रक्त परीक्षण एवं मल मूत्र बलगम परीक्षणों की जानकारी

कुछ सामान्य सी परेशानियों के होने पर रक्त परीक्षण करके बीमारियों का पता लगाने की कोशिश की जाती है | इसलिए किसी भी बीमारी के निदान में रक्त परीक्षण का अहम् योगदान है | आज हम हमारे इस लेख के माध्यम से कुछ रक्त परीक्षणों एवं कुछ अन्य परीक्षणों के बारे में जानने की कोशिश करेंगे |

रक्त परीक्षण

पूरा आर्टिकल (लेख) एक नज़र में.

एच.बी. या हीमोग्लोबिन रक्त परीक्षण :

रक्त में हीमोग्लोबिन की कमी के कारण एनीमिया नामक रोग हो जाता है । शरीर में कोई इन्फेक्शन होने के कारण भी हीमोग्लोबिन की कमी हो सकती है । हीमोग्लोबिन की जांच करने के लिए उंगली में सुई चुभाकर जरा सा रक्त ले लेते हैं । इस रक्त का परीक्षण करके हीमोग्लोबिन का पता लगा लेते हैं । सामान्य तंदुरुस्त व्यक्ति के शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा 13-18 तक होती है ।

टीएलसी या टोटल ल्यूकोसाइट काउंट :

इस जांच द्वारा श्वेत रक्त कणों की संख्या पता लगाते हैं श्वेत रक्त कणों की संख्या अधिक होने पर यह पता लगता है कि शरीर किसी संक्रामक रोग का शिकार है । रक्त कैंसर के लिए यह जांच बहुत जरूरी है । इस जांच के लिए खून की कुछ बूंदों की आवश्यकता होती है ।

डीएलसी या डिफरेनशियल ल्यूकोसाइट काउंट :

खून में विभिन्न प्रकार के श्वेत कणों का अनुपात जांचने के लिए यह रक्त परीक्षण किया जाता है । इनसे बैक्टीरियल रोगों और कई प्रकार की एलर्जी की जांच की जाती है ।

ईएसआर रक्त परीक्षण :

रक्त में इंफैक्शन की गंभीरता का अनुमान लगाने के लिए ईएसआर नामक रक्त परीक्षण किया जाता है  । इस जांच से यह पता लग जाता है कि रोग के इलाज में कुछ सुधार है अथवा नहीं । इस जांच के लिए लगभग 1.8 मि.ली. मिलीमीटर रक्त की आवश्यकता पड़ती है ।

बीटी और सीटी परीक्षण :

इस परीक्षण से यह पता लगाया जाता है कि खून को जमने में कितना समय लगेगा । कोई भी आपरेशन करने से पहले आमतौर पर यह जांच की जाती है । बीटी के जांच में उंगली पंक्चर करके खून निकाला जाता है जबकि सीटी में एक पतली ट्यूब में खून की कुछ बूंदें ही ली जाती हैं ।

 एब्सोल्यूट इयोसिनाफिल काउंट :

यह रक्त परीक्षण विशेष रूप से इयोसिनोफीलिया की संभावना होने पर किया जाता है । इसकी सहायता से एलर्जी तथा कई प्रकार के संक्रमणों का परीक्षण किया जाता है । इसका सामान्य मान 40-400 क्यूबिक मिलीमीटर होता है ।

 ब्लड कल्चर :

जब रक्त के विषाक्त होने का अंदेशा होता है तो ब्लड कल्चर की सहायता से एन्टीबायोटिकस के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है । इसके लिए खून का नमूना लेकर बैक्टीरिया का संवर्धन किया जाता है । इससे संक्रमण के प्रकार का पता लगता है । रक्त की जांच करके डाइबिटीज या मधुमेह का भी निदान किया जाता है । इस रोग में शक्कर की मात्रा बढ़ जाती है । रोगी के मूत्र में भी शक्कर आने लगती है । इस बीमारी के निदान के दो तरीके हैं :

ब्लड शुगर फास्टिंग :

रोगी को मधुमेह है या नहीं और यदि है तो नियंत्रण के बाहर तो नहीं है । इस प्रकार की जानकारी ब्लड शुगर फास्टिंग से मिलती है । यह जांच खाली पेट की जाती है । इसका मान 70-100 होता है । पीपी | (नाश्ते के बाद) का मान 140 मिलीग्राम तक होता है ।

 जीटीटी :

