बोलने की कला – दूसरों से बात करने के तरीके.

बोलने की कला भीव्यक्तित्व में गहरा प्रभाव छोड़ती है, किसी से बातें करते समय कुछ बातों को ध्यानमें रखना बहुत आवश्यक है। बातचीत ही किसी से मित्रता करने या करीब जाने का सशक्तमाध्यम है। आप कितना बोलते हैं, इससे कहीं ज्यादामहत्वपूर्ण है-आप कैसा बोलते हैं। दूसरों से बात करने का तरीका भी आपके व्यक्तित्वको सकारात्मक बनाता है। आपके सौंदर्य में बढ़ोतरी करता है। अत: बोलने की कला केप्रति विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए ।

बोलने की कला

किसी की बार बार निंदा करना ठीक नहीं

  • सहज वार्तालाप करें । दूसरे की निंदा करना ठीक नहीं है । यदि आप किसी के सामने किसी की निंदा करती हैं तो सुनने वाला भी आपकी हां में हां मिलाता है। लेकिन इससे आपके बारे में सामने वाले की राय अच्छी नहीं बनती है ।
  • दूसरों की निंदा करने पर यदि कभी आप किसी की सही बुराई भी करें तो सब यही सोचेंगे कि इसकी बातों का क्या भरोसा? इसकी तो आदत ही है, दूसरों की बुराई करना।
  • बोलने की कला में यह भी शामिल है की यदि आपकी किसी सहेली अथवा पड़ोसिन ने आपको कोई बात बताकर उसे स्वयं तक सीमित रखने की बात कही हो तो उस बात को गुप्त ही रखें।
  • ध्यान रहे अगर कोई आप पर भरोसा करके आपको अपनी गुप्त बातें बताता है तो उस भेद को स्वयं तक सीमित रखने में ही आपका बड़प्पन है।

याद रखें, आप बातों को उगलकर नहीं, वरन् पचाकर ही दूसरों की विश्वासपात्री बन सकती हैं।

स्वयं की तारीफ न करें

  • किसी से बातें करते वक्त इस बात का ध्यान रखें कि स्वयं अपनी तारीफ करना ठीक नहीं है। यदि आप ऐसा करती हैं तो सुनने वाला बोर हो जाएगा तथा आपकी बातों को अतिशयोक्ति मानेगा।
  • यदि आपकी तारीफ कोई दूसरा करे तो अलग बात है। वस्तुतः अच्छे गुण अपना बखान स्वयं ही कर देते हैं।

परिस्थिति के हिसाब से बोलने की कला का ध्यान रखें

बोलने की कला की बात करें तो मजाक बोलने का अहम् एवं सुखद एहसास है। मजाक करना कोई बुरी बात नहीं है। आपस में हास-परिहास तो चलता ही रहता है। लेकिन मजाक करते वक्त कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।

  • ऐसा न हो कि मजाक की बात किसी को बुरी लग जाए और आपसी सम्बंध बिगड़ जाएं।
  • अपने मायके वालों के सामने कभी भी पति का मजाक न उड़ाएं। आपके पति कितने ही खुशमिजाज क्यों न हों, ससुराल वालों के सामने आपका मजाक उड़ाना पसन्द नहीं करेंगे।
  • पति ही नहीं, अन्य लोगों के साथ भी सोच-समझकर मजाक करें।

दूसरों को भी बोलने का मौका दें

  • जिस प्रकार हर चीज की अधिकता बुरी होती है, उसी प्रकार अधिक बोलना भी ठीक नहीं है।
  • जब भी किसी से बातें करें तो उसे भी बोलने का मौका दें। साथ ही ध्यान से शांतिपूर्वक उसकी भी सुनें। बहुत से लोगों में यह आदत होती है कि एक बार बोलना शुरू कर दें तो बोलते ही चले जाएंगे। दूसरों की नहीं सुनेंगे। ध्यान रहे यह बोलने की कला या आदत ठीक नहीं है।

बच्चों के साथ बोलने की कला:

  • छोटे बच्चों के साथ सदैव प्यार से बातचीत करना चाहिए।
  • आप अपने बच्चों को कोई अच्छी बात सिखाना चाहती हैं। आप चाहती हैं कि वे हर काम कायदे से करें तो उन्हें प्यार से समझाएं।
  • बच्चों को हर बात प्यार से समझाएं अक्सर माता-पिता अपने बच्चों के सामने उनके साथियों या भाई-बहन का उदाहरण रखते हैं। भाई, मित्र या बहन की तारीफ सुनकर बच्चे को ईष्र्या होती  है तथा वह मन ही मन विद्रोह की भावना से भर उठता है।
  • इसलिए बच्चों को अच्छे काम के लिए अवश्य सीख दें, लेकिन किसी के साथ उनकी तुलना न करें। साथ ही कभी भी बच्चों का उपहास न उड़ाएं।
  • आपके मुंह से बच्चे के लिए उपहास के रूप में निकले शब्द उसके विकास में बाधक हो सकते हैं।

बातचीत कैसे शुरू करें

  जीवन के हर क्षेत्र में प्रगति के लिए बोलने की कला में पारंगत होना आवश्यक है। यदि किसी पार्टी या भोज में आप चुपचाप बैठी रहें तो अच्छा नहीं लगता। यदि सामने वाले से कुछ न कुछ बातचीत चलती रहे तो समय आसानी से कट जाता है। कभी-कभी बातचीत के लिए विषय तलाशना नहीं पड़ता। एक बात से दूसरी बात निकलती चली जाती है और बातचीत का न रुकने वाला सिलसिला शुरू हो जाता है। लेकिन कभी-कभी यह हालत होती है कि 10-15 मिनट के अंतराल में ही दस बार हालचाल पूछा जाता है। अब वे करें भी तो क्या? जब बातचीत का सिलसिला ही न जुड़ पा रहा हो? ऐसे में समय नहीं बीतता और वहां बैठे लोग बोर होने लगते हैं। इसके लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान दें।

  • मेजबान द्वारा आतिथ्य में कोई कमी न रहे, इसके लिए बातचीत का सिलसिला जारी रखना चाहिए।
  • केवल खाने-पीने के उद्देश्य से ही लोग इकट्टे नहीं होते, उन्हें बातचीत का अवसर भी मिलना चाहिए। इससे वातावरण बोझिल नहीं होता और उपस्थित मेहमान ऊबने नहीं पाते।
  • बातचीत करने के लिए ऐसे विषय चुनें जो सामने वाले के लिए रुचिकर हों। ऐसे विषय उठाएं, जो केवल हां या न में उत्तर देने से ही समाप्त न हो जाएं।
  • प्रश्नों को इस तरह प्रस्तुत करें जिससे अगला व्यक्ति उसका कुछ न कुछ उत्तर अवश्य दे। साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि यदि आपको इस प्रश्न का उत्तर देना पड़े तो क्या आप दे पाएंगी? ।
  • बोलने की कला का सरल तरीका यह है कि ऐसे विषय चुनें जो अधिकतर लोगों से सम्बंधित हों। अधिक से अधिक व्यक्ति उनमें रुचि रखते हों । राजनीति पर चर्चा करने की देर है, फिर उसे समाप्त करना आसान नहीं होगा। जिन महिलाओं की राजनीति में रुचि न हो, उनके लिए स्वर्ण का मूल्य चर्चा का विषय हो सकते हैं।
  • यदि मेजबान कल्पनाशील हो तो उसके लिए रोचक और अनूठे विषयों की कमी नहीं होगी। इसके लिए इस बात का ध्यान रखें कि आप किस आयु वर्ग के लोगों के बीच बैठी हैं। बातचीत का विषय क्या चल रहा है और सामने बैठे व्यक्ति से आपका क्या सम्बन्ध है।

उपरोक्त बोलने की कला से कोई भी महिला अपने व्यक्तित्व का प्रभाव दूसरों पर भी डाल सकती है और अपने जानने वालों के बीच एवं सम्पर्क करने वाले लोगों के बीच अपना अच्छा व्यक्तित्व स्थापित कर सकती है।

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