मूत्र में शुगर की जांच की महत्वपूर्ण जानकारी

कुछ वर्ष पहले तक लोग मूत्र में शुगर की मात्रा को नापकर ही अपनी डायबिटीज की बीमारी पर नज़र रखा करते थे | लेकिन यह जांच ब्लड शुगर का एक मोटा मोटा अंदाज़ा दे पाने में ही समर्थ थी | इसके अलावा मूत्र में शुगर नामक यह जांच तभी तक उपयोगी होती है जब तक व्यक्ति के गुर्दे स्वस्थ रहते हैं | मूत्र में शुगर की जांच के यदि फायदे की बात करें तो इसका सबसे बड़ा फायदा यही है की यह बहुत आसानी से की जा सकती है इसके अलावा इस पर खर्च भी बहुत कम आता है यही कारण है की हमारे देश में यह जांच अभी भी सार्थक सिद्ध होती है |

मूत्र में शुगर की मात्रा

मूत्र में शुगर की जांच करने की विधियाँ:

मूत्र में शुगर की जांच करने के दो तरीके होते हैं और दोनों ही बहुत आसान होते हैं | तो आइये जानते हैं उन दो विधियों के बारे में |

  1. बैनेडिक्ट विधि:

इस विधि द्वारा मूत्र में शुगर की जांच करने के लिए बैनेडिक्ट सोल्यूशन की आवश्यकता होती है, यह नीले रंग का होता है | इस विधि द्वारा जांच करने के लिए किसी टेस्ट tube में पांच मिलीलीटर यानिकी एक बड़ा चम्मच बैनेडिक्ट सोल्यूशन ले लिया जाता है और इसे स्प्रिटलैंप या गैस की लौ पर उबलने तक गरम कर लिया जाता है | उबलने के बाद भी उस सोल्यूशन का रंग नीला अर्थात ज्यों का त्यों बना रहता है लेकिन यदि इसका रंग बदल जाय तो समझ लेना चाहिए की यह सोल्यूशन ठीक नहीं है इसलिए इसे इस्तेमाल में नहीं लाना चाहिए | इस स्थिति में नए सोल्यूशन को दुबारा उबाल लेना चाहिए | खौलते हुए बेनेडिक्ट सोल्यूशन में मूत्र की लगभग आठ बूंदे मिला लेनी चाहिए, उसे फिर दो मिनट के लिए उबालना चाहिए | यदि मूत्र में शुगर नहीं होगी तो सोल्यूशन का रंग ज्यों का त्यों अर्थात नीला ही रहेगा | इसके अलावा मूत्र में शुगर होने पर उसका रंग. शुगर की प्रतिशत मात्रा के अनुरूप हरा, पीला, नारंगी या लाल हो जायेगा |

  1. डाईस्टिक्स विधि:

मूत्र में शुगर की जांच का दूसरा तरीका डाईस्टिक्स है | मूत्र में शुगर जांचने की यह विधि पहले विधि से भी बेहद आसान है | डाईस्टिक्स प्लास्टिक की पतली पत्तियां होती हैं, जिन पर पहले से रासायनिक घोल लगा हुआ होता है | ये डिब्बियों में आती हैं इस विधि से मूत्र में शुगर की जांच करने के लिए डिब्बी में से डाईस्टिक्स की एक स्टिक निकालें | उस स्टिक को ठीक तीस सेकंड के लिए मूत्र के नमूने में डुबोया जाता है | उसके बाद उस स्टिक को बाहर निकाल लिया जाता है और डिब्बी पर बने रंगों के चार्ट से मिलाया जाता है | यदि उसका रंग नीला ही बना रहता है, तो इसका अभिप्राय यह है की मूत्र में शुगर नहीं है यदि रंग बदले तो बोतल पर बने रंगों से रंग मिलाकर ब्लड शुगर की मात्रा को जाना जा सकता है | डाईस्टिक्स के साथ एक सावधानी हमेशा बरतनी चाहिये की स्टिक निकालने के बाद तुरंत डिब्बी का ढक्कन मजबूती से बंद कर देना चाहिए क्योंकि डिब्बी के नादर नमी जाने से डाईस्टिक ठीक परिणाम नहीं दे पाती है |

मूत्र में शुगर की जांच के दौरान सावधानियाँ:

मूत्र में शुगर की जांच करते समय निम्नांकित बातों का हमेशा ध्यान रखना जरुरी होता है |

  • जांच के लिए हमेशा ताजा नमूना ही लेना उचित रहता है | रखे हुए नमूने की जांच करने से शुगर की सही मात्रा का पता नहीं चल पाती है |
  • सुबह का समय नमूना लेने से एक दो घंटे पहले पेशाब के लिए जाकर मूत्राशय खाली कर दें | उसके बाद अर्थात एक दो घंटे बाद ही मूत्र में शुगर की जांच करने के लिए मूत्र का नमूना किसी साफ़ बोतल में लें |
  • यदि कोई रोगी एस्प्रिन या विटामिन सी ले रहा हो तो उसे मूत्र जांच नहीं करानी चाहिए क्योंकि ऐसे में मूत्र में शुगर न होने पर भी टेस्ट पॉजिटिव आ सकता है |
  • गर्भावस्था में भी मूत्र जांच पर भरोसा नहीं किया जा सकता है क्योंकि इस स्थिति में भी ब्लड शुगर सामान्य होने पर भी टेस्ट में शुगर आ सकती है |
  • मूत्र में शुगर की जांच का नतीजा, तारीख एवं समय डायरी में नोट कर लेनी चाहिए क्योंकि इन नतीजों को देखकर चिकित्सक बीमारी के पैटर्न के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी हासिल कर सकता है |

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