नहीं रहता । डिसपोजेबल होने के बावजूद इसे तब तक इस्तेमाल कर सकते हैं जब तक सूई की नोक बिगड़े नहीं । डायबिटीज में इंसुलिन लेने के बाद यानिकी हर बार इस्तेमाल के बाद सिरिंज कवर में बंद करके रख दें ताकि यह दूषित न हो । यह ध्यान रखें कि सूई की नोक कहीं इधर-उधर न छुए । नई सिरिंजों पर मात्रा इंगित करनेवाले निशान भी साफ-साफ अंकित रहते हैं । इससे कमजोर नजरवाला व्यक्ति भी उन्हें आसानी से पढ़ सकता है । इंसुलिन सिरिंजों की यह विशेषता है कि इन पर सूइयाँ पहले से ही चढ़ी होती हैं और इन्हें उतारना-चढ़ाना नहीं पड़ता ।

इंसुलिन पेन क्या होता है

कुछ वर्षों से पेन की शक्ल के इंसुलिन सिरिंज भी बनने लगे हैं । जैसे आधुनिक पेनों में स्याही की कार्टरीज लगी रहती है, वैसे ही इंसुलिन पेन में इंसुलिन की कार्टरीज लग जाती है । इससे इंसुलिन लेना पहले के मुकाबले बहुत आसान और सुविधाजनक हो गया है । जेब से पेन निकालें और जब चाहें तब इंसुलिन ले लें । सिर्फ पेन के छोर पर बनी नॉब को इतना घुमाने भर की जरूरत है कि जरूरी मात्रा में इंसुलिन बाहर आ जाए और पेन के अगले छोर पर लगी महीन सूई से शरीर के भीतर चली जाए । डायबिटीज में इंसुलिन लेने के लिए पेन में एक समय पर एक साथ 300 यूनिट इंसुलिन भरकर रखी जा सकती है । यह पेन किसी आम पेन की तरह जेब या पर्स में रखा जा सकता है और इससे कहीं पर भी और किसी भी समय इंसुलिन ली जा सकती है । यह पेन नोवोपेन, ह्यूमापेन और दूसरे कई नामों से देश में उपलब्ध है ।

ऑटो-इंजेक्टर सिरिंज द्वारा इंसुलिन लेना:

पिछले कुछ वर्षों में ऑटो-इंजेक्टर इंसुलिन सिरिंज भी बनने लगे हैं । इनमें स्प्रिंग-प्रणाली का इस्तेमाल किया गया है । इंजेक्टर को त्वचा पर रखकर स्प्रिंग दबाने से भीतर से एक सूई बाहर निकलती है और त्वचा को बांधकर भीतर इंसुलिन इंजेक्ट कर देती है ।

डायबिटीज में इंसुलिन लेने में सावधानियां एवं सुझाव:

डायबिटीज में इंसुलिन लेने की कुछ सावधानियाँ और सुझाव पर वार्तलाप करेंगे तो इंसुलिन किस किस्म की, किस मात्रा में और कब-कब ली जानी है, यह निर्णय प्रत्येक रोगी की जरूरत को आँककर लिया जाता है । लक्ष्य यह होता है कि जैसे भी हो, ब्लड शुगर सामान्य सीमा में आ जाए । इसके लिए मरीज को कितनी इंसुलिन चाहिए होगी, यह एकदम से नहीं कहा जा सकता । ब्लड शुगर को देखते हुए इंसुलिन शुरू की जाती है और साथ ही ब्लड शुगर पर लगातार नजर रखी जाती है । फिर जैसे-जैसे जरूरी समझा जाता है, वैसे-वैसे इंसुलिन धीरे-धीरे बढ़ाई जाती है । यह तालमेल बिठाने में कुछ दिन लग जाते हैं । जिनकी ब्लड शुगर बहुत ज्यादा घटती-बढ़ती रहती है, उन्हें बार-बार जाँच कराने की जरूरत होती है । पढ़ा-लिखा मरीज अपने डॉक्टर से यह गुर भी सीख सकता है कि ब्लड शुगर के घटने या बढ़ने पर डायबिटीज में इंसुलिन की मात्रा में क्या तब्दीली लाई जाए । हर इंसुलिन लेनेवाले के लिए यह जरूरी है कि वह हमेशा समय से भोजन करे । इसमें ढील बरतने से खून में ग्लूकोज़ की मात्रा एकाएक घट सकती है और जीवन खतरे में पड़ सकता है । यही हाइपोग्लाइसीमिया है, जिसके लक्षणों की जानकारी होना बेहद जरूरी है । कभी यह लक्षण प्रकट हों तो तुरंत थोड़ी-सी चीनी, बिस्कुट या ग्लूकोज़ ले लें । यदि यह समस्या बार-बार उठे, तो डॉक्टर से सलाह लें । इस सूरत में डायबिटीज में इंसुलिन की मात्रा दुबारा से तय करनी होगी । हर रोगी के लिए अच्छा होगा कि वह अपने पास हर समय डायबिटिक आइडेंटिफिकेशन कार्ड जरूर रखे । कार्ड पर अपना नाम, पता और टेलीफोन नंबर, डॉक्टर का पता और टेलीफोन नंबर, और कितनी इंसुलिन ले रहा है, इस बाबत स्पष्ट जानकारी दर्ज होनी चाहिए । आपातकालीन अवस्था में यह कार्ड जीवनदायी साबित हो सकता है ।

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