गर्भावस्था में होने वाली सामान्य परेशानियाँ एवं इनसे बचने के उपाय

गर्भावस्था में नीचे वर्णित परेशानियां होना सामान्य बात है । ये लक्षण आवश्यक नहीं है कि सभी स्त्रियों में समान हों । कुछ स्त्रियों में सभी लक्षण, कुछ में सीमित लक्षण पाये जाते हैं वे कुछ स्त्रियों में कोई भी लक्षण नहीं पाये जाते हैं । अतः इस संदर्भ में सभी स्त्रियों के अनुभव परस्पर पृथक होते हैं ।

गर्भावस्था में सामान्य परेशानियाँ

पूरा आर्टिकल (लेख) एक नज़र में.

गर्भावस्था में पीठ दर्द (Backaches) :

गर्भावस्था में होने वाली यह एक सामान्य शिकायत है । आपका बढ़ता हुआ गर्भाशय आपकी पीठ की मांसपेशियों पर दबाव डालता है व आपके बैठने की स्थिति को भी प्रभावित करता है ।

गर्भावस्था में पीठ दर्द से बचने के उपाय:

इस पीठ दर्द से बचने अथवा इसे कम करने के लिये निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए |

  • ऊंची एड़ी की चप्पल आदि न पहनें ।
  • भारी सामान न उठायें ।
  • यदि नीचे से कोई सामान उठाना हो तो कमर से न झुके, घुटने मोड़ कर बैठे व कमर को सीधा रखें । बहुत देर तक खड़ी न रहें व खड़े रहते समय एक पैर को स्टूल आदि पर रखें ।
  • बैठते समय पीठ को सहारा देकर बैठे । कमर से नीचे के हिस्से में एक छोटा तकिया लगा लें । अपने घर अथवा कार्यक्षेत्र को इस प्रकार व्यवस्थित कर लें कि न तो आपको झुकना पड़े, न ही शरीर को खिंचाव देना पड़े ।
  • सीधे गद्दे पर सोयें ।
  • गर्भावस्था में पीठ दर्द से बचने के लिए अपनी बायीं करवट सोयें व दोनों पैरों के बीच में तकिया रख लें ।
  • दर्द होने पर गर्म या ठण्डे से सेक करें अथवा मसाज करें ।
  • केवल ऐसे व्यायाम करें जिन्हें गर्भावस्था के लिए सुरक्षित माना जाता हो | गर्भावस्था के व्यायाम के बारे में जानने के लिए यह पढ़ें |
  • आप prenatal cradle या बेल्ट भी पहन सकती हैं ।

गर्भावस्था में कब्ज (Constipation) :

लगभग 50 प्रतिशत स्त्रियों में गर्भावस्था के दौरान निम्नलिखित कारणों से कब्ज की शिकायत होती है | शरीर में हॉरमोन के कारण होने वाले परिवर्तन पाचन की क्रिया को धीमा  कर देते हैं ।

  • इस दौरान जो आइरन सप्लीमेन्ट लिये जाते हैं, उसके कारण भी कब्ज की शिकायत होती है ।
  • गर्भावस्था के अंत में गर्भाशय के फैल जाने से बड़ी आंतों व मलद्वार पर दबाव बनता है ।

गर्भावस्था में कब्ज दूर करने के उपाय:

कब्ज से आराम के लिये निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिये |

  • तरल पदार्थों का सेवन अधिक करना चाहिये ।
  • प्रतिदिन कम से कम 6 से 8 गिलास पानी पीना चाहिये व 1 से 2 गिलास फलों का रस पीना चाहिये । ऐसा भोजन करना चाहिये, जिसमें फाइबर हों ।
  • डॉक्टर की सलाह से हल्का व्यायाम करना चाहिये ।

गर्भावस्था में स्तनों में होने वाले परिवर्तन (Breasts changes)

पहला ट्राइमेस्टर (First trimester) :