इस रक्त परीक्षण द्वारा रक्त में शक्कर की मात्रा पता लग जाती है । यह परीक्षण एक मिलीलिटर खून से ही किया जा सकता है । मधुमेह या गुर्दे आदि में पथरी होने पर गुर्दो पर बहुत जोर पड़ता है । गुर्दे हमारी रक्त की गंदगी को बाहर निकालने में मदद करते हैं । ये रक्त में हर पदार्थ की मात्रा का संतुलन बनाए रखते है । गुर्दो में किसी प्रकार का विकार भी जानलेवा सिद्ध हो सकता है ।

गुर्दै संबंधी रक्त परीक्षण :

रक्त की जांच करके गुर्दो की कार्य क्षमता पता लगाई जाती है ।

 ब्लड यूरिया :

इस टेस्ट अर्थात रक्त परीक्षण द्वारा सिर्फ एक मिलीलिटर खून में यह जांच कर सकते हैं । कि गुर्दे ठीक-ठाक काम कर रहे हैं या नहीं । इससे रक्त में यूरिया की मात्रा ज्ञात की जाती है । इसका मान 10 से 50 तक होता है ।

सिरम इलेक्ट्रोलाइटस:

हमारे शरीर में विभिन्न इलेक्ट्रोलाइट्स की एक निश्चित मात्रा होती है, लेकिन उल्टी-दस्त होने पर या दिल का दौरा पड़ने से यह तालमेल बिगड़ जाता है । इसका निदान सिरम इलेक्ट्रोलाइटस यानी खून में इलेक्ट्रोलाइट्स की जांच करके किया जाता है । इसकी जांच भी खून से की जाती है । इसका मान (0.5 से 1.4 उह:) तक होता है । गुर्दो की कार्यप्रणाली में रूकावट होने पर इसी जांच द्वारा जानकारी मिलती है कि डायलेसिस कब किया जाना चाहिए ।

लीवर संबंधी रक्त परीक्षण :

पाचन तंत्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए  जिगर महत्वपूर्ण कार्य करता है । इसके अलावा पुराने लाल रक्तकण, कीटाणुओं, हो जहरीले पदार्थों आदि को भी जिगर नष्ट कर देता है । जिगर की कार्यप्रणाली के प्रभावित होने से पीलिया नामक रोग हो जाता है । इस रोग की डाक्टरी जांच निम्न तरीकों से की जाती है ।

सिरम बिलिरूबिन :

इस जांच से पीलिया का निदान किया जाता है और  रोग के कारण का भी पता लगाया जाता है, क्योंकि पीलिया खून में खराबी से भी हो सकता है । इसका मान 0.2 – 1.0 मि.ग्रा. प्रतिशत चाहिए ।

एन्जाइम टेस्ट :

यह जांच पीलिया की किस्म का पता लगाने में सहायक होती है । जिगर के रोगग्रस्त हो जाने से उसमें बनने वाले दो एन्जाइमों (SGPT, SGOT) की मात्रा इस जांच से मापी जाती है । हृदयाघात के निदान में  यह जांच महत्वपूर्ण है ।

सिरम एलकेलाईन फाफेटेज :

इस रक्त परीक्षण द्वारा पीलिया की किस्म के साथ-साथ अस्थिरोगों का भी पता लगाया जाता है ।

आस्ट्रेलियन एंटीजन :

इससे पीलिया में हेपेटाइटिस का निदान किया जाता है ।

 बुखार में रक्त परीक्षण :

कभी-कभी साधारण सा लगने वाला बुखार गंभीर रूप धारण कर लेता है । ऐसी स्थिति में डाक्टर रक्त की जांच करते है । यह जांच बुखार का कारण तलाशने के लिए सहायक सिद्ध होती है । आमतौर पर बुखार का कारण जानने के लिए की जाने वाली जांचों की संक्षिप्त जानकारी नीचे दी जा रही है ।

 ब्लड फॉर एमपी :

यह रक्त परीक्षण मलेरिया का संदेह होने पर किया जाता है । खून की कुछ बूंदे लेकर उनमें मलेरिया फैलाने वाले पैरासाइटों की जांच की जाती है । यह टेस्ट बुखार की आरंभिक अवस्था में ही करवा लेना चाहिए ।

विडाल टेस्ट :

यदि बुखार एक सप्ताह से अधिक समय तक रहता है, तभी यह टेस्ट किया जाता है । इस टेस्ट द्वारा मोतीझारा या टाइफाइड का पता लगाया जाता है ।

ब्लड कल्चर :

इस रक्त परीक्षण में लगभग 10 मिलीलीटर खून लेकर उनमें रोगाणुओं की पहचान करके बुखार के कारण का पता लगाया जाता है । रक्त की जांच करके रूमेटाइएड गठिया का भी निदान किया जाता है । इस परीक्षण को आर.एच. फैक्टर भी कहते हैं ।

थॉयराइड के लिए रक्त परीक्षण :

हमारे शरीर में गले में नीचे की तरफ थॉयराइड ग्रंथि होती है । यह ग्रंथि थॉयरोक्सीन नामक हारमोन बनाती है । ग्रंथि के सुचारू रूप से काम न करने से थॉयराइड बढ़ जाती है या अन्य असामान्यताएं पैदा हो जाती है । अतः इसके सामान्य होने या रोगों के निदान के लिए थायराइड की जांच आवश्यक होती है । सिरम टी-3, या सिरम टी-4 या सिरम टी एस एच इन तीनों ही जाचों से थायराइड के सुचारु कार्य करने का पता लग जाता है । यदि कोई विकार है तो इसका कारण भी जाना जा सकता है । टी-3 का मान 0.7-2.1 का मान 4 से 12 तथा टीएसएच का मान 0.7 से 5.0 तक होता है ।

हृदय संबंधी रक्त परीक्षण :

हृदय रोगों में धमनियों में कोलेस्ट्राल का जमना, धमनियों की दीवारों में कड़ापन होना या रक्त में लाइपोप्रोटीन्स की मात्रा का बढ़ना प्रमुख है । इन असामान्यताओं के निदान के लिए विभिन्न रक्त परीक्षण किए जाते हैं |

 सिरम कोलेस्ट्रोल :

हृदय रोगियों में कोलेस्ट्राल की मात्रा मापी जाती है ।

 सिरम लाइपोप्रोटीन्स :

यदि दिल का रोगी बनाने वाली लाइपोप्रोटीन्स बढ़ी हुई होती है तो रोगी को खानपान में सावधानी बरतनी चाहिए । इस जांच  द्वारा रक्त में लाइपोप्रोटीन्स की मात्रा माप कर इसे कम करने की दवाएं दी जाती हैं ।

एंजाइम टेस्ट :

इस रक्त परीक्षण के लिए लगभग 3 मिलीलिटर रक्त लेकर उसका परीक्षण किया जाता है । यह जांच हार्टअटैक के निदान के लिए महत्वपूर्ण है ।

मल परीक्षण द्वारा रोग निदान :

पेट संबंधी रोगों के निदान के लिए मल परीक्षण से हमें महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त होती है । दस्त और पेचिश जैसे रोगों का कारण जानने के लिए मल परीक्षण से महत्वपूर्ण परिणाम मिलते हैं । रक्त अभाव के कारण जानने, पेट के दर्द, पेट के कीड़ों का पता लगाने, आंतों से रक्तस्त्राव का पता लगाने, पेट के संक्रामक रोगों का पता लगाने के लिए मल परीक्षण एक प्रभावशाली तरीका है । मल परीक्षण के लिए एक चौड़े मुंह की बोतल में मल लेना चाहिए और इसे तुरंत ही टेस्ट कराना चाहिए । अधिक देर होने पर मल में उपस्थित रोगाणु परजीवी एन्जाइम आदि समाप्त हो जाते हैं ।

मूत्र परीक्षण :

मूत्र परीक्षण रोग निदान का एक अत्यंत प्रभावशाली तरीका है । मूत्र परीक्षण से गुर्दो और मूत्र नलिका के रोगों का निदान किया जाता है । इसके परीक्षण से रक्त में शक्कर की मात्रा भी ज्ञात की जाती है । मूत्र परीक्षण द्वारा लीवर रोगों का भी निदान किया जाता है, जिसमें पीलिया का रोग मुख्य है । मूत्र के कल्चर परीक्षण से संक्रामक रोगों के रोगाणुओं का ज्ञान प्राप्त होता है ।

मवाद या पस परीक्षण :

घावों या संक्रामक रोगों में बनने वाले पस के परीक्षण से यह पता लगाया जाता है कि कौन सा रोगाणु शरीर पर हमला कर रहा है । सामान्यतः मवाद परीक्षण से उसमें उपस्थित बैक्टीरियों को कल्चर में पनपने दिया जाता है । इसके बाद उसकी प्रतिरोधकता और संवेदनशीलता विभिन्न एंटीबायोटिक औषधियों के लिए ज्ञात की जाती है । जिस औषधि के प्रति बैक्टीरिया अधिक संवेदनशील है वहीं औषधि रोगी को देकर उसका उपचार किया जाता है ।

