समय के बाद प्रसव के कारण, लक्षण, देखभाल एवं ईलाज.

समय के बाद प्रसव को Post Term Pregnancy भी कहा जाता है, जैसा की हम सबको विदित है की किसी भी माँ द्वारा भ्रूण को अपने गर्भ में एक निश्चित समय जो की लगभग 40 हफ़्तों का होता है तक रखा जाता है | अर्थात कहने का आशय यह है की सामान्य डिलीवरी की अवधि 40 हफ़्तों की होती है और यदि प्रसव के समय गर्भ की अवधि 42 सप्ताह या उससे अधिक हो चुकी हो तो उसे समय के बाद प्रसव या समयोपरांत प्रसव कहा जा सकता है । ठीक इसी तरह निर्धारित समय से पहले जन्म को समय से पहले प्रसव कहा जा सकता है, गर्भ की अवधि निर्धारित समय से जैसे जैसे बढती जाती है गर्भ में पलने वाले शिशु के लिए यह स्थिति उतनी ही खतरनाक होती जाती है, चूँकि गर्भ में शिशु को पोषण एवं ऑक्सीजन माँ से प्लासेंटा द्वारा छनकर प्राप्त होता है, जो गर्भ के अंतिम दिनों में धीरे धीरे निष्क्रिय होने लगता है यही कारण है की इसका असर शिशु के विकास के साथ साथ गर्भजल की मात्रा पर भी पड़ता है |

समय के बाद प्रसव post-term-pregnancy

 

समय के बाद प्रसव के कारण(Cause of Post term Pregnancy in Hindi):

हालांकि समय के बाद प्रसव का अभी तक कोई ठोस एवं निश्चित कारण पता नहीं चल पाया है, लेकिन इसके बावजूद कुछ संभावित करण निम्नलिखित हैं |

  • ऐसी महिला जिसे पहले भी समय के बाद प्रसव की समस्या हुई हो उसे यह समस्या दुबारा भी हो सकती है |
  • अकसर महिलाएँ अंतिम मासिक की तिथि भूल जाती हैं, जिसके कारण गणना में गलती हो जाती है ।
  • जिन महिलाओं की माहवारी अनियमित है, उनमें भी गणना की गलती हो सकती है।
  • ऐसी अवस्था में शिशु का जन्म पूर्व निर्धारित तिथि के पहले या बाद में भी हो सकता है |
  • यदि गर्भावस्था के शुरू में ही भ्रूण की आयु निर्धारित कर ली जाए तो समय के बाद होने वाले प्रसवों की संख्या में काफी कमी आ जाएगी । इसमें अल्ट्रासाउंड जांच काफी सहायक होती है ।

समय के बाद प्रसव से पैदा बच्चे के लक्षण:

समय के बाद प्रसव से पैदा होने वाले बच्चों में अलग अलग लक्षण उजागर हो सकते हैं लेकिन कुछ मुख्य लक्षणों की लिस्ट कुछ इस प्रकार से है |

  • समय के बाद प्रसव से पैदा हुए अधिकांश बच्चों की त्वचा सूखी होती है |
  • इनके  नाखून बढ़े होते हैं |
  • इन बच्चों के हथेली एवं तलवों में लकीरें होती हैं |
  • ऐसे बच्चों में चरबी कम होती है और सिर पर काफी बाल होते हैं ।
  • समय के बाद प्रसव से पैदा बच्चों की त्वचा हरी, भूरी या पीली भी हो सकती है।
  • कुछ नवजात काफी मोटे दिखते हैं एवं सामान्य से अधिक वजन के होते हैं।

समय के बाद प्रसव की जटिलताएं (Complications of post term Pregnancy in hindi):

समय के बाद प्रसव में आने वाली मुख्य जटिलताएं यानिकी Complications निम्नलिखित हैं |

  1. अपरा (Placenta)में रक्त-प्रवाह कम होना:

गर्भावस्था यानिकी प्रेगनेंसी के 40 सप्ताह के बाद और कभी-कभी उसके कुछ पहले भी अपरा की रक्त वाहिनियों में कैल्सियम जमने के कारण ये रक्त वाहिनियाँ धीरे-धीरे सिकुड़ने लगती हैं । अपरा के सतह पर प्रोटीन का जमाव भी होने लगता है । इन कारणों से अपरा के रक्त-परिसंचरण में कमी आने लगती है । जैसे-जैसे गर्भ आगे बढ़ता है, परिसंचरण में अधिक-से-अधिक कमी आने लगती है, जिससे शिशु को पोषण का अभाव होने लगता है । इससे शिशु का विकास प्रभावित होता है और कभी-कभी समय के बाद प्रसव से उसकी मृत्यु भी हो जाती है ।

  1. गर्भजल की कमी होना (Oligohydramnios):</h3

यदि गर्भ की अवधि निश्चित समय से आगे बढ़ती है अर्थात समय के बाद प्रसव की समस्या होती है तो गर्भजल की मात्रा धीरे-धीरे कम होने लगती है। पोषण तथा गर्भजल में क्रमश: होती कमी के कारण भ्रूण गर्भजल में ही मल-त्याग करने लगता है, जो सामान्यत: जन्म के बाद होता है । वह मल गर्भजल के साथ धीरे-धीरे शिशु के श्वसन-तंत्र में चला जाता है । फलस्वरूप जन्म लेने के साथ ही उसे साँस लेने में भी दिक्कत होने लगती है ।

  1. वैषम्य (Disproportion):

निर्धारित समय के बाद जितनी देर भी शिशु गर्भ में रहता है Complications अर्थात जतीलातायें उतनी ही बढती जाती हैं , क्योंकि शिशु का शरीर धीरे-धीरे बढ़ता जाता है और उसकी हड़ियाँ कड़ी होती जाती हैं, जिससे प्रसव के समय माँ को अधिक कठिनाई होती है तथा ऑपरेशन होने का खतरा बढ़ जाता है । शिशु का सिर माँ के श्रोणि (pelvis) के अनुपात में बड़ा हो जाता है और दोनों के आकार में वैषम्य (disproportion) होने के कारण ऑपरेशन की संभावना बढ़ जाती है । इसी तरह शिशु के कंधे भी कई बार अधिक चौड़े होने के कारण श्रोणि में घुस नहीं पाते और सामान्य प्रसव के समय सिर तो निकल जाता है, पर कंधे फंसे रह सकते हैं ।

  1. मानसिक तनाव एवं चिंता:

समय के बाद प्रसव के कारण अर्थात समय पर प्रसव शुरू नहीं होने पर भ्रूण एवं प्रसव दोनों  के लिए चिंता बढती जाती है । जिससे माँ एवं भ्रूण दोनों के मानसिक स्वास्थ्य पर इसका विपरीत असर हो सकता है |

निर्धारित समय के बाद गर्भ की देखभाल :

निर्धारित समय पर बच्चा न होने अर्थात समय के बाद प्रसव की स्थिति में गर्भ की देखभाल करना बेहद जरुरी हो जाता है, निम्नलिखित जांचों के माध्यम से निर्धारित समय के बाद बच्चे की देखभाल की जा सकती है |

  1. किक चार्ट (kick chart):

अपने गर्भ में पल रहे भ्रूण की गति का अनुभव हर माँ को होते रहता है । इन गतिविधियों का अनुभव स्वस्थ भ्रूण का परिचायक है। चूँकि समय के बाद प्रसव में गर्भ में भ्रूण को खतरा रहता है, अत: इसकी गतिविधियों का चार्ट बनाने की सलाह माँ को दी जा सकती है । जिस चार्ट को ‘किक चार्ट’ कहा जाता है गर्भ में बच्चे की दो घंटों में 10 बार से कम गतिविधि का होना अच्छा लक्षण नहीं है । गतिविधियों में कमी अपरा की निष्क्रियता की भी पहचान है |

  1. इलेक्ट्रॉनिक फीटल मॉनीटर:

इलेक्ट्रॉनिक फीटल मॉनिटर नामक यह एक मशीन है, जिसे माँ पर लगा कर बच्चे की हृदय गति का अंकन किया जाता है । सामान्यत: इसे 20 मिनट तक देखा जाता है । इस अवधि में हृदय की गति बीच-बीच में बढ़ी दिखाई पड़ती है । हृदय की गति का बीच-बीच में बढ़ते रहना अच्छा लक्षण है और वह सक्रिय बच्चे की निशानी है । यदि हृदय गति में 20 मिनट के भीतर एक बार भी वृद्धि नहीं हुई तो इस प्रक्रिया को 20 मिनट और बढ़ाकर देखा जाता है । यदि 40 मिनट के भीतर भी हृदय एक ही गति से धड़कता रहा और एक बार भी तेज नहीं हुआ तो यह भ्रूण की निष्क्रियता का लक्षण हो सकता  है । समय के बाद प्रसव में इस मशीन के द्वारा गर्भाशय के संकुचन का भी पता चलता है तथा बच्चे की हृदय गति पर संकुचन का प्रभाव भी दिखाई दे सकता है ।

  1. अल्ट्रासाउंड:

अल्ट्रासाउंड भी एक प्रकार की जांच है इसके द्वारा भ्रूण की हृदय गति, हाथ व पैरों में गतिशीलता, श्वसन-प्रक्रिया, भ्रूण का वजन एवं गर्भजल की मात्रा का आकलन किया जाता है। इसे बायोफिजिकल प्रोफाइल (Biophysical profile) भी कहा जाता है ।

  1. कलर डॉप्लर फ्लो अध्ययन:

समय के बाद प्रसव की स्थिति में अल्ट्रासाउंड मशीन की इस विधि द्वारा अपरा में रक्त-प्रवाह की मात्रा तथा शिशु पर उसके प्रभाव का पता लगाया जाता है । यह अल्ट्रासाउंड जाँच की एक विशेष विधि है । अपरा की निष्क्रियता के बाद भी शिशु कब तक सुरक्षित रह सकता है, यह इसकी जानकारी भी देता है ।

समय के बाद प्रसव का ईलाज (Treatment of Post term Pregnancy in Hindi):

समय के बाद प्रसव अर्थात समयोपरांत प्रसव के ईलाज को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है |

  • आशान्वित ईलाज (Expectant treatment):

महिला का गर्भ यदि समय से आगे बढ़ने लगे तो दवाओं द्वारा प्रसव क्रिया संपन्न कराना ही सुरक्षित है । पर यदि माँ या उसके परिवारवाले ऐसा नहीं चाहते हैं और प्रतीक्षा करना चाहते हैं, तो गहन देखभाल के साथ निर्धारित समय के बाद भी गर्भ को आगे बढ़ाया जा सकता है । पर इसके साथ-साथ भ्रूण और माँ के लिए खतरे भी बढ़ने लगते हैं । प्रसव प्रक्रिया शुरू कराने के पहले गर्भ की सही अवधि निश्चित कर लेना जरूरी है, समय से पहले प्रसव के ईलाज के लिए माँ का पूरा इतिहास, इस गर्भ के पुराने कागजात एवं गर्भ के शुरू के दिनों की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट्स काफी महत्वपूर्ण होती हैं ।

  • सक्रिय ईलाज (Active Treatment):

समय के बाद प्रसव अर्थात समयोपरांत गर्भ का सक्रिय उपचार प्रसव- उत्प्रेरण है । इस प्रक्रिया में ईलाज करने के लिए दवा एवं अन्य विधियों का प्रयोग किया जाता है, ताकि प्रसव-पीड़ा शुरू हो सके । यदि गर्भग्रीवा मुलायम और ढीला हो तो दवाएँ जल्दी काम करती हैं । पर ऐसा नहीं होने पर दवाओं द्वारा गर्भग्रीवा को मुलायम और ढीला करने की कोशिश की जाती है, जिसे सर्वाइकल राइपेनिंग कहा जाता है ।

About Author:

Post Graduate from Delhi University, certified Dietitian & Nutritionists. She also hold a diploma in Naturopathy.

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