गर्भावस्था के 6 से 8 सप्ताह के बीच आपके स्तनों का आकार बढ़ने लगता है । गर्भावस्था के दौरान स्तनों का विकास होता है, क्योंकि शरीर बच्चे को पोषण देने के लिये तैयार होता है । स्तनों में वसा की परत व दुग्ध ग्रंथियां बढ़ जाती हैं । इस समय आपके स्तन वजन व आकार दोनों में बढ़ते हैं । गर्भावस्था में शुरू के महीनों में आपके स्तन कठोर व संवेदनशील होते हैं । स्तनों में खून का प्रवाह बढ़ जाता है व नसें स्पष्ट दिखाई देने लगती हैं । आपको अपने स्तन स्पर्श से ही संवेदनशील प्रतीत होते हैं। इस अवस्था में ऐसी ‘ब्रा पहनें, जो आपको फिट हो व आराम दे । इस समय आपके स्तन के nipples and areolas (निप्पल के चारों ओर के काला हिस्सा) अधिक गाढ़े रंग के हो जाते हैं । nipples बाहर की ओर अधिक निकल आते हैं व areolas अधिक फैल जाता है । areolas 5 सतह पर छोटे-छोटे उभार दिखाई देने लगते हैं, जो वास्तव में ग्रंथियां हैं, जिन्हें Montgomery tubercles कहते हैं । ये एक प्रकार का तैलीय पदार्थ बनाती हैं, जो बाद में आपके nipples को शुष्क होने से व उनमें दरार पड़ने से बचाते हैं ।

दूसरा ट्राइमेस्टर (Second trimester) :

12 से 14 सप्ताह बाद आपके स्तनों में कोलस्ट्रम (colustrum) बनना प्रारंभ कर देता है । यह सभी स्त्रियों में समान नहीं होता है । अतः यदि इस अवस्था में अथवा प्रसव तक आपके कोलस्ट्रम बनना प्रारंभ न हुआ हो, तो आप चिन्तित न हों । गर्भावस्था के प्रारंभ में यह कोलस्ट्रम गाढ़ा व पीला होता है । स्तन की मसाज व सेक्स आवेग के दौरान यह कोलस्ट्रम लीक कर सकता है ।

गर्भावस्था में थकान (Fatigue) :

गर्भावस्था के दौरान विशेषकर पहले व तीसरे ट्राइमेस्टर में थकान का अनुभव होना सामान्य लक्षण हैं । उचित व्यायाम, आराम, नींद व पौष्टिक भोजन आपकी थकान में कमी लाने में सहायक होता है । रक्त की कमी भी थकान पैदा करती है । अत: पहले व तीसरे ट्राइमेस्टर में आपके खून, हिमोग्लोबिन की नियमित जांच की जानी चाहिये । खून की कमी से बचने के लिये उचित मात्रा में व डॉक्टर की सलाह से Iron supplements लेना चाहिये ।

गर्भावस्था में बार-बार पेशाब आना (Frequent urination) :

गर्भावस्था में आपके बढ़ते हुए गर्भाशय से urine bladder पर दबाव पड़ता है, जिससे बार-बार पेशाब आने का अनुभव होता है । जबकि आपका ब्लैडर खाली होता है, तब भी आपको पेशाब का अनुभव होता है । क्योंकि गर्भाशय से पड़ने वाला दबाव ऐसा अनुभव कराता है, जैसे आपका ब्लैडर फुल हो । जब आपका गर्भाशय पूर्ण विकसित हो जाता है व पेट बाहर की ओर दिखने लगता है, तब यह लक्षण कम हो जाता है । गर्भावस्था के अंत में जब बच्चा घूमना प्रारंभ का देता है व प्रसव के लिये गर्भाशय के नीचे की ओर सरक जाता है, तब यह पुन: urine bladder पर अपना दबाव डालता है, जिससे बार-बार पेशाब आने का लक्षण वापस उत्पन्न हो जाता है । गर्भावस्था के अंतिम दिनों में आपको रात को भी बार-बार पेशाब के लिये उठना पड़ता है । यदि आपके bladder पर दबाव के कारण urine leak करती है तो आपको अपनी मांसपेशियों को मजबूत करने के लिये kegal exercises करनी चाहिये । यदि आपको पेशाब मे दर्द महसूस हो अथवा पेशाब करने के बाद भी पेशाब जैसा अनुभव हो तो अपने डॉक्टर से संपर्क करें, क्योंकि आपको infection हो सकता है ।

