यौन रोग की जानकारी Sexually transmitted diseases

यौन रोग अर्थात Sexually transmitted diseases की बात करें तो स्त्री-पुरुष के सहवास के कारण एक से दूसरे को लगने वाले रोगों को यौन रोग कहा जाता है । आज हम हमारे इस लेख के माध्यम से ऐसे ही कुछ यौन रोग के बारे में जानने की कोशिश करेंगे जो स्त्री पुरुष के सहवास के कारण उत्पन्न होते हैं |

यौन रोग sexually-transmitted-disease

  1. सिफलिस (Syphilis) :

यौन रोग में यह रोग ट्रिपोनिमा पैलिडम नामक कीटाणु के संक्रमण से होता है, जो खरोंच या किसी अन्य खुली हुई रक्त वाहिनियों द्वारा शरीर में प्रवेश पाते हैं । प्रवेश के बाद लगभग तीन सप्ताह (3 से 90 दिन) के बाद प्रवेश के स्थान पर जख्म हो जाता है। इसे ‘प्राइमरी सिफलिस’ कहते हैं । इस जख्म में साधारणतया दर्द नहीं होता और उपचार नहीं करने पर भी यह स्वतः दो से आठ सप्ताह में ठीक हो जाता है । कभी-कभी एक से अधिक जख्म भी हो सकते हैं । उपचार नहीं करने पर कुछ दिनों के बाद साधारणतया ये कीटाणु धीरे-धीरे फैलकर शरीर के अन्य अंगों या अवयवों को कुप्रभावित करते हैं । इसमें लिवर, किडनी, आँखें एवं हड्डियाँ प्रभावित हो सकती हैं । यदि अभी भी इस यौन रोग की चिकित्सा नहीं की गई, तब भी सेकेंडरी सिफलिस के ये जख्म खत्म हो जाते हैं और उसके कुछ दिनों बाद रक्त की जाँच में सिफलिस का पता चलता है । सेकेंडरी सिफलिस के बाद टर्सियरी सिफलिस होता है, जिसके दो स्टेज हैं-अर्ली और लेट । टर्सियरी सिफलिस में केवल रक्त की जाँच से बीमारी का पता चलता है । शारीरिक जाँच में देखने पर कोई जख्म नहीं मिलता ।’ अर्ली टर्सियरी’ उस सिफलिस को कहते हैं, जिसका संक्रमण गत एक वर्ष के भीतर हुआ हो । उसके पहले के संक्रमण को ‘लेट टर्सियरी’ कहते हैं । लेट सिफलिस से प्रभावित अवयव धीरे-धीरे खराब होने लगते हैं । प्राइमरी, सेकेंडरी और अर्ली टर्सियरी सिफलिस में पीड़ित व्यक्ति अन्य व्यक्तियों को संक्रमित कर सकता है । इनके जख्मों में सिफलिस के कीटाणु काफी मात्रा में रहते हैं, जो उसके संपर्क में आनेवाले व्यक्ति को आसानी से संक्रमित कर देते हैं । इस यौन रोग अर्थात सिफलिस के कीटाणु आसानी से बच्चे को संक्रमित करते हैं । यह संक्रमण साधारणतया गर्भ के अठारहवें सप्ताह के बाद होता है । भ्रूण का लिवर बढ़ जाता है रक्त की कमी हो जाती है, पेट में तथा पूरे शरीर में पानी जमा होने लगता है । भ्रूण की मृत्यु होने की भी आशंका रहती है । नवजात को पीलिया, शरीर पर लाल जख्म, बढ़े हुए लिम्फनोड, न्यूमोनिया, हृदय में सूजन, किडनी में गड़बड़ी एवं भुजाओं की हड्डियाँ प्रभावित हो सकती हैं ।

  सिफलिस नामक यौन रोग की पहचान :

गर्भाधान के बाद प्रथम चिकित्सीय जाँच के समय ही सिफलिस के लिए रक्त की जाँच की जानी चाहिए और पहचान हो जाने के बाद उसका सही उपचार करना चाहिए । उपचार जितनी जल्दी होता है, भ्रूण में संक्रमण एवं विरूपता की संभावना उतनी ही कम होती है । सिफलिस का उपचार पेनिसिलिन की सुई द्वारा किया जाता है । किसी-किसी व्यक्ति को पेनिसिलिन से एलर्जी होती है । ऐसे लोगों को एरिथ्रोमाइसिन या एजिथ्रोमाइसिन दिया जाता है । सिफलिस वाली सभी गर्भवतियों की जाँच एच.आई.वी. के लिए भी की जानी चाहिए ।

  1. गोनोरिया (Gonorrhea)यौन रोग :

गोनोरिया नामक यह यौन रोग प्रमुख यौन रोगों में से एक है । गरीबी, मादक दवाओं का सेवन, अकेलापन, कच्ची उम्र, वेश्यावृत्ति एवं अन्य यौन रोगों से पीड़ित माताओं में इसके होने का अधिक डर रहता है । अधिकांशतः यह संक्रमण मूत्र मार्ग, उसके इर्द-गिर्द की ग्रंथियों, योनि और गर्भाशय ग्रीवा को प्रभावित करता है, पर कभी-कभी ऊपर फैलकर फैलोपियन ट्यूब में भी पहुँच सकता है । इस यौन रोग का तीव्र संक्रमण गर्भावस्था में यदा-कदा ही होता है । मवाद के जैसा अधिक स्राव इसका लक्षण है और कल्चर जाँच से इसकी पहचान होती है । गर्भवती में गोनोरिया के संक्रमण के कारण सेप्टिक एबॉरसन, समय पूर्व प्रसव, समय पूर्व प्रसव पूर्व झिल्ली का फटना, गर्भावस्था की झिल्लियों में संक्रमण एवं प्रसव के पश्चात् संक्रमण होने की आशंका काफी बढ़ जाती है । इसका उपचार सेफट्रैक्शन (Ceftriaxone) 250 मि.ग्रा. IM की सुई से या एजिथ्रोमाइसिन की एक ग्राम की गोली से किया जाता है । पति या लैंगिक साथी का भी उपचार होना आवश्यक है । कभी-कभी इस यौन रोग अर्थात गोनोरिया का संक्रमण शरीर में जगह-जगह फैल जाता है और तीव्र रूप धारण कर लेता है । ऐसे लोगों को लंबे समय तक सुई देनी पड़ती है ।

  1. क्लेमाइडिया का संक्रमण :

यह भी एक यौन रोग है जिसका संक्रमण गर्भवती में हो सकता है कि इसके संक्रमण का कोई लक्षण न मिले, पर कुछ लोगों को मूत्र-विसर्जन में पीड़ा, मूत्र मार्ग एवं बार्थोलिन ग्रंथि में सूजन और गर्भाशय ग्रीवा से मवाद जैसा स्राव भी हो सकता है । प्रसव के दो-तीन सप्ताह बाद गर्भाशय के संक्रमण का भी डर रहता है, जिसके लक्षण हैं-रक्तस्राव या हलका बुखार, पेडू में दर्द और जाँच करने पर गर्भाशय में दर्द । प्रसव के समय योनि के द्रवों के संपर्क में आने के कारण नवजात का संक्रमण हो सकता है, जिसमें न्यूमोनिया और आँखों का संक्रमण मुख्य है । इस यौन रोग की भी जाँच गर्भ के प्रथम जाँच के समय ही हो जानी चाहिए । इसका निदान कल्चर द्वारा किया जाता है और उपचार एजिथ्रोमाइसिन या एमौक्सिलिन द्वारा किया जाता है ।

  1. हरपिस सिंप्लेक्स वायरस (एच.एस.वी.):

