समय से पहले जन्म के कारण, लक्षण, खतरे, बचाव एवं ईलाज

समय से पहले जन्म से हमारा आशय Preterm birth से है जैसा की हम सबको विदित है की गर्भ की सामान्य अवधि 40 सप्ताह की होती है, अर्थात् 280 दिन या फिर इसे 9 महीने और 7 दिन भी कह सकते हैं । गर्भ के अवधि की गणना जिस दिन गर्भाधान हुआ होता है उस दिन से नहीं अपितु अंतिम मासिक के पहले दिन से इसकी गणना की जाती है |इसी गणना के अनुसार जब किसी का बच्चा सैंतीसवें सप्ताह से पहले हो जाता है तो उसे Preterm birth या फिर समय से पहले जन्म कहा जाता है | यह एक आम समस्या है, जो नवजात के लिए विश्व भर में प्रमुख है अधिकांशत: समय पूर्व प्रसव स्वत: होता है, पर कभी-कभी गर्भावस्था की विशेष जटिलताओं के कारण उत्प्रेरित करके समय से पहले जन्म कराना पड़ता है ।

समय से पहले जन्म Preterm labor

समय से पहले जन्म के कारण (Cause of Preterm Labor Hindi):

यद्यपि समय से पूर्व प्रसव क्यों होता है, इसका कोई निश्चित कारण अभी सामने आ नहीं पाया है या यूँ कहें अभी इस बात का निश्तिच रूप से को पता लग नहीं पाया है

। परंतु कई परिस्थितियों में इसके होने का खतरा अधिक पाया जाता है जिनका विवरण निम्नवत है ।

  • डायबिटीज या मधुमेह से ग्रसित महिलाओं में यह अधिक देखने को मिलता है |
  • उच्च रक्तचाप यानिकी हाई ब्लड प्रेशर भी एक कारण हो सकता है |
  • समय से पहले जन्म के लिए गर्भ में जुड़वाँ या अधिक भ्रूण होना भी एक कारण हो सकता है |
  • महिला का अधिक मोटा होना या अधिक दुबला होना भी एक कारण हो सकता है | योनि का संक्रमण |
  • धूम्रपान एवं मानसिक तनाव ।

समय से पहले जन्म के खतरे:

एक आंकड़े के मुताबिक दुनिया भर में सर्वाधिक शिशुओं की मृत्यु समय से पहले  जन्म लेने से हो जाती है। पूरे विश्व में हर साल लगभग 15 करोड़ शिशुओं का जन्म समय पूर्व होता है । यह कुल प्रसव का 5 से 13 प्रतिशत है । 23 सप्ताह से कम अवधि के शिशुओं के बचने की संभावना न के बराबर होती है । 23 सप्ताह के बाद जैसे-जैसे गर्भ की अवधि बढ़ती है, नवजात के बचने की संभावना भी बढ़ती जाती है । विकासशील देशों की तुलना में विकसित देशों में समय पूर्व नवजात को काफी संख्या में बचा लिया जाता है और पच्चीसवें सप्ताह के गर्भ के बाद नवजात के बचने की संभावना काफी बढ़ जाती है । विकासशील देशों में यह संख्या अभी भी काफी नीचे है और 26 सप्ताह से कम के बच्चों को बचा पाने की उम्मीद बहुत कम रहती है । इसका मुख्य कारण यह है कि समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चे के लिए गहन इकाई केंद्रों की संख्या बहुत कम है, जहाँ समय पूर्व जन्मे नवजात की पूरी देखभाल हो सके । समय पूर्व जन्मे शिशुओं की मृत्यु का खतरा जन्म के पहले महीने में सर्वाधिक होता है । इसके बाद यह खतरा धीरे-धीरे कम होता जाता है । इसके बावजूद फिर भी, जन्म के बाद एक वर्ष की अवधि तक सामान्य शिशुओं की अपेक्षा समय पूर्व शिशुओं में मृत्यु की संभावना अधिक रहती है । जो समय पूर्व नवजात बच जाते हैं, उन्हें बाद में सेरीब्रल पाल्सी (Cerebral palsy), सर्वागीण विकास में देरी, श्रवण क्षमता में दोष एवं दृष्टि-दोष होने की संभावना रहती है । कहने का आशय यह है की पूर्व निर्धारित समय से जितना पहले शिशु जन्म लेता है, खतरे भी उसी अनुपात में अधिक होते हैं ।

समय पूर्व प्रसव के लक्षण (Symptoms of preterm Labor Hindi):

समय पूर्व प्रसव अर्थात समय से पहले जन्म के कुछ मुख्य लक्षण निम्नवत हैं |

  • गर्भाशय में एक घंटे में चार बार से अधिक संकुचन होता है तो उसे समय पूर्व प्रसव का लक्षण समझा जाता है ।
  • प्रसव जब वस्तुत: शुरू होता है, तब संकुचन के साथ-साथ गर्भाशय ग्रीवा का फैलाव एवं विलोपन भी होने लगता है ।
  • कभीकभी गर्भावस्था की अंतिम तिमाही में रक्तस्राव, कमर दर्द एवं पेट के निचले हिस्से में भारीपन जैसे लक्षणों से इसकी शुरुआत हो सकती है ।
  • योनि से रंगहीन तरल द्रव निकलना यह इंगित करता है कि उल्व द्रव की झिल्ली फट गई है ।
  • झिल्ली फटने के बाद यदि प्रसव स्वत: नहीं भी शुरू होता है तो कुछ दिनों में प्रसव को उत्प्रेरित कर शुरू कराना जरूरी हो जाता है, अन्यथा माँ और बच्चे दोनों को संक्रमण से खतरा होता है ।
  • कभी-कभी गर्भाशय ग्रीवा का फैलाव समय पूर्व भी बिना दर्द के हो जाता है और माँ को इसका आभास प्रसव के दौरान काफी देर के बाद होता है ।

समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों में समस्याएं:

समय से पहले जन्म लेने वाले नवजात के विभिन्न तंत्र कम विकसित होते हैं, क्योंकि गर्भाशय में पूरा समय नहीं व्यतीत करने के कारण उनका विकास पूरा नहीं हो पाता है । इसलिए इस प्रकार के बच्चों में कुछ समस्याएँ शुरू से ही होती हैं, जिनमें श्वास बंद होना, श्वास लेने में कठिनाई (Respiratory distress syndrome), मस्तिष्क में रक्तस्राव, ह्रदय की जटिलताए, रक्त में शर्करा की कमी इत्यादि प्रमुख समस्याएं हैं । इन बच्चों में कुछ दिनों में छोटी आँत में जख्म जैसी अति गंभीर समस्या के होने का भी डर रहता है। बाद में इन बच्चों को सीखने की क्षमता में कमी, फेफड़े की लंबी बीमारियाँ (Chronic lung disease), पाचन तंत्र की समस्याएँ मधुमेह एवं हर्निया होने का भी डर रहता है । समय से पहले जन्म लेने वाले नवजात को रक्त की कमी एवं पीलिया (Jaundice) होने की भी अधिक संभावना रहती है । बार-बार फेफड़े का संक्रमण, निमोनिया एवं मूत्र प्रणाली का संक्रमण भी हो सकता है । ऐसे बच्चों को विभिन्न परेशानियों के लिए बार-बार अस्पताल में भरती होने की भी आवश्यकता पड़ सकती है ।

समय पूर्व प्रसव की पहचान के लिए जांच:

समय पूर्व प्रसव के लक्षणों को पहचानने के लिए कुछ परीक्षण किए जा सकते हैं |
अल्ट्रासाउंड : यह गर्भावस्था के 24 सप्ताह या उसके पहले किया जा सकता है, यदि अल्ट्रासाउंड मशीन द्वारा नापने पर गर्भाशय ग्रीवा की लंबाई 25 मि.मी. से कम हो तो समय पूर्व प्रसव की अधिक संभावना होती है ।

फीटल फिब्रोनेक्टिन (Foetal Fibronectin-FFN):
वह महिला जो माँ बनने जा रही हो की योनि के स्राव में FFN के परीक्षण से पता चलता है कि समय पूर्व प्रसव का खतरा अधिक है या कम । यदि परीक्षण में FFN नहीं पाया गया तो परीक्षण के एक सप्ताह के भीतर शिशु के जन्म लेने की संभावना सिर्फ 1 प्रतिशत होती है ।

समय पूर्व प्रसव से कैसे बचें

समय पूर्व प्रसव से बचने के लिए समबन्धित महिला को गर्भ धारण से पहले एवं गर्भधारण के बाद अनेकों सावधानियां अपनानी पड़ती हैं जिनका विवरण निम्नवत है | गर्भ धारण करने से पहले ही महिला को अपने खान पान का विशेष ध्यान रखना पड़ता है | धुम्रपान को त्याग देना या धुम्रपान नहीं करना |

  • फोलिक एसिड की गोलियाँ लेना समय पूर्व प्रसव के खतरे को कम करते हैं ।
  • गर्भावस्था में कैल्सियम, विटामिन C एवं E लेने से समय पूर्व प्रसव का खतरा कम होता है । गर्भावस्था के दौरान योनि के संक्रमण का इलाज करने से भी इसका खतरा कम होता है ।
  • गर्भ के चौबीसवें सप्ताह से पहले यदि गर्भाशय ग्रीवा (की लंबाई 25 मिलीमीटर या इससे कम हो तो उसका उपचार गर्भाशय ग्रीवा के चारों ओर टाँका लगाकर किया जाता है, जो गर्भाशय ग्रीवा को खुलने से रोकता है ।
  • इसके अलावा कुछ दवाइयाँ, जैसे-एंटीबायोटिक्स और प्रोजेस्टेरॉन भी समय पूर्व प्रसव की संख्या में कमी लाती हैं ।