गर्भावस्था में भावात्मक स्थिति (Emotions during pregnancy) :

प्रत्येक गर्भावस्था अपने में एक अलग अनुभव है, परन्तु सभी गर्भावस्थाओं में कुछ लक्षण सामान्य होते हैं । यदि स्त्री गर्भावस्था में होने वाले शारीरिक व मानसिक परिवर्तनों को समझ ले, तो वह गर्भावस्था को समझ सकेगी व उसे सकारात्मक रूप में ले सकेगी ।

पहला ट्राइमेस्टर (First trimester) :

इस दौरान केवल गर्भवती होने का पता ही चलता है । मासिक न होना व Pregnancy test positive होना ही गर्भावस्था को दर्शाते हैं । कुछ शारीरिक परिवर्तन जैसे- थकान, उल्टी, जी मिचलाना व स्तनों में परिवर्तन आदि दिखाई देने लगते हैं । भावनात्मक स्थिति अस्थिर रहती है व depression असामान्य बात नहीं है । हारमोन परिवर्तन के कारण मूड भी बदलता रहता है । गर्भावस्था के दौरान Estrogen व Progestrone दो हारमोन्स की प्रमुख भूमिका होती है । स्त्री बहुत भावात्मक हो जाती है । मूड में बहुत जल्दी परिवर्तन होता है । कभी अधिक प्रसन्न तो कभी निराश व दु:खी हो जाती है । छोटी-छोटी बात पर रोने लगती है, परन्तु यदि रोने का कारण पूछा जाये तो बताने में समर्थ नहीं होती है । ऐसी स्थिति में पति के लिये बहुत कठिनाई होती है, क्योंकि वह स्वयं बहुत परेशान हो जाता है । वह पत्नी के रोने का कारण नहीं समझ पाता है और धीरे-धीरे उन्हें अनदेखा करने लगता है । चूंकि गर्भावस्था में पत्नी को अधिक प्रेम व अपनत्व की आवश्यकता होती है, अत: वह पति के व्यवहार को रूखा पाकर परेशान हो जाती है । यदि पति व पत्नी दोनों ही यह समझ लें कि गर्भावस्था में ये भावात्मक परिवर्तन सहज व सामान्य हैं, तो उन्हें भावात्मक तौर पर कठिनाई नहीं होगी अन्यथा यह स्थिति पूरी गर्भावस्था के दौरान तनाव का कारण बनी रहेगी । यद्यपि गर्भावस्था नियोजित होती है, तो भी प्रारंभ में एक आश्चर्य की भावना होती ही है कि क्या वाकई में स्त्री गर्भवती है? स्त्री में अनिश्चितता की भावना रहती है । नए खर्च के बढ़ने की चिन्ता रहती है, मां बनने की कल्पना से खुशी होती है व गर्भावस्था में प्रसव आदि का डर भी लगता है । यह गर्भावस्था तब तक वास्तविक नहीं लगती है, जब तक बच्चे की धड़कन महसूस नहीं होने लगती है ।

दूसरा ट्राइमेस्टर (Second trimester) :

गर्भावस्था में यह ट्राइमेस्टर अपेक्षाकृत शांत होता है । morning sickness समाप्त हो जाती है । गर्भपात का डर भी कम हो जाता है । बच्चे की हरकतों का आभास होने लगता है, जो प्रायः गर्भावस्था के 20वें सप्ताह से प्रारंभ होती हैं । इस अवस्था में एक खास परिवर्तन यह होता है कि स्त्री अपने बच्चे को महसूस करने लगती है व उत्साहित रहती है । इस अवस्था में स्त्री स्फूर्ति व शक्ति का अनुभव करती है । इसे glow of pregnancy कहते हैं । वह गर्भावस्था के विषय में सबसे पूछती है व जानना चाहती है ।

तीसरा ट्राइमेस्टर (Third trimester) :

