क्लोमीफीन साइट्रेट दवा के उपयोग एवं दुष्प्रभाव

क्लोमीफीन साइट्रेट की बाते करें तो कुछ स्त्रियां इसलिये गर्भवती नहीं हो पाती हैं, क्योंकि उनमें मासिक चक्र में निश्चित समय पर पर्याप्त LH व FSH हॉरमोन का स्राव नहीं होता है, जिस कारण उनका डिम्बोत्सर्ग (ovulation) नहीं हो पाता है । ऐसी स्त्रियों को डॉक्टर सबसे पहले क्लोमीफीन साइट्रेट देते हैं । यह दवा हाइपोथैलेमस को अधिक GnRH हॉरमोन बनाने के लिये उत्तेजित करती है, जिससे पिट्यूटरी अधिक LH व FSH हॉरमोन बनाने के लिये उद्दीप्त होती है । इसके परिणामस्वरूप डिम्बग्रंथि (ovary) एक परिपक्व डिम्ब अथवा अण्डा बनाना प्रारंभ करती है । जब स्त्री की डिम्बग्रंथियां सामान्य रूप से कार्य कर रहीं हों व हाइपोथैलेमस व पिट्यूटरी भी अपने हॉरमोन्स पर्याप्त मात्रा में बनाने में सक्षम हों, ऐसी स्थिति में भी क्लोमीफीन साइट्रेट एक उपयोगी दवा है । संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि ऐसी स्थिति में, स्त्री का प्रजनन तंत्र तो ठीक से काम कर रहा होता है, परन्तु उसको उद्दीप्त करना आवश्यक होता है, जिसके लिये क्लोमीफीन साइट्रेट का प्रयोग किया जाता है ।

क्लोमीफीन साइट्रेट

क्लोमीफीन साइट्रेट कैसे कार्य करती है

संरचनात्मक रूप से देखें, तो एस्ट्रोजिन की भांति क्लोमीफीन मस्तिष्क में उस स्थान से जुड़ जाती है, जिस स्थान से सामान्यत: एस्ट्रोजिन संबंधित होती है, जिन्हें estrogen receptors कहते हैं । एक बार ये receptor sites क्लोमीफीन से भर जाते हैं, तो ये रक्त में प्रवाहित होने वाले प्राकृतिक एस्ट्रोजिन से नहीं जुड़ पाते हैं । इस कारण ये इसी गलतफहमी में रहते हैं कि रक्त में एस्ट्रोजिन का स्तर कम है । इसी कारण हाइपोथैलेमस अधिक GnRH हॉरमोन बनाता है, जिससे पिट्यूटरी अधिक FSH हॉरमोन बनाती है, जिसके परिणामस्वरूप डिम्बग्रंथि (ovary) एक परिपक्व follicle विकसित होता है व एस्ट्रोजिन बनाना प्रारंभ करता है । यह डिम्बोत्सर्ग (ovulation) के लिये एक परिपक्व डिम्ब अथवा अण्डा बनाना प्रारंभ करती है । क्लोमीफीन लेने वाली स्त्री में दुगुना अथवा तिगुना एस्ट्रोजिन बनता है । यदि स्त्री को अनियमित मासिक हो रहा है, तो भी क्लोमीफीन साइट्रेट उपयोगी है । विशेषकर जब कि उसके शरीर में ऐसे follicles बनते हैं, जो अपने सामान्य आकार तक नहीं पहुंच पाते हैं । एक सामान्य follicle आकार में 20 millimeters in diameter होता है, जो rupture होने से पहले एक छोटे अंगूर के आकार का होता है । क्लोमीफीन एक छोटे व अपरिपक्व follicle को परिपक्वता की स्थिति तक पहुंचाती है । स्त्री के रक्त में एस्ट्रोडियल का निम्न स्तर भी follicle के छोटे आकार से संबंध रखता है । एक स्त्री जिसकी ovulation cycle सामान्य व निर्बाध रूप से चल रही होती है, उसमें एस्ट्रोडियल का स्तर 100 to 300 picograms होता है । एक स्त्री के पास एक परिपक्व अण्डा बनाने के लिये पर्याप्त हॉरमोन हो सकते हैं, परन्तु यदि उसमें एस्ट्रोडियल का स्तर कम (100 से कम) होता है, तो उसकी सर्विक्स फर्टाइल म्यूकस बनाने के लिये उत्तेजित नहीं होती है और न ही उसकी endometrium एक फर्टिलाइज्ड अण्डे को implantation के लिये स्वीकार करने हेतु उत्तेजित होती है । क्लोमीफीन साइट्रेट हाइपोथैलेमस से पिट्यूटरी व वहां से डिम्बग्रंथि सभी सिग्नलों को उद्दीप्त करती है ।

