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पुरुष प्रजनन प्रणाली

पुरुष प्रजनन तंत्र Male reproductive system in Hindi

पुरुष प्रजनन तंत्र की बात करें तो मानव शरीर में यह सिस्टम एक निश्चित समय पर कार्य करना शुरू करता है प्रजनन के लिए मनुष्य द्वारा यौन सिस्टम का उपयोग किया जाता है | जिस उम्र में मानव शरीर में यह सिस्टम कार्य करना शुरू करता है उसको यौवन कहा जाता है | कहने का आशय यह है की मनुष्य एक निश्चित उम्र के पश्चात ही प्रजनन क्रिया को पूर्ण कर पाने में सक्षम होता है अर्थात जिस उम्र में उसमे इतनी सक्षमता आ जाती है की वह प्रजनन क्रिया को पूर्ण कर सके उम्र के उस पड़ाव को यौवन कहा जाता है | पुरुष प्रजनन तंत्र में अनेकों प्रजनन अंग सम्मिलित हैं जिनका इस प्रणाली के अंतर्गत अपना अपना कार्य होता है | तो आइये जानते हैं इन पुरुष प्रजनन अंगों के बारे में |

पुरुष प्रजनन प्रणाली

मानव लिंग की बनावट (structure of human pennis in hindi):

लिंग को शिश्न, पुरूषेद्रिय, गुप्तेंद्रिय, मूत्रनाल और पेनिस आदि नामों से भी पुकारा जाता है । लिंग के द्वारा ही मानव शरीर से मूत्र और वीर्य बाहर निकलते हैं । इसके द्वारा ही मैथुन क्रिया को संपन्न किया जाता है और शुक्राणुओं को योनि के अन्दर पहुँचाया जाता है । मानव लिंग की मुख्य रूप से दो अवस्थाएं होती हैं इनमे पहली अवस्था में लिंग शिथिल अर्थात ढीला होता है और दूसरी स्थिति में  उत्तेजित होकर लम्बा एवं सख्त हो जाता है । हालांकि पुरुष प्रजनन प्रणाली में इसका अहम् योगदान है और स्वाभाविक अवस्था में यह ढीला-ढाला रहता है । लेकिन जब इसमें रक्त भर जाता है तो यह उत्तेजित हो जाता है । उत्तेजित हो जाने पर यह सख्त तथा लम्बा हो जाता है ।

पुरुष प्रजनन प्रणाली में लिंग की बाहरी बनावट:

पुरुष प्रजनन प्रणाली में भिन्न-भिन्न पुरूषों में पुरूषांग अर्थात लिंग की लम्बाई अलग-अलग हो सकती है । अक्सर देखा गया है की उत्तेजित अवस्था में लिंग का आकार प्रायः चार इंच से छः इंच लम्बा हो सकता है । इसका अगला उठा हुआ शंकाकार भाग पुरूषांगमुण्ड (सुपारी या मणि) कहलाता है । यह बहुत संवेदनशील होता है । मैथुन यानिकी सहवास के समय पुरूषों को इसी भाग पर आनंद का अनुभव होता है । इसमें आगे की ओर एक छिद्र होता है । इस छिद्र में से सामान्य अवस्था में मूत्र और मैथुन के समय में शुक्र अर्थात वीर्य निकलता है । पुरुष प्रजनन प्रणाली में लिंग की त्वचा बहुत ही पतली और कोमल होती है । पुरूषांगमुण्ड (सुपारी) के ऊपर की पतली त्वचा मैथुन के समय ऊपर को हट जाती है औद बाद में ऊपर आ जाती है । आमतौर पर यह त्वचा खाई के पीछे तक हट जाया करती है । इसको डाक्टरी में शिश्नाग्र त्वचा कहते हैं । यही त्वचा काटे जाने के बाद सुपारी स्पष्ट हो जाती है । इसके काटने की क्रिया को ही खतना कहते हैं । सुपारी की जड़ में मैल बैठ जाने के कारण कभी-कभी यह त्वचा तंग हो जाती है तो मूत्र करते समय या मैथुन करते हुए बड़ा कष्ट होता है । कुछ छोटे बच्चों में यह बहुत तंग होती है इसलिए वे मूत्र करते समय जोर लगाते हैं । इसके अलावा कभी कभी दर्द के कारण बच्चे चीख भी पड़ते हैं । ऐसा होने पर इस त्वचा को डाक्टर द्वारा काट देने से शिश्नाग्र खुल जाता है और बच्चे का सारा कष्ट दूर हो जाता है ।

पुरुष प्रजनन प्रणाली में अंडकोष की रचना :

हमारे पुरूषांग के नीचे एक थैली लटकी रहती है, जिसके दोनों तरफ अंडे जैसी दो गांठें होती है, जिनको अंडकोष कहते हैं । इनसे शुक्र (वीर्य) उत्पन्न होता है । यह थैली पतली खाल से बनी होती है, जिसके ऊपर बाल उगे होते हैं । यह खाल सिकुड़ और फैल सकती है । जाड़ों में यह अधिक सिकुड़ती है और गर्मियों में फैली रहती है और लटक जाती है । पुरुष प्रजनन प्रणाली में  इस थैली के भीतर एक पर्दा होता है जो बाहर से सीवन की तरह दिखाई देता है । थैली में दोनों ओर एक-एक अण्डग्रन्थि (Testes) होती है ।