गर्भावस्था में इस ट्राइमेस्टर में स्त्री गर्व का अनुभव करती है व भविष्य के प्रति चिन्तित रहती है । उसका बढ़ा हुआ पेट गर्भावस्था को दर्शाता है, अतः सभी लोग उसका ध्यान रखते हैं व उसकी मदद करते हैं । भीड़ वाली जगह में भी उन्हें सीट मिल जाती है व सामान आदि उठाने में भी लोग उनकी मदद करते हैं । कुछ स्त्रियां अपनी इस स्थिति में गर्व का अनुभव करती हैं । लोगों द्वारा दी गयी मदद को सहर्ष स्वीकार कर लेती हैं, परन्तु कुछ स्त्रियां ऐसा करने में अपने को असहाय मानती हैं व स्वयं को असहाय न दर्शाते हुए, लोगों की सहायता को अस्वीकार कर देती हैं । गर्भावस्था के अन्तिम सप्ताहों में स्त्री का भय व चिन्ता बढ़ जाती है । साथ ही शारीरिक असुविधा भी बढ़ जाती है । वह ढंग से सो नहीं पाती हैं । समय-समय पर उठने वाला दर्द व गर्भाशय में बच्चे की बदलती स्थिति, उसके लिये असुविधा पैदा करती है । गर्भावस्था में स्त्री को ऐसा लगता है कि वह पति को अनाकर्षक व अप्रिय हो गयी है । अब स्त्री गर्भावस्था की परेशानियों के पूरा होने के प्रति व्यग्र व उत्सुक दिखाई देती है । साथ ही मातृत्व के प्रति भी उत्सुक रहती है ।

गर्भावस्था में मॉर्निंग सिकनेस (Morning Sickness) :

गर्भावस्था में Morning sickness वास्तव में मितली या उल्टी जैसा अनुभव है, जो प्राय: पहले ट्राइमेस्टर में ही महसूस होता है । यह दिन में किसी भी समय हो सकता है । यह आवश्यक नहीं कि नाम के अनुसार यह सुबह ही हो । लगभग पचास प्रतिशत स्त्रियों में गर्भावस्था में पहले ट्राइमेस्टर में morning sickness पायी जाती है । दूसरे ट्राइमेस्टर में जब हारमोन का स्तर नीचे गिरता है, तब यह morning sickness दूर हो जाती है । जब यह morning sickness तीव्र होती है, तो इसे hyperemesis gravidarum कहते हैं । यह बात पूर्णत: ज्ञात नहीं है कि कुछ स्त्रियों में morning sickness क्यों होती है । इसका एक कारण तो यह है कि इस दौरान स्त्री के शरीर में हारमोन का स्तर काफी बढ़ जाता है, जिससे यह morning sickness होती है व बाद में होने वाली गर्भावस्थाओं में भी यह लक्षण बना रहता है । Morning sickness के निम्न लक्षण हैं  |

  • कुछ भी खाने व पीने के बाद उल्टी आना ।
  • वजन का बढ़ना रुक जाना ।
  • शरीर में पानी की कमी ।
  • गाढ़े व पीले रंग का पेशाब आना ।

इसका निदान करने के लिये डॉक्टर आपके लक्षण देखते हैं । खून व पेशाब की जांच भी कर सकते हैं । इसके उपचार के लिये डॉक्टर खाने में परिवर्तन करते हैं । यदि morning sickness अधिक है, तो शरीर में पानी की कमी के लिये आपको अस्पताल में भी भर्ती होना पड़ सकता है ।

गर्भावस्था में मॉर्निंग सिकनेस दूर करने के उपाय:

हल्की morning sickness के लिये निम्नलिखित बातों का ध्यान दें

  • ऐसा भोजन करे, जिसमें प्रोटीन ज्यादा हो ।
  • ऐसा भोजन करें, जिसमें कार्बोहाइड्रेट अधिक हो व वसा कम हो ।
  • भारी भोजन की अपेक्षा हल्के आहार लें ।
  • ऐसी चीजें खायें, जो आपको पसंद हों ।
  • बिस्तर से उठने के पहले कुछ खा लें, क्योंकि चलने-फिरने से morning sickness बढ़ जाती है ।
  • नमकीन तरल पदार्थ पियें ।
  • उल्टी आदि से बचने के लिये दवाई ले सकती हैं ।
  • तीव्र morning sickness के लिये अस्पताल में भर्ती होना आवश्यक होता है ।
  • खून व पेशाब की जांच होती है । शरीर में संतुलन के लिये Intravenous treatment आवश्यक होता है । गर्भ का अल्ट्रासाउण्ड आवश्यक होता है ।