क्लोमीफीन साइट्रेट किन किन के लिए लाभदायक होती है

कुछ स्त्रियों में डिम्बोत्सर्ग देर से होता है, लगभग छ: सप्ताह के अंतराल से अथवा उससे कुछ कम अंतराल से होता है । उन स्त्रियों के लिये भी क्लोमीफीन एक उपयुक्त दवा है, क्योंकि इससे डिम्बोत्सर्ग (ovulation) समय पर होता है, एक परिपक्व अण्डा बनता है, जिसके शुक्राणु द्वारा फर्टिलाइज होने के अवसर भी बढ़ते हैं, जिससे निश्चित रूप से गर्भधारण की संभावनाएं भी बढ़ती हैं । क्लोमीफीन एल. पी. डी. की समस्या से युक्त स्त्री के लिये भी लाभदायक होती है । उन स्त्रियों में डिम्बोत्सर्ग (ovulation) तो होता है, परन्तु बाद में डिम्बग्रंथियों (ovary) की कार्यप्रणाली विघटित हो जाती है, जिससे मासिक चक्र के luteal phase में प्रोजेस्ट्रान हॉरमोन का उत्पादन कम होता है । डिम्बोत्सर्ग (ovulation) के बाद ovary प्रोजेस्ट्रान बनाना प्रारंभ कर देती है । यह गर्भाशय की परत को फर्टिलाइज्ड अण्डे के implantation के लिये तैयार करने हेतु आवश्यक हॉरमोन है । यदि इस समय रक्त में प्रोजेस्ट्रान का स्तर गिर जाता है, तो भूण या तो implant नहीं हो पाता है या फिर यदि वह implant हो गया है, तो भी स्त्री का मासिक समय से पहले आ जाता है, साथ ही implantation के कुछ दिनों बाद ही गर्भ समाप्त हो जाता है व इसका पता भी स्त्री को नहीं चल पाता है । जो स्त्रियां ovulation prediction kits व basal body temperature (BBT) chart का प्रयोग करती हैं, उन्हें यह पता चल सकता है कि क्या  उनके मासिक का luteal phase 14 दिन की अवधि से छोटा है । सामान्यत: मासिक का luteal phase 13 से 15 दिन तक की अवधि तक का होता है । क्लोमीफीन साइट्रेट हाइपोथैलेमस व पिट्यूटरी को उत्तेजित करती है, जिससे वे उन हारमोन का उत्पादन करते हैं, जिनकी आवश्यकता luteal phase में ओवरी को प्रोजेस्ट्रान बनाने के लिये होती है । उन स्त्रियों में, जिनमें डिम्बोत्सर्ग (ovulation) होता नहीं है अथवा अनियमित होता है, उनके लिये भी क्लोमीफीन एक उपयोगी दवा है । उन स्त्रियों में क्लोमीफीन से लगभग 80 प्रतिशत को डिम्बोत्सर्ग होने लगता है । 50 प्रतिशत गर्भवती हो जाती हैं व लगभग 3 प्रतिशत को एक से अधिक बच्चे- जुडवां होते हैं । यदि स्त्री का शरीर क्लोमीफीन को respond करता है और परिपक्व follicle भी बनाता है, परन्तु उसमें मासिक के 15 वें दिन LH surge नहीं होती है, तो ऐसी स्थिति में human chorionic gonadotropin (HCG)का इन्जेक्शन दिया जाता है, यह LH का कार्य करता है व अण्डे को परिपक्व करके follicle rupture करता है। स्त्री का डिम्बोत्सर्ग (ovulation) प्राय: LH अथवा (HCG) के इन्जेक्शन के 36 घंटे बाद होता है, जिसे बाद में अल्ट्रासाउण्ड द्वारा देखा जा सकता है ।

क्या क्लोमीफीन साइट्रेट महंगी दवाई है?