समय से पूर्व प्रसव का ईलाज (Treatment of preterm labor hindi):

जिन महिलाओं में समय पूर्व प्रसव होने की संभावना का पहले से पता हो तो उनमें बचाव की विधियों को प्रयोग में लाया जा सकता है । परंतु यदि समय पूर्व प्रसव की शुरुआत हो चुकी हो, जिसके लक्षण हैं-झिल्ली का फटना, गर्भाशय में संकुचन शुरू होना और गर्भाशय ग्रीवा का फैलाव तथा विलोपन इत्यादि | इस स्थिति में तब प्रसव-पीड़ा को रोकने की कोशिश की जाती है । इस ईलाज का मुख्य उद्देश्य प्रसव को तब तक रोके रखना होता है, जब तक कि गर्भवती महिला को ऐसे किसी अस्पताल में स्थानांतरित न कर दिया जाए, जहाँ समय से पहले जन्म लेने वाले नवजात शिशु की देखभाल हो सके या जहाँ नवजात शिशु की गहन देखभाल की इकाई (NICU) उपलब्ध हो ।समय से पूर्व प्रसव का ईलाज करते वक्त शिशु के श्वसन-तंत्र को परिपक्व करने के लिए माँ को कुछ सुइयाँ दी जाती हैं, जिनसे शिशु की मृत्यु-दर में कमी आती है । इन सुइयों के असर से नवजात के मस्तिष्क में रक्तस्राव, हृदय संबंधी समस्याओं तथा पाचन तंत्र की समस्याओं में भी कमी आती है । कुछ दवाएँ समय से पहले जन्म को रोकने या प्रसव की गति कम करने के लिए भी दी जाती हैं, ताकि माँ को अच्छी व्यवस्था वाले अस्पताल में पहुँचने के लिए अधिक समय मिल सके । यदि उल्व द्रव की झिल्ली फट चुकी हो तो एंटीबायोटिक्स देनी पड़ती है, ताकि संक्रमण की समस्या को कम किया जा सके ।इस स्थिति में बच्चे का जन्म सामान्य प्रसव से हो सकता है । लेकिन कभी-कभी परिस्थिति को देखकर डॉक्टर द्वारा सिजेरियन सेक्शन का भी निर्णय लिया जा सकता है ।

समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चे की देखभाल:

यदि नवजात बहुत कमजोर हो तो उसकी गहन देखभाल के लिए NICU में रखा जाता है, जहाँ उसके तापमान, पोषण, ऑक्सीजन एवं अन्य तंत्रों की देखभाल की जाती है । NICU में सभी तंत्रों का ध्यान रखने के लिए विभिन्न उपकरण मौजूद होते हैं । जब ऐसा लगता है कि नवजात स्वयं अपने ऑक्सीजन की मात्रा और तापमान को नियंत्रित रख सकता है, तब उसे NICU से बाहर निकाल दिया जाता है । बहुत समय पहले से  नवजात को शुरू में नस द्वारा पोषण दिया जाता है । फिर पेट में ट्यूब डालकर उसके द्वारा एक निश्चित अंतराल पर दूध दिया जाता है । जब बच्चा स्वयं घुटकने लायक हो जाता है, तब उसे मुँह से दूध दिया जाता है, फिर कुछ दिनों में माँ का स्तन वह स्वयं चूस सकता है । नस में ग्लूकोज चढ़ाकर तथा विभिन्न प्रकार की सहायता देकर समय से पहले जन्म लेने वाले नवजात का ईलाज एवं देखभाल तब तक की जाती है, जब तक कि वह NICU के बाहर स्वयं जीवित रहने के योग्य न हो जाए । NICU में या उसके बाहर भी नवजात को माँ के शरीर से सटाकर रखने से भी उसके विकास में सहायता पहुँचती है । चूँकि जैसे कंगारू अपने बच्चे को सटाकर रखता है यह क्रिया वैसे ही होती है इसलिए शरीर से सटाकर रखने की इस क्रिया को कंगारू केयर कहा जाता है ।

विभिन्न अध्यनों में पाया गया है की समय से पहले जन्म लेने वाले नवजात को भविष्य में भी अनेक जटिलताओं की संभावना सामान्य बच्चों की अपेक्षा अधिक होती है । इनमे कुछ जटिलताएँ ऐसी होती हैं जो जन्म के कई वर्षों बाद सामने आती हैं । इनमें सेरीब्रल पाल्सी, मानसिक विकास में कमी, व्यावहारिक एवं भावनात्मक योग्यता में कमी, दृष्टि एवं श्रवण की जटिलताएँ इत्यादि मुख्य हैं ।

About Author:

Post Graduate from Delhi University, certified Dietitian & Nutritionists. She also hold a diploma in Naturopathy.

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