गर्भावस्था में मितली अथवा उल्टी आना (Nausea & Vomiting) :

गर्भावस्था में पहले ट्राइमेस्टर का यह सामान्य लक्षण है, जो शरीर में हारमोन परिवर्तन के कारण होता है । यह लक्षण दिन में किसी भी समय दिख सकते हैं, विशेषकर जब पेट खाली हो । यह लक्षण गर्भावस्था के 12 सप्ताह तक रहता है । यदि उल्टी होना तीव्र रूप धारण करे, तो अपने डॉक्टर से संपर्क करें । कोई भी दवा लेने से पूर्व अपने डॉक्टर की सलाह अवश्य ले लें ।

गर्भावस्था में मितली व उल्टी से बचने के उपाय

  • बिस्तर से सुबह धीरे-धीरे उठे और बिस्तर पर कुछ देर बैठे ।
  • बिस्तर छोड़ने से पहले कुछ खा लें ।
  • दिन में 5-6 छोटे आहार लें । पेट को खाली ना रखें ।
  • ऐसी गंध जो, आपको अच्छी न लगे, उससे दूर रहें ।
  • खाने के साथ दूध, चाय, कॉफी आदि न लें ।
  • खाने के साथ अदरक खायें ।
  • अदरक या पिपरमेंट की चाय पियें ।

गर्भावस्था में पेट के निचले हिस्से का दर्द (Lower abdominal pain or groin)

जब गर्भाशय विकसित होने लगता है, तो गर्भाशय के दोनों ओर के round ligaments (फाइबर टिशू, जो गर्भाशय को सपोर्ट देते हैं) खिंचना प्रारंभ कर देते हैं । इस खिंचाव से आप अपने पेट में दर्द का अनुभव कर सकती हैं ।गर्भावस्था में  18 से 24 सप्ताह के बीच ऐसा दर्द होना बहुत सामान्य बात है । इस दर्द को दूर करने अथवा उससे बचने के लिये निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें |

  • कमर को एकदम से न मोड़ें ।
  • जिस ओर दर्द महसूस करें, उस ओर थोड़ा मुड़ जायें ।
  • आराम करने से व अपनी स्थिति को बदलते रहने से इस दर्द को कम किया जा सकता है । यदि आपको अधिक दर्द है, तो तुरन्त अपने डॉक्टर से संपर्क करें ।

गर्भावस्था में सिरदर्द (Headaches):

गर्भावस्था में सिरदर्द भी एक सामान्य लक्षण है । और यह किसी गंभीरता का संकेत नहीं है । इसकी आवृत्ति व तीव्रता सभी में अलग-अलग हो सकती है । आप अपने डॉक्टर से यह सलाह ले लें कि आप अपने सिरदर्द में आराम के लिये कौन सी दवा सुरक्षित रूप से ले सकती हैं? पहले ट्राइमेस्टर के बाद आप आवश्यकता पड़ने पर Tylenol ले सकती हैं । कोई भी अन्य दवा लेने से पहले अपने डॉक्टर से अवश्य पूछ लें । यदि आपका सिरदर्द  ठीक नहीं हो रहा है । बार-बार हो रहा है ।  बहुत तेज है । सिरदर्द के साथ आंखों के आगे धुंधला अथवा धब्बे जैसा दिखता है ।  सिरदर्द के साथ उल्टी भी आती है ।

गर्भावस्था में अनिद्रा (Insomnia) :

गर्भावस्था में पेट का आकार बढ़ने से सोने में तकलीफ होती है । ऐसी स्थिति में आराम के लिये आपको निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिये |

  • तनाव रहित रहें व श्वसन क्रिया करें ