बहुल गर्भ कारण पहचान सावधानियां Multiple pregnancy

गर्भ में एक साथ अगर दो या उससे अधिक भ्रूण हों तो उसे बहुल गर्भ अर्थात  multiple Pregnancy कहा जाता है । इतिहास एवं पुराणों में भी एक बार में एक से अधिक बच्चों के जन्म का वर्णन है । एक बार के गर्भ में यदि दो या अधिक स्वस्थ बच्चों का जन्म होता है, तब ऐसे बच्चे देखने में तो लुभावने लगते ही हैं, माँ को भी एक बार में परिवार पूर्ण लगने लगता है और कई महिलाएँ इसके बाद दोबारा गर्भाधान के झमेले में नहीं पड़ना चाहतीं । पर यह हमेशा संभव नहीं होता । एक से अधिक बच्चों के गर्भ में रहने पर अर्थात बहुल गर्भ की स्थिति में सामान्य गर्भ की अपेक्षा जटिलताओं की संभावना अधिक रहती है और मातृ मृत्यु-दर तथा शिशु मृत्यु-दर भी अधिक होता है । ऐसी स्थिति में अधिकांशतः समय पूर्व प्रसव हो जाता है, जिसका परिणाम होता है कमजोर बच्चों का जन्म । ऐसे बच्चों को जन्म के बाद मृत्यु की संभावना अधिक रहती है और कुछ को बाद में मानसिक कमजोरी का डर रहता है । शारीरिक विकृति भी ऐसे गर्भ में अधिक पाई जाती है । यह न केवल शिशु के लिए, बल्कि माँ के लिए भी जोखिम से भरा रहता है । सामान्य गर्भवतियों की अपेक्षा इनमें प्रीइक्लैंपसिया, प्रसव पश्चात् अत्यधिक रक्तस्राव एवं मातृ मृत्यु का भय अधिक रहता है ।

बहुल गर्भ multiple-pregnancy

बहुल गर्भ के कारण (Cause of multiple pregnancy in Hindi):

गर्भ में एक से अधिक बच्चे दो कारण से होते हैं और उसी के अनुसार उनके दो नाम भी हैं-मोनोजाइगोटिक (Monozygotic) और डाइजाइगोटिक (Dizygotic) ।

मोनोजाइगोटिक:

ये जुड़वाँ एक निषेचित डिंब के विकास की प्रक्रिया में दो या दो से अधिक भाग में बँट जाने के कारण उत्पन्न होते हैं । ये एक-दूसरे से काफी मिलते-जुलते होते हैं । भ्रूणों का लिंग समान होता है और बच्चे एक-दूसरे के प्रतिबिंब लगते हैं । इन्हें आइडेंटिकल ट्विन भी कहा जाता है । सामान्यतः माँ का एक अंडाणु पिता के एक शुक्राणु से निषेचित होने के बाद भ्रूण बनाने की प्रक्रिया शुरू करता है । इस प्रक्रिया में निषेचित अंडाणु लगातार विभाजित होता जाता है, पहले दो कोशिका, फिर क्रमश: चार, आठ, सोलह, फिर मोरूला और फिर भ्रूण के विकास की शुरुआत । कभी-कभी विभाजन की इस प्रक्रिया में यह दो, तीन या उससे भी अधिक भागों में बँटकर एक-दूसरे से बिलकुल अलग होकर अलग-अलग भ्रूण की संरचना करने लगता है । कभी-कभी कोई दो भाग पूरी तरह अलग नहीं हो पाता, जिसके कारण सटे हुए जुड़वाँ होते हैं ।

डाइजाइगोटिक:

इन शिशुओं में उतनी ही समानता होती है, जितनी दो भाइयों, दो बहनों या दो भाई-बहनों में होती है । माँ के दो अलग-अलग अंडाणु पिता के दो अलग-अलग शुक्राणुओं द्वारा निषेचित होते हैं और दो अलग-अलग भ्रूण बनते हैं । इस बहुल गर्भ अधिकांश जुड़वाँ या अधिक बच्चे इसी कारण होते हैं । प्राप्त आँकड़ों के अनुसार, प्रत्येक 80 में एक जुड़वाँ, प्रति 800 में एक तीन भ्रूण (triplet) वाले और प्रति 8,000 में एक चार भ्रूण (Quadruplet) वाले गर्भ होते हैं । इसी क्रम से यह संख्या बढ़ती जाती है । गर्भ के प्रथम तीन महीनों में एकाधिक भ्रूणवाले गर्भ की संख्या काफी अधिक होती है । प्रत्येक आठ गर्भ में एक । पर जैसे-जैसे गर्भ आगे बढ़ता है, यह संख्या घटती जाती है; क्योंकि या तो स्वतः गर्भपात हो जाता है या एक भ्रूण की मृत्यु हो जाती है, जो धीरे-धीरे गलकर खत्म हो जाता है । बंध्यापन के इलाज के लिए जो दवाएँ दी जाती हैं, उनसे जुड़वाँ या उससे अधिक भ्रूण बनने की संभावना काफी बढ़ जाती है ।

