जानिए डायबिटीज में संक्रमण की कौन कौन सी बीमारियाँ हो सकती हैं |

डायबिटीज में संक्रमण की बीमारियों का जिक्र करें तो कहा जा सकता है की डायबिटीज और संक्रामक बीमारियों के बीच चोली-दामन का साथ है । जब-जब ब्लड शुगर पर से नियंत्रण हटता है, तब तब हमारी रोगाणुओं से जूझने की ताकत कम हो जाती है । मनुष्य शरीर में जगह-जगह मोर्चा बाँधे सिपाही जिन्हें श्वेत रक्त कण कहा जाता है ठीक से काम नहीं कर पाते और परिणामस्वरूप औने-पौने रोगाणु भी बेधड़क शरीर में घुस आते हैं । कोई भी संक्रमण होने पर ब्लड शुगर भी बढ़ जाती है । इसीलिए डायबिटीज में संक्रमण की बीमारी का पहला सुराग पाते ही इलाज शुरू कर देना बहुत जरूरी होता है । लेकिन कभी कभी डायबिटीज का निदान ही संक्रमण होने पर होता है ।

डायबिटीज में संक्रमण

डायबिटीज में संक्रमण क्यों होता है

डायबिटीज में संक्रमण की बात करें तो बढ़ी हुई ब्लड शुगर संक्रामक बीमारियों के लिए जैसे एक आमंत्रण है । डायबिटीज पर नियंत्रण न रहे, तो हमारी रोगाणुओं से जूझने की ताकत ही कम हो जाती है । शरीर के सिपाही श्वेत रक्त कण-मुस्तैदी से काम नहीं कर पाते और पिद्दी से रोगाणु भी शेर बन बेधड़क शरीर में घुस आते हैं । इतना ही नहीं उनकी आक्रामकता भी बढ़ जाती है जिससे संक्रमण लंबा खिंच जाता है और आसानी से काबू में नहीं आता । इस संक्रमण का ब्लड शुगर पर भी बुरा असर पड़ता है । ब्लड शुगर पहले से और बढ़ जाती है और तेज संक्रमण में कीटो-एसिडोसिस होने का भी डर होता है । इसीलिए संक्रमण का पहला सुराग मिलते ही तुरंत उसके इलाज के उपाय करना बहुत जरूरी होता है । डायबिटीज के कारण कभी-कभी संक्रमण के सभी लक्षण छिप जाते हैं । ऐसे में अंदर का रोग पकड़ पाना मुश्किल होता है । लेबोरेटरी में खून, मूत्र या किसी दूसरी जाँच के होने पर ही रोग का पता चल पाता है । उस समय आपका डॉक्टर ही मामले की नजाकत को ठीक से समझ सकता है । जैसे ही संक्रमण का पता चले, दवा शुरू करने में देर करना ठीक नहीं । डायबिटीज में संक्रमण शरीर के किसी भी अंग में हो सकता है ।

डायबिटीज में होनेवाले महत्त्वपूर्ण संक्रामक रोगों की लिस्ट :

डायबिटीज में होने वाले मुख्य संक्रामक बीमारियों की लिस्ट कुछ इस प्रकार से है |

श्वसन प्रणाली से सम्बंधित रोग

  • फेफड़ों की तपेदिक (टी.बी.)
  • म्यूकॉर फडूंद से श्वास प्रणाली का तीव्र संक्रमण (म्यूकॉर माइकोसिस)

जठरांत्र प्रणाली  से जुड़े रोग

  • पित्त की थैली की सूजन जिसमें थैली में रोगाणु संक्रमण के कारण वायु आ जाती है (इमफाइसीमेटस कॉलीसिस्टाइटिस)।
  • मुँह या खाने की नली में कैंडिडा का संक्रमण (कैंडिडियासिस)

मूत्रीय प्रणाली  से जुड़े रोग

  • गुर्दो का तीव्र संक्रमण (इमफाइसीमेटस पाइलोने फराइटिस)
  • यू.टी.आई.

त्वचा से जुड़े संक्रमण

  • कैंडिडा इंफेक्शन
  • बाल-तोड़
  • कारबंकल (स्टेफलोकॉकाई बैक्टीरिया द्वारा त्वचा के भीतर गहरी पैठ)
  • एरिथ्रजमा
  • नाखूनों की तलहटी में संक्रमण (पेरोनीकिया)

कोमल ऊतकों का संक्रमण

  • पैर का व्रण (अल्सर)
  • कान के बाहरी भाग का संक्रमण
  • नेक्रोटाइजिंग फेशियाइटिस
  • नेकरोटाइजिंग सेलूलाइटिस
  • ओस्टियोमाइलाइटिस

टाइप-2 डायबिटीज के कई रोगियों में डायबिटीज का पता ही किसी संक्रमण के होने पर चलता है । निमोनिया, टी.बी. या किसी दूसरे संक्रामक रोग के होने पर जब जाँच-पड़ताल की जाती है तब कहीं जाकर यह बात खुलती है कि इनके होने या आम दवाओं से ठीक न होने या अलग-सा व्यवहार दिखाने के पीछे दरअसल डायबिटीज का हाथ है ।

फेफड़ों की तपेदिक (टी.बी.)

डायबिटीज में संक्रमण की बीमारियों में फेफड़ों की तपेदिक (टी.बी.) भारतवर्ष में फेफड़ों की तपेदिक बहुत बड़े पैमाने पर फैली हुई है । डायबिटीज के होते हुए यह कभी भी और किसी भी उम्र में प्रकट हो सकती है । इसके दो कारण हैं । एक कि टी.बी. पैदा करने वाले बैक्टीरिया डायबिटीज से घिरे शरीर में आसानी से पैठ कर सकते हैं । दूसरा कि ये बैक्टीरिया यदि पहले से शरीर में सुप्त पड़े हों तो बढ़ी हुई ब्लड शुगर उनके बढ़ने में आग पर घी का काम करती है । डायबिटीज में यदि कभी वजन बिना किसी स्पष्ट कारण के कम होने लगे, या इंसुलिन की जरूरत एकाएक बढ़ जाए या खाँसी, बुखार और छाती में दर्द हो जो सामान्य दवाओं से ठीक न हो, तो तपेदिक के लिए जाँच अनिवार्य हो जाती है । समय से रोग पहचान में आ जाए तो उसे दवाओं से बहुत आसानी से खत्म किया जा सकता है । यह इलाज पूरे छह महीने चलता है । कुछ रोगी लक्षण दूर होते ही दवा छोड़ देते हैं, पर यह ठीक नहीं । इसका असर बुरा होता है । इससे तपेदिक दुबारा सक्रिय हो उठती है और उसका इलाज भी मुश्किल हो जाता है । कई बार इतने में भीतर छुपे टी. बी. के बैक्टीरिया अपनी संरचना बदल लेते हैं जिससे कि टी.बी. की सामान्य दवाएँ काम नहीं करतीं और रोग को जीतने के लिए अधिक महँगी और दूसरी रक्षा-पंक्ति की दवाएँ काम में लानी पड़ती हैं ।

डायबिटीज में संक्रमण की यू.टी.आई. बीमारी:

डायबिटीज में संक्रमण की बात करें तो डायबिटीज मूत्र में ग्लूकोज़ रोगाणुओं के लिए उर्वरक जैसा साबित होता है । उसकी मौजूदगी रोगाणुओं को बढ़ने का खूब मौका देती है । इसीलिए डायबिटीज में मूत्रीय तंत्र का संक्रमण (यू.टी.आई.) होने का अधिक जोखिम रहता है । मूत्रीय तंत्र में संक्रमण होने पर पेशाब में जलन होती है, चीस लगती है, ठंड लगकर बुखार आता है और काफी बेचैनी होती है । मूत्र में रोगाणुओं की जाँच (यूरिन कल्वर) कराने से रोग की पुष्टि हो जाती है और उचित ऐंटिबायोटिक दवा लेने से 10-14 दिन में संक्रमण दूर हो जाता है । मूत्रीय तंत्र के साधारण संक्रमण के अलावा डायबिटीज में गुर्दे के दो खास किस्म के संक्रमण भी देखे जाते हैं ।

नेक्रोटाइसिंग पेपीलाइटिस संक्रमण:

डायबिटीज में संक्रमण की बीमारियों में गुर्दो के संक्रमण में नेक्रोटाइसिंग पेपीलाइटिस प्रमुख है इस रोग में गुर्दों में उग्र किस्म की छूत लग जाने से उनके ऊतकीय टुकड़े नष्ट होकर मूत्र में जाने लगते हैं । इसे नेक्रोटाइसिंग पेपीलाइटिस कहते हैं । यह बहुत गंभीर किस्म का रोग है जिसमें तेज बुखार होता है, पुट्ठों में दर्द होता है, पेशाब में जलन होती है और खून जाता है । हालत तेजी से गिरती जाती है । रोग की पुष्टि मूत्र की जाँच, पेट के एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड से ही हो पाती है । उपचार के लिए ऐंटिबायोटिक दवाएँ, शरीर में पानी और इलैक्ट्रोलाइट्स की पूर्ति तथा ब्लड शुगर पर नियंत्रण जरूरी होता है ।

इमफाइसीमेटस पाइलोनेफराइटिस संक्रमण:

डायबिटीज में संक्रमण की इस बीमारी की बात करें तो इक्के-दुक्के मामलों में संक्रमण इतना तीव्र होता है कि गुर्दे पस और गैस से भर जाते हैं । इसे इमफाइसीमेटस पाइलोनेफराइटिस कहते हैं । इसके लक्षण भी नेकरोटाइजिंग पेपीलाइटिस जैसे होते हैं, पर रोगी की हालत ज्यादा गंभीर होती है । यह रोग अधिकतर ई. कोलाई नामक बैक्टीरिया से होता है । इसमें अक्सर ही ऐंटिबायोटिक दवाएँ अपना जादू नहीं दिखा पातीं और ऑपरेशन द्वारा रुग्ण गुर्दा बाहर निकालना पड़ता है ।

त्वचा और सतही ऊतकों का संक्रमण

डायबिटीज में ब्लड शुगर के बिगड़ने से त्वचा कई प्रकार के संक्रमणों से घिर सकती है । बार-बार बाल-तोड़ होता रह सकता है, किसी भी घाव को भरने में बहुत-बहुत दिन लग जाते हैं, त्वचा की गहराई में स्टेफाइलोकोकस बैक्टीरिया के घर करने (कारबंकल बनने) से पस बन सकती है । इन संक्रमणों से छुटकारा पाने का एक ही जरिया है कि शुरू में ही डॉक्टर से सलाह लेकर ऐंटिबायोटिक दवाएँ शुरू कर दें ।

एरिथ्रेज्मा संक्रमण:

डायबिटीज में संक्रमण की इस खास तरह की बीमारी होने की भी प्रबल आशंका रहती है । त्वचा पर एरिथ्रजमा होने पर जाँघों के भीतरी तरफ, बगलों में, पैरों की अँगुलियों के बीच और स्त्रियों के स्तनों के नीचे भूरे या लाल भूरे रंग के अलग-से दिखनेवाले चकत्ते बन जाते हैं । यह रोग कॉरनीबैक्टीरियम की विशेष उप-जाति से होता है । इसमें एरिथ्रोमाइसीन काम करती है ।

नेकरोटाइजिंग फेशियाइटिस संक्रमण:

डायबिटीज में संक्रमण की यह बीमारी पैरों, आँतों या गुह्य भाग में लगी किसी चोट के बाद शुरू हो सकती है और त्वचा के नीचे के ऊतक और रेशेदार पाशिका (फैशिया) में बहुत उग्र संक्रमण हो सकता है । इसे नेकरोटाइजिंग फैशियाइटिस कहते हैं । इसमें त्वचा और उसके नीचे के ऊतक गलते चले जाते हैं, उनसे दुर्गंध आती है और अन्दर से गहरे भूरे रंग का द्रव निकलता है । पुरुषों में यह संक्रमण अंडकोष तथा शिश्न का नाश कर सकता है । इसकी शुरुआत त्वचा में दुखन और लाली आने से होती है, फिर त्वचा नीली पड़ जाती है, उस पर फफोले उठ जाते हैं और गैंग्रीन से गलकर त्वचा नष्ट होती जाती है । ऐसे में रोगी की हालत काफी गंभीर हो जाती है और उसे तेज बुखार हो जाता है । इससे उबरने के लिए ऑपरेशन द्वारा रुग्ण ऊतक को साफ करना पड़ता है और नस (शिरा) से जेंटामाइसीन, ऐम्पीसिलीन त्था मेट्रोनिडाजोल जैसी दवाएँ देनी पड़ती हैं ।

नेकरोटाइजिंग सेलूलाइटिस संक्रमण:

गंभीरता की दृष्टि से नेकरोटाइजिंग सेलूलाइटिस भी नेकरोटाइजिंग फैशियाइटिस से किसी भी मायने में कम नहीं होती । फर्क सिर्फ इतना होता है कि इसमें रोगाणु मांसपेशी. और उसके पास के ऊतकों पर धावा बोलते हैं । यह संक्रमण प्रायः गुह्य भाग या पैरों में होता है । इसमें तत्परता से इलाज की जरूरत होती है । डायबिटीज में संक्रमण की इस बीमारी में लापरवाही बरतना खतरे से खाली नहीं है |

फाइकोमाइकोटिक गैंग्रीनस सेलूलाइटिस

डायबिटीज में संक्रमण की इस बीमारी की बात करें तो कई फफूद भी डायबिटीज में मौके की तलाश में रहते हैं । फाइकोमाइकोटिक गैंग्रीनस सेलूलाइटिस में ऊतकों के सूजने और गलने से लाल या सलेटी गोले के बीचोंबीच काला गला हुआ क्षेत्र नजर आता है । इसके इलाज के लिए पूरे रुग्ण क्षेत्र को काटकर साफ करना पड़ता है और एम्फोटेरिसिनबी दवा देनी होती है ।

मेलिगनेंट ओटाइटिस एक्सर्टना

डायबिटीज में संक्रमण की इस बीमारी में बाहर से कान के पर्दे तक फैली बाह्य-कान की नली में भी तीव्र संक्रमण हो सकता है । इसे मेलिगनेंट ओटाइटिस एक्सर्टना कहते हैं । यह बढ़ते-बढ़ते साथ में सटी कपाल की हड्डियों में भी पहुँच सकता है, जिससे जीवन जोखिम में पड़ जाता है । इसके लक्षण बहुत साधारण होते हैं : कान में दर्द होता है । और कान बहने लगता है, लेकिन बुखार नहीं होता । ई.एन.टी. विशेषज्ञ के पास जाते ही कान की जाँच होने पर रोग की पुष्टि हो जाती है । इलाज के लिए नस से ऐंटिबायोटिक देने पड़ते हैं । लेकिन संक्रमण मस्तिष्क के भीतर पहुँच जाए, तो मामला गंभीर बन जाता है और न्यूरोसर्जन की मदद लेनी पड़ सकती है ।

गैस गैंग्रीन

डायबिटीज के कारण पाँवों की धमनियों में खून का दौरा कमजोर पड़ जाता है । इससे कई प्रकार के कष्ट हो सकते हैं । मांसपेशियों में क्लास्ट्रीडिया के अलावा किसी दूसरे बैक्टीरिया की पैठ से गैस गैंग्रीन भी हो सकती है । इसे इन्फेक्टिड वेस्क्यूलर गैंग्रीन कहते हैं । इसमें ऐंटिबायोटिक लेने के साथ-साथ पैर की कुर्बानी भी देनी पड़ सकती है ।

डायबिटिक फुट संक्रमण:

डायबिटीज में संक्रमण की इस बीमारी को समझने से पहले हमें यह समझना होगा की जैसे-जैसे डायबिटीज पुरानी होती जाती है, वैसे-वैसे पैरों में तंत्रिकीय शोथ(न्यूरोपैथी) पैदा होने से पैर सुन्न हो जाते हैं और उनमें जख्म, दरारें और दबाव-बिंदु बन जाते हैं । इसके साथ ही धमनियों में खून का दौरा कमजोर हो जाता है । इन कठिन परिस्थितियों में छोटे-छोटे घाव भी भरने को नहीं आते और ठीक से देखभाल न की जाए तो घावों के गहरे जाने तथा पैर में गैंग्रीन उत्पन्न होने का जोखिम हो जाता है । हड्डियों में भी संक्रमण (ओस्टीयोमाइलाइटिस) हो सकता है । ये सभी रुग्णताएँ डायबिटिक फुट कहलाती हैं । पैर के गैंग्रीन से घिरने और गलने पर प्राणों पर संकट के बादल गहरा उठते हैं । ऐसे में जीवन बचाने के लिए पैर को काटना पड़ सकता है । इन समस्याओं से बचे रहने के लिए शुरू से ही पैरों की साफ-सफाई और देखभाल पर ध्यान देना जरूरी है । इसके साथ-साथ यह बात भी गाँठ बाँध लें कि डायबिटीज में संक्रमण से बचने के लिए पैर में हुए छोटे-से-छोटे जख्म की भी कभी अनदेखी न करें | और बिल्कुल लगकर मरहम-पट्टी कराएँ और दवा लें । हो सकता है कि इसी से पैर कटने से बच जाए । डायबिटीज में बिगड़ी हुई ब्लड शुगर कई प्रकार के संक्रमणों को बढ़ावा देती है । खून में ग्रुप-बी स्ट्रेप्टोकोकाई, गॉल-ब्लैडर में क्लॉस्ट्रीडिया तथा मस्तिष्क पर फहूँद का हमला भी हो सकता है । जान के लिए खतरा बन सकने वाले इन संक्रमणों से बचने का सबसे सार्थक उपाय ब्लड शुगर को वश में रखना है ।

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