अंडग्रंथि की बनावट और कार्य (Ovarian structure and Function in Hindi) :

पुरुष प्रजनन प्रणाली में अंडग्रंथियों को शुक्र ग्रंथियाँ भी कहते हैं । ये ग्रंथियां अंडे के आकार की अंडकोष में एक बाई तरफ और दूसरी दाई और लटकती रहती है । ये अंडग्रंथियों एक डोरी से जिसे अंडधारक रज्जु कहते हैं, द्वारा तिरछी लटकती रहती है, प्रत्येक अंडग्रंथि (शुक्रग्रंथि) में लगभग 1,000 मुड़ी हुई पतली नलियां होती हैं । ये अंड ग्रंथियां इन्हीं नलियां के गुच्छे हैं । प्रत्येक अंडग्रंथि की लम्बाई लगभग डेढ़ इंच, चौड़ाई एक इंच और मोटाई एक इंच से कुछ कम होती है । अंडग्रंथि के मुख्यतः दो कार्य होते हैं 1. शुक्र या वीर्य उत्पन्न करना और 2. ओज उत्पन्न करना ।

पौरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट ग्लैण्ड्स) पौरुष ग्रंथि की बनावट :

जहां मूत्रमार्ग शुरू होता है उसके चारों तरफ एक गांठ-सी होती है, जिसे पौरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट ग्लैण्ड) कहते हैं । यह मूत्राशय के आगे रहती है और मूत्राशय इसके पीछे रहता है । यह एक छोटी-सी और कठोर-सी ग्रंथि (गांठ) होती है, जिसकी शक्ल सुपारी के समान होती है । इसका भार लगभग 8 ग्राम होता है । बुढ़ापे में आमतौर पर यह ग्रंथि बढ़ जाती है, जिससे मूत्र करते समय पीड़ा महसूस होती है ।

 पौरूष ग्रंथि के कार्य :

पुरुष प्रजनन प्रणाली के अंतर्गत इस ग्रंथि में एक सफेद सा और चिकना तरल बनता

है, जो संभोग के समय वीर्य के साथ मिल जाता है । हमारे वीर्य में जो एक विशेष प्रकार की गंध आती है, वह इसी पौरूष ग्रंथि के स्त्राव (रस) की होती है । शुक्राणु सदा क्षारीय दशा में जीवित रहते हैं और अम्लता में नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि इस पौरूष ग्रंथि का स्त्राव (रस) क्षारीय, चिकना और पतला होता है, इसलिए शुक्रकीट इसमें अपनी गति बनाए रखते हैं ।

शिश्नमूल ग्रंथियों की बनावट :

पुरुष प्रजनन प्रणाली में पुरूषांग की जड़ में दायीं और बाई और दो छोटी-छोटी ग्रंथियां होती है, जिनको शिश्नमूल ग्रंथि कहते हैं । ये पीले रंग की और मटर के दाने जैसी होती है । ये भी एक प्रकार का तरल बनाती हैं, जो मूत्र नली को मूत्र निकालने से पहले चिकना और गीला कर देती है ।

शिशनमूल ग्रंथियों के कार्य :

इससे मूत्र का स्त्राव ठीक-ठीक और सरलतापूर्वक हो जाता है, इस ग्रंथि से एक नली निकलती है, जो एक इंच लम्बी होती है । पुरुष प्रजनन प्रणाली में यह नली पुरूषांग के मूत्रमार्ग में जाकर खुलती है और इस प्रकार इसके द्वारा इस ग्रंथि का रस शुक्र (वीर्य) में मिल जाता है।

शुक्र कीट या शुक्राणु:

पुरुष प्रजनन प्रणाली में शुक्राणु का अहम् योगदान होता है, वीर्य को सूक्ष्मदर्शक यंत्र द्वारा देखने से पता लगता है कि इसमें लाखों की संख्या में सूक्ष्म-अति सूक्ष्म जैसी आकृतियां कीड़े होती हैं । वीर्य की इन आकृतियों को शुक्र कीट (वीर्य कीट) या शुक्राणु (वीर्याणु) कहते हैं । इनकी शक्ल बहुत ही छोटी होती है, इसलिए हम इनको अपनी नंगी आंखों से नहीं देख सकते हैं । अणुवीक्षण यंत्र द्वारा देखने पर ये शुक्राणु लम्बे आकार के दिखाई देते हैं । इनका सिरा चपटा होता है । इनका आकार सर्प जैसा होता है अर्थात अगलता भाग गोल और चपटा, पूछ लम्बी, पतली और सूत्राकार होती है । सिर की लम्बाई 1/1000 इंच और इतनी ही चौड़ाई होती है । पूंछ 1/2000 से 1/4000 इंच तक लम्बाई में होती है । ये वीर्य कीट सजीव होते हैं और वीर्य में इस प्रकार चलते-फिरते हैं जिस प्रकार की जल में मछलियों के बच्चे । पुरुष प्रजनन प्रणाली में इनकी गति हमेशा आगे की ओर होती है । ये पूछ के सहारे तेजी से भागते हैं । एक बार के मैथुन में डेढ़ करोड़ तक शुक्राणु निकलते हैं । इनमें से केवल एक शुक्राणु से ही गर्भ स्थापित हो पाता है ।

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