क्लोमीफीन साइट्रेट महंगी दवा नहीं है । इसे महीने में 5 दिन लिया जाता है । क्लोमीफीन उपचार के लिये 50 mg. की टेबलेट पांच दिन तक ली जाती है । सामान्यत: यह दवा मासिक के तीसरे अथवा पांचवें दिन से ली जाती है । यदि इस दवा से स्त्री का डिम्बोत्सर्ग (ovulation) हो जाता है, तो डोज बढ़ाने की आवश्यकता नहीं होती है, परन्तु यदि पांच दिन तक प्रतिदिन एक टेबलेट से स्त्री का डिम्बोत्सर्ग (ovulation) नहीं होता है, तो डॉक्टर इसकी मात्रा बढ़ा देते हैं व एक के स्थान पर दो टेबलेट अर्थात् 100 mg. की डोज दी जाती हैं । यदि तब भी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है, तो डॉक्टर प्रतिदिन 150 mg. की टेबलेट देते हैं तथा साथ में अन्य दवा भी देते हैं । कुछ डॉक्टर इस डोज को 250 mg. तक बढ़ाते हैं, पर हाई डोज देना उचित नहीं है । यदि क्लोमीफीन की डोज बहुत अधिक होती है, तो गर्भाशय की परत एस्ट्रोजिन व प्रोजेस्ट्रान के प्रति प्रतिक्रिया करना बंद कर देती है व ठीक से विकसित नहीं हो पाती है, जिससे भूण गर्भाशय में implant नहीं हो पाता है ।

 क्लोमीफीन साइट्रेट के साइड इफ़ेक्ट :

क्लोमीफीन साइट्रेट के निम्नलिखित साइड इफेक्ट हैं |

  • चूंकि यह estrogen receptors, जिनमें सर्विक्स के receptors भी शामिल होते हैं, उनसे जुड़ जाती है, जिससे यह cervical mucus glands की fertile cervical mucus बनाने की क्षमता को प्रभावित करने लगती है । इससे डिम्बोत्सर्ग (ovulation) के समय होस्टाइल व शुष्क cervical mucus बनने लगता है । यदि ऐसा होता है, तो मासिक के दसवें दिन से LH surge तक कुछ मात्रा एस्ट्रोजिन की लेने से म्यूकस की मात्रा बढ़ जाती है ।
  • कुछ स्त्रियों को premenstrual-type symptoms जैसे migraines, breast discomfort आदि अनुभव होते हैं । कुछ बाहर दिखाई देने वाले लक्षण होते हैं, जैसे- spots, flashes अथवा blurry vision | ऐसी स्थिति में उपचार रोक देना चाहिये ।
  • वैसे तो क्लोमीफीन साइट्रेट एक सुरक्षित दवा है, परन्तु कुछ स्थितियों में इससे परहेज होता है । जैसे पहले से बढ़े हुए लीवर में इससे परहेज होता है । बढ़ी हुई ओवरी में भी इससे परहेज होता है, क्योंकि कभी-कभी यह ओवरी में hyperstimulation उत्पन्न करती है ।
  • कुछ स्त्रियों को hot flashes होते हैं । ये hot flashes वैसे ही होते हैं, जैसे रजोनिवृत्ति के समय रक्त में एस्ट्रोजिन का स्तर कम होने से होते हैं । ऐसा इसलिये होता है कि क्लोमीफीन साइट्रेट मस्तिष्क के लिये यह गलतफहमी पैदा कर देती है कि रक्त में एस्ट्रोजिन की मात्रा कम है ।

क्लोमीफीन साइट्रेट का दुष्प्रभाव :

डॉक्टर unexplained infertility से युक्त स्त्री को फर्टिलिटी वर्कशाप प्रारंभ करने से पूर्व क्लोमीफीन साइट्रेट देते हैं । इससे कभी कभी नई समस्यायें प्रारंभ हो जाती हैं । जैसे- म्यूकस होस्टाइल हो जाता है । आगे के अन्य निदान व उपचार भी देर से हो पाते हैं । जब स्त्री में डिम्बोत्सर्ग (ovulation) हो रहा होता है और मात्र पिट्यूटरी को उद्दीप्त करने के लिये ही क्लोमीफीन दी जाती है, तो ऐसी स्थिति में क्लोमीफीन से कुछ खास लाभ नहीं होता है । यदि कई मासिक चक्र में क्लोमीफीन उपचार के बाद भी स्त्री गर्भवती नहीं होती है, तो डॉक्टर को इनफर्टिलिटी के अन्य कारणों का निदान करना चाहिये ।

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