बलगम परीक्षण :

तपेदिक और फेफड़ों के कुछ अन्य विकारों के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए बलगम का परीक्षण किया जाता है । सांस रोग (अस्थमा) के विश्लेषण के लिए भी बलगम परीक्षण से महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है । फेफड़ों में कैंसर की रसौली के विषय में भी बलगम परीक्षण से स्थिति स्पष्ट होती है । बलगम को सामान्यत सूक्ष्मदर्शी द्वारा देख कर रोग निदान किया जाता है । बलगम कल्चर से रोग के विभिन्न बैक्टीरियाओं की औषधियों के प्रति संवेदनशीलता का विश्लेषण किया जाता है ।

ब्लड ग्रुप तथा आर.एच, टेस्ट :

इस रक्त परीक्षण में रक्त से यह पता लगाया जाता है कि महिला के रक्त में आर एच फैक्टर है अथवा नहीं । आर एच फैक्टर गर्भवती महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है । आर एच नेगेटिव के लिए विशेष औषधियां गर्भवती महिला को दी जाती है ।

 सिफलिस परीक्षण :

रक्त परीक्षण द्वारा जिसे बीडीआरएल परीक्षण कहते हैं, सिफलिस का पता लगाया जाता है ।

गैस्ट्रिक विश्लेषण :

पेट में निकलने वाले रसों का परीक्षण करके यह पता लगाया जाता है कि रोगी को गैस्ट्रिक विकार है या नहीं । अल्सर आदि का पता लगाने के लिए यह परीक्षण किया जाता है । इस परीक्षण को सामान्यत: एंडोस्कोपी द्वारा किया जाता है ।

रीढ़ की हड्डी का परीक्षण (C.S.F.) :

रीढ़ की हड्डी से एक इंजेक्शन द्वारा रस लेकर उसका परीक्षण किया जाता है । इस परीक्षण से रीढ़ की हड्डी का संक्रमण, सूजन, रसौली आदि का पता लगाया जाता है ।

मोनटूस परीक्षण :

यह टीबी अर्थात तपेदिक रोग का परीक्षण है । इस परीक्षण में एक टीका लगाया जाता है और सुई के निशान के चारों ओर पेन से एक छोटा सा गोला बना दिया जाता है | 72 घंटे बाद यह देखा जाता है कि सुई के चारों और इस गोले में लाली तो नहीं आ गई है । त्वचा का यह भाग यदि लाल हो जाता है तो यह निश्चित है कि व्यक्ति तपेदिक  अर्थात टीबी रोग से पीड़ित है ।

रक्त परीक्षण के सामान्य मान

रक्त परीक्षण के नाम

सामान्य मान

यूरिया नाइट्रोजन12 से 15 मि.ग्रा. प्रति 100 सी.सी

 

शुगर (रैन्डम)80 से 120 मि.ग्रा. प्रति 100 सी.सी.
यूरिक एसिड

 

4 से 8 मि.ग्रा. प्रति 100 सी.सी.
प्रोटीन रहित नाइट्रोजन10 से 45 मि.ग्रा. प्रति 100 सी.सी
क्रेटिनिन0.5 से 1.4 मि.ग्रा. प्रति 100 सी.सी.
कोलेस्ट्राल

 

130 से 240 मि.ग्रा प्रति 100 सी.सी.

 

कैल्शियम9 से 11 मि.ग्रा. प्रति 100 सी.सी.

 

सोडियम137 से 143 मि.लि. समतुल्य प्रति लिटर
क्लोराइड585 से 620 मि.ग्रा. प्रति 100 सी.सी.

 

फास्फोरस3 से 4.5 मि.ग्रा. प्रति 100 सी.सी.

 

पोटाशियम4 से 5 मि.ग्रा. समतुल्य प्रति लीटर
बिलीरूबिन

 

0.2 से 1 मि.ग्राम प्रति 100 सी.सी.

 

प्रोटीन6.0 से 8.3 ग्रा. प्रति 100 सी.सी.

 

एल्ब्यूमिन3.2 से 5 ग्रा. प्रति 100 सी.सी.

 

ग्लोबुलिन1.8 से 3.6 ग्रा. प्रति 100 सी.सी.

 

pH7.35 -7.45
एल्फा एमायलेज (काइनेरिक)0-90 यू एल प्रति लिटर
SGOT

 

< 40 इकाई
SGPT

 

< 35 इकाई

 

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