बहुल गर्भ के कुछ अतिरिक्त कारण:

निम्नलिखित परिस्थितियों में बहुल गर्भ की संभावना अधिक होती है |

  • अफ्रीकन-अमेरिकन महिलाओं में बहुल गर्भ की अधिक संभावना रहती है ।
  • माँ की बढ़ती उम्र ।
  • पिता की बढ़ती उम्र ।
  • पूर्व में बच्चों की संख्या-अगर पाँच या पाँच से अधिक बच्चे हो चुके हों तो बहुल गर्भ की संभावना 20 गुना बढ़ जाती है ।
  • परिवार में जुड़वाँ बच्चे ।
  • वैभवशाली परिवार और अच्छा स्वास्थ्यवर्धक खान-पान ।
  • गोनाडोट्रोफिन (Gonadotrophins) नामक हॉर्मोन की अधिकता ।
  • परिवार नियोजन की गोलियों को बंद करने के पश्चात् पहले महीने में पिट्यूटरी ग्रंथि से काफी गोनाडोट्रोफिन निकलता है, जिसके कारण जुड़वाँ की संभावना उस महीने अधिक होती है ।
  • बंध्यापन की चिकित्सा भी बहुल गर्भ का एक कारण हो सकती है ।

मोनोकोरियोनिक की पहचान :

मोनोकोरियोनिक जुड़वाँ में डाइकोरियोनिक की अपेक्षा अधिक जटिलताओं की संभावना रहती है, अतः बहुल गर्भ की स्थिति होने पर इसकी पहचान शुरू में ही हो जाए तो अच्छा है । गर्भ के प्रथम तीन महीनों में अल्ट्रासाउंड द्वारा इसका पता लग सकता है । Dizygotic में दोनों भ्रूण के बीच एक पतली झिल्ली मिलती है, जिसकी मोटाई 2 मि.मी. से अधिक होनी चाहिए । प्लासेंटा (पुरैन) को ध्यान से देखने पर भी इसका अंदाजा मिलता है । दुविधा होने पर बच्चों के सेक्स, ब्लड ग्रुप से कुछ अंदाज एवं डी.एन.ए. की जाँच द्वारा सही पहचान हो सकती है ।

बहुल गर्भ की पहचान :

जुड़वाँ या एक से अधिक भ्रूण के गर्भ में होने पर माँ को शुरू में उल्टियाँ अधिक होती हैं । बाद में पेट का आकार जरूरत से ज्यादा बड़ा लगता है । माँ को चित सोने में परेशानी, पाँव में सूजन, कमजोरी इत्यादि हो सकती है । जाँच करने पर उसमें रक्त की कमी होती है, गर्भाशय का आकार समय से बड़ा होता है और पेट में बच्चे के अंग बहुतायत में महसूस होते हैं । अल्ट्रासाउंड से अधिकतर स्पष्ट हो जाता है कि गर्भाशय में एक भ्रूण है या उससे अधिक । यदा-कदा सही पहचान के लिए एक्स-रे या एम.आर.आई. की जरूरत पड़ सकती है । रक्त की जाँच से जुड़वाँ बच्चे नहीं पहचाने जा सकते हैं ।

बहुल गर्भ की जटिलताएँ :

गर्भ में एक से अधिक भ्रूण के रहने पर निम्नलिखित जटिलताओं की संभावना बढ़ जाती है

  • बहुल गर्भ में स्वतः गर्भपात की जटिलता हो सकती है ।
  • भ्रूण में शारीरिक विकृतियाँ ।
  • भ्रूण के विकास में कमी और कमजोर नवजात ।
  • उच्च रक्तचाप और प्री-इक्लैंपसिया ।
  • समय पूर्व प्रसव ।
  • भ्रूण के मानसिक विकास में कमी ।
  • सेरीब्रल पाल्सी ।

मोनोएम्नियोटिक बहुल गर्भ की विशेष जटिलताएँ:

  • भ्रूण की मृत्यु
  • नाभिनालों (Umbilical cord) का आपस में उलझ जाना ।
  • शारीरिक विकृतियाँ ।
  • समय पूर्व प्रसव ।
  • भ्रूणों की रक्त वाहिनियों का आपस में मिल जाना ।
  • प्रसव के समय एक भ्रूण का दूसरे में फँस जाना (Locked twins) ।
  • संयुक्त यानी एक-दूसरे से सटे हुए भ्रूण (Conjoint twins) ।

मोनोएम्निओटिक जुड़वाँ या बहुल गर्भ के लिए गर्भ के चौंतीसवें सप्ताह पूरा होने पर सिजेरियन कर देना चाहिए ।

संयुक्त जुड़वाँ (Conjoint twins):

इस बहुल गर्भ की बात करें तो प्रारंभिक विकास के समय यदि भ्रूण पूरा-पूरा अलग न हो पाए और कहीं-न-कहीं एक-दूसरे से दोनों भ्रूण सटे रहें । तो इसे संयुक्त या कनजॉइंट ट्विन कहते हैं । कभी-कभी तो एक ही हृदय या लीवर होता है और ऐसे में दोनों बच्चों को ऑपरेशन द्वारा अलग कर पाना मुश्किल होता है । अगर दोनों के आवश्यक अंग अलग-अलग विकसित हुए हों तो उन्हें ऑपरेशन द्वारा अलग किया जा सकता है । बच्चों का कौन सा भाग आपस में जुड़ा है, उसके अनुसार संयुक्त जुड़वाँ का अलग-अलग नाम दिया गया है । आँकड़े के अनुसार प्रति 60,000 प्रसव पर एक कनजॉइंट जुड़वाँ होता है ।

परजीवी जुड़वाँ (Parasitic twin) :

कभी-कभी संयुक्त जुड़वाँ में से एक अविकसित रह जाता है । उसके आकार-प्रकार का पता भी ठीक से नहीं चल पाता । उसे परजीवी जुड़वाँ कहते हैं । ऐसा यदा-कदा ही होता है । कभी-कभी संयुक्त जुड़वाँ में से एक भ्रूण दूसरे के अंदर विकसित होता है । ऐसा 4 प्रतिशत संयुक्त जुड़वाँ में होता है । इसे एक भ्रूण के अंदर दूसरा भ्रूण (Fetus in Fetus) कहते हैं । इसमें प्रारंभिक विकास के समय ही एक भ्रूण दूसरे भ्रूण को अपने आगोश में ले लेता है । भीतर घुसे हुए भ्रूण का विकास कुछ दिनों के बाद रुक जाता है ।

बहुल गर्भ के साथ माँ की देखभाल:

बहुल गर्भ वाली गर्भिणी को विशेष देखभाल की जरूरत होती है और निम्नलिखित बिंदुओं पर विशेष ध्यान देना पड़ता है |

  • माँ को रक्त की कमी न हो, इसके लिए उसके खान-पान और आराम पर विशेष ध्यान देना जरूरी है । आयरन की गोलियाँ नित्य लेनी चाहिए । यदि उसे पचाने में दिक्कत हो तो आयरन की सूई (IV Iron) पूर्ण देखरेख में दी जा सकती है ।
  • सुपाइन हाइपोटेंसिव सिंड्रोम से बचाव के लिए इन्हें चित्त नहीं, करवट सोना चाहिए, खासकर बाईं करवट ।
  • समय पूर्व प्रसव से बचाव के लिए कई उपाय काम में लाए जाते हैं, पर उनमें से कोई भी पूर्णत: सफल नहीं है । ये उपाय हैं जैसे : पूर्ण आराम, दवाएँ, जो गर्भाशय के संकुचन को कम करें । कभी-कभी ये दवाएँ लाभ पहुँचाने के बदले हानि पहुँचा सकती हैं । प्रोजेस्टेरॉन की सुई सप्ताह में एक बार, प्रोजेस्टेरॉन की गोली 200 मिलीग्राम हर रोज योनि में, गर्भाशय ग्रीवा को टाँके लगाकर बंद कर देना, पेसरी ।
  • ग्लूकोकॉर्टिक्वायड की सुई समय पूर्व प्रसव को रोक तो नहीं पाता, पर समय पूर्व नवजात के फेफड़ों को मजबूत करने में सहायक होता है । इसके लिए 12 बीटामिथासोन (Betamethasone) की सुइयाँ दो दिनों तक लगातार दी जाती हैं ।

बहुल गर्भ में प्रसव संबंधी जटिलताएँ:

  • समय पूर्व प्रसव-पीड़ा ।
  • समय पूर्व प्रसव ।
  • गर्भाशय की संकुचन क्रिया में गड़बड़ी ।
  • भ्रूण का आड़ा, तिरछा या उलटा रहना ।
  • पानी की थैली फटने के बाद नाभि का बाहर आ जाना ।
  • प्लासेंटा का गर्भाशय के निचले भाग में होना (Placenta previa)।
  • प्लासेंटा का गर्भाशय की दीवार से अलग हो जाना (Abruptio placentae)।
  • एक बच्चे के सिर का दूसरे बच्चे की जाँघों के बीच अटकना ।
  • दोनों सिरों का आपस में टकराना ।
  • दोनों की नाभि नालों का एक-दूसरे में उलझना ।
  • पहले बच्चे के जन्म के बाद दूसरे बच्चे का जन्म नहीं हो पाना ।
  • आकस्मिक ऑपरेशन की आवश्यकता ।
  • प्रसव पश्चात् अधिक रक्तस्राव ।

उपर्युक्त कारणों से बहुल गर्भ धारण की हुई गर्भवती का प्रसव किसी ऐसे अस्पताल में ही होना चाहिए, जहाँ अच्छे, प्रशिक्षित, प्रसव-कला में निपुण चिकित्सक उपलब्ध हों; जरूरत पड़ने पर तुरंत रक्त उपलब्ध हो सके और अल्ट्रासाउंड, ऑपरेशन, बेहोशी एवं नवजात शिशु विशेषज्ञ की सुविधा उपलब्ध हो । यदि पहला बच्चा सीधा है, संयुक्त या नाभि के आपस में उलझे होने की संभावना नहीं है और ऑपरेशन के लिए कोई अन्य कारण नहीं है तो सामान्य प्रसव कराया जा सकता है । पहले भ्रूण के सीधा नहीं रहने पर, यानी सिर नीचे नहीं रहने पर इसके सिर को दूसरे भ्रूण के सिर या जाँघ में अँटकने (locked twin) का डर रहता है, जिससे प्रसव के दौरान भ्रूण की मृत्यु भी हो सकती है । अत: बहुल गर्भ में पहले बच्चे के सीधा नहीं रहने पर ऑपरेशन करना ही उचित है । संयुक्त जुड़वाँ को भी ऑपरेशन से ही निकालना अधिकांशतः जरूरी होता है ।

गर्भ में तीन या उससे अधिक भ्रूण :

बहुल गर्भ अर्थात गर्भ में भ्रूण की संख्या जितनी अधिक होती है, जटिलताओं की संभावना भी उतनी ही अधिक होती है । इनका जन्म अधिकांश डॉक्टर ऑपरेशन द्वारा कराना उचित समझते हैं, क्योंकि प्रसव के समय एक-दूसरे में उलझने की अधिक संभावना होती है । प्रसव कलाओं द्वारा उन्हें जीवित निकाल पाना हमेशा संभव नहीं हो पाता । सामान्य प्रसव तभी कराया जाता है, जब बच्चे इतने कमजोर, समय पूर्व या विकृत हों कि उनके बचने की कोई उम्मीद न हो या माँ का स्वास्थ्य ऑपरेशन की अनुमति नहीं दे ।

भ्रूण की संख्या कम करने की प्रक्रिया (Selective reduction):

बहुल गर्भ की इस स्थिति अर्थात दो अधिक भ्रूण के गर्भ में रहने पर अत्यधिक जटिलताओं की संभावना के कारण भ्रूण की संख्या कम की जा सकती है । बहुल गर्भ की स्थिति में यदि दो ही भ्रूण हों तो खतरे काफी कम आ जाते हैं । इसके लिए गर्भ के 10 से 13 सप्ताह के बीच अल्ट्रासाउंड से देखते-सबसे कमजोर भ्रूण के हृदय में पोटैशियम क्लोराइड की सूई दी जाती है । दो सबसे स्वस्थ भ्रूणों को छोड़ दिया जाता है । पर इस प्रक्रिया के साथ निम्नलिखित  जटिलताएँ हो सकती हैं |

  • गर्भपात
  • अस्वस्थ भ्रूण ।
  • स्वस्थ भ्रूण का नष्ट हो जाना ।
  • सुई लगने के बाद भी भ्रूण का जीवित रह जाना ।
  • समय पूर्व प्रसव ।
  • माँ में संक्रमण, रक्तपात एवं डी.आई.सी. की संभावना ।

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