यह यौन रोग भी मुख्य यौन रोगों में से एक है । जब इसका संक्रमण पहली बार होता है, तब यौन संपर्क के करीब एक सप्ताह बाद संपर्क की जगह पर दाने निकल आते हैं, जिसमें खुजली होती है और बाद में दर्द तथा फोड़ा । ये वायरस रक्त नलिकाओं में प्रवेश पा जाते हैं और तब इन्फ्लुएंजा के जैसा हलका बुखार तथा देह में दर्द हो सकता है । अति तीव्र संक्रमण यदा-कदा ही होता है, जब लिवर, मस्तिष्क और फेफड़े हरपिस से संक्रमित हो जाते हैं । पहली बार दानों की संख्या अधिक होती है, पर उसके बादवाले संक्रमण में इनकी संख्या कम होती है । संक्रमण के स्थान पर ये वायरस कुछ दिनों के बाद शांत होकर पड़े रहते हैं, जहाँ से कभी-कभी ये काफी संख्या में बाहर निकलते हैं, जिसे शेडिंग (shedding) कहते हैं और दुबारातिबारा भी दो से पाँच दिनों के लिए उसी स्थान पर जख्म होते रहते हैं। हरपिस (HSV) की पहचान कल्चर या पी.सी.आर. (PCR) से होती है । गर्भ के प्राथमिक अवस्था में हरपिस का कोई बुरा प्रभाव नहीं देखा गया है । हरपिस का उपचार एंटीवायरस दवाओं से किया जाता है; जैसे-एसाइक्लोविर, फैमसाइक्लोविर इत्यादि । इस यौन रोग के ईलाज के लिए गोलियाँ एवं मलहम उपलब्ध हैं । अत्यधिक दर्द या तकलीफ होने पर दर्द की गोलियों का उपयोग किया जाता है । यदि एच.एस.वी. का संक्रमण पूरे शरीर में फैल चुका हो तो गर्भवती को अस्पताल में भरती कर एक सप्ताह से दस दिनों तक एक्साइक्लाविर की सुई नस में दी जाती है और उसके बाद इसकी गोलियाँ एक सप्ताह तक । गर्भ के अंतिम महीने में हरपिस होने पर समय पूर्व प्रसव एवं उल्व द्रव की झिल्ली के फटने का डर रहता है और संक्रमण भी फैल सकता है । इन जटिलताओं को रोकने के लिए अंतिम महीने में हरपिस पाए जाने पर एक महीने तक दवा दी जा सकती है ।

  1. एच.पी.वी यौन रोग :

यह यौन रोग यौन रोगों में एक आम रोग है, जो एच.पी.वी. वायरस के द्वारा होता है । अधिकांश संक्रमण कोई लक्षण उत्पन्न नहीं करते और कुछ ही दिनों में ठीक भी हो जाते हैं; पर कुछ संक्रमण के स्थान पर वार्ट (Warts) बना सकते हैं । गर्भावस्था में ये वार्ट कभी-कभी बहुत बढ़ जाते हैं और वल्वा, योनि तथा गर्भग्रीवा तक फैल जाते हैं । इसकी चिकित्सा 90 प्रतिशत ट्राइक्लोरएसिटिक एसिड को एक-एक सप्ताह के अंतराल पर जख्म पर लगाकर की जाती है । दवा से ठीक नहीं होने पर इनका उपचार क्रायोथैरेपी (Cryotherapy) या लेजर से किया जाता है । कभी-कभी जख्म को काटकर हटाना भी पड़ता है, पर गर्भावस्था में ऑपरेशन नहीं किया जाता है । माँ से बच्चे में यह संक्रमण यदा-कदा फैल सकता है । और बच्चे के गले में यह बीमारी (Laryngeal papillomatosis) हो सकती है । इस यौन रोग अर्थात एच.पी.वी. का टीका उपलब्ध है, पर ये टीके गर्भावस्था में नहीं लगाए जाते हैं । यह टीका तीन डोज में लगता है । पहले टीके के दो महीने के बाद दूसरा और छह महीने के बाद तीसरा । यदि टीका लगने के दौरान गर्भ का पता चले तो बाकी के टीके प्रसव के बाद दिए जाते हैं । स्तनपान के समय भी टीके लग सकते हैं । एच.पी.वी. का संबंध गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर से भी है और इसके बचाव के लिए ये टीके किसी भी यौन संपर्क से पहले लग जाएँ तो बहुत फायदा होता है ।

  1. योनिशोथ (Vaginitis):

योनिशोथ नामक इस यौन रोग को निम्न तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है |

  • बैक्टीरियल वैजिनोसिस (Bacterial Vaginosis):

इस यौन रोग में योनि में सामान्यत: कुछ कीटाणु मौजूद होते हैं, जो वहाँ के वातावरण को सही रखते हैं एवं संक्रमण को रोकने में सहायक होते हैं । कुछ महिलाओं में इन कीटाणुओं में हेर-फेर हो जाता है और लाभ पहुँचाने वाले कीटाणुओं की कमी हो जाती है । यह एक आम समस्या है, जो प्रजनन उम्र की लगभग 30 प्रतिशत महिलाओं को परेशान करती है । ऐसी दशा में अत्यधिक स्राव होता है और साथ में खुजली तथा मछली जैसा दुर्गंध भी हो सकता है । विटामिन डी की कमी के साथ इसका संबंध पाया गया है । इसका उपचार मेट्रोनिडाजोल या क्लींडामाइसिन की गोलियों द्वारा किया जाता है । यह बीमारी बार-बार सता सकती है । गर्भावस्था में इसके कारण समय पूर्व प्रसव एवं झिल्ली के फटने की संभावना रहती है ।

  • ट्राइकोमोनिआसिस (Trichomoniasis):

यह यौन रोग गर्भावस्था में लगभग 20 प्रतिशत माताओं में पाया जाता है । इसके लक्षण हैं क्रीम या सफेद रंग का फेनीला और अत्यधिक स्राव, जिसके साथ-साथ तीव्र खुजली होती है । यह बीमारी ट्राइकोमोनस वैजाइनलिस नामक कीटाणु से होती है, जिन्हें माइक्रोस्कोप में आसानी से पहचाना जा सकता है । इस यौन रोग का उपचार मेट्रोनिडाजोल की गोलियों द्वारा किया जाता है । जरूरी होने पर ये गोलियाँ गर्भ के किसी भी चरण में दी जा सकती हैं ।

  • कैंडिडिआसिस (Candidiasis):

यह यौन रोग एक फंगस की बीमारी है, जो कैंडिडा ऐल्बीकैंस से होती है । करीब 25 प्रतिशत गर्भवतियों में यह बीमारी पाई जाती है । यदि कोई तकलीफ न हो तो उपचार की जरूरत नहीं है; पर कभी-कभी अत्यधिक मात्रा में स्राव होता है, जिसके साथ तीव्र खुजली एवं बेचैनी तथा वल्वा में दर्द और सूजन हो सकता है । इस यौन रोग का उपचार योनि में लगाने वाली एजोल की गोलियों से किया जाता है, जो सात दिनों तक लगानी पड़ती है । खाने वाली गोलियाँ भी भ्रूण के लिए सुरक्षित पाई गई हैं और जरूरी हो तो दी जा सकती हैं । कुछ माताओं में यह संक्रमण बार-बार होता है और दवा की जरूरत बार-बार पड़ती है ।

  1. एच.आई.वी.या एड्स (Human Immunodeficiency Virus):

इस यौन रोग की बात करें तो यह वायरस से होने वाला एक संक्रमण है, जिसने विश्व भर में तहलका मचा दिया है । एच.आई.वी. के संक्रमण के बाद मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे कम होती जाती है, क्योंकि ये वायरस टी-लिंफोसाइट्स (जिनका प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने में काफी योगदान है) को धीरे धीरे बरबाद करने लगते हैं । फलतः वह व्यक्ति विभिन्न रोगों एवं संक्रमणों के लिए अति संवेदनशील हो जाता है और उसके विभिन्न तंत्र रोग-ग्रसित हो जाते हैं । रोग-ग्रसित होने के बाद इस बीमारी को एड्स कहा जाता है । उसके पहले वह केवल एच.आई.वी. पॉजिटिव होता है । एच.आई. वी. पॉजिटिव हो या एड्स से पीड़ित, दोनों ही तरह के व्यक्तियों के रक्त या उनके अन्य शारीरिक द्रवों के संपर्क में आने वाला सामान्य मनुष्य एच.आई.वी. से ग्रसित हो सकता है । एच.आई.वी. वायरस का संक्रमण मामूली खरोंच या जख्मों के माध्यम से रक्त में पहुँचने के कारण होता है । इस यौन रोग का संक्रमण मुख्यतः तीन कारणों से होता है |

  • सहवास के द्वारा
  • रक्त या रक्त संघटकों के आधान के द्वारा
  • माँ से भ्रूण या नवजात को ।

जो माताएँ मादक द्रव्यों का सेवन करती हैं, वेश्या हैं, पति या लैंगिक साथी एच.आई.वी. से पीड़ित है, एक से अधिक लैंगिक साथी हैं या कोई अन्य यौन रोग है । तो उन्हें एच.आई.वी. होने की अधिक संभावना रहती है । संक्रमण के तीन से छह सप्ताह के भीतर पीड़ित व्यक्ति को कुछ सामान्य तकलीफें होती हैं; जैसे-बुखार, रात में पसीना, थकावट, त्वचा पर दाने, सिर में दर्द, गिल्टियाँ, गले में खराश, मांसपेशियों में दर्द, जोड़ों में दर्द, मिचली, उलटी और दस्त । कुछ दिनों में ये तकलीफें ठीक हो जाती हैं और उस व्यक्ति के रक्त में एक निश्चित मात्रा (Set point) में वायरस रह जाते हैं । इस यौन रोग से संक्रमित व्यक्ति अन्य सामान्य व्यक्तियों जैसा ही दिखता है, पर वह दूसरों को संक्रमित कर सकता है । एच.आई.वी. की जाँच करने पर जाँच पॉजिटिव आती है । इस चरण के बाद एड्स होने में लगभग दस वर्ष लग जाते हैं । गर्भावस्था में एच.आई.वी. की जाँच शुरू में ही कर लेनी चाहिए । यदि जाँच में एच.आई.वी. का निश्चित पता चल जाता है, तब भ्रूण एवं नवजात में संक्रमण रोकने के लिए माँ को पूरी गर्भावस्था में एंटीवायरल दवाएँ दी जाती हैं । वायरल लोड अधिक हो तो इन्हें प्रसव के समय जिडोवूडिन नामक सुई नस में दी जाती है । जन्म के बाद नवजात को भी कुछ दिनों के लिए दवाएँ दी जाती हैं । माँ से नवजात को संक्रमण होने की आशंका सबसे अधिक प्रसव के समय होती है, अत: बहुत चिकित्सक सामान्य प्रसव के बजाय सिजेरियन करना नवजात के लिए अधिक सुरक्षित मानते हैं । यह संक्रमण माँ के दूध द्वारा भी नवजात को हो सकता है । समय पूर्व प्रसव, लंबे प्रसव एवं उल्व द्रव की झिल्ली फटने के बाद बच्चे के संक्रमण की आशंका बढ़ जाती है । एच.आई.वी. से पीडित महिला को यदि गर्भधारण की बहुत इच्छा न हो तो उसे ऐसे गर्भ निरोधक उपाय अपनाने चाहिए, जो गर्भ रोकने में काफी सफल हैं । इनके रक्त में क्रियाटिनिन, लिवर एंजाइम, वायरल लोड, सी.डी.4 की संख्या, हीमोग्लोबिन की मात्रा, एच.एस.वी., सी.एम.वी, हेपेटाइटिस सी, टॉक्सोप्लाजमोसिस की जाँच होनी चाहिए । छाती का एक्स-रे एवं टी.बी. का टेस्ट तथा गर्भ के आकलन के लिए अल्ट्रासाउंड करना भी आवश्यक है । प्रसव के बाद यदि माँ को इस यौन रोग अर्थात एच.आई.वी. के कारण कोई अन्य तकलीफ नहीं हो रही हो, सी डी4 की संख्या ठीक हो और वायरल लोड कम हो तो दवाएँ बंद की जा सकती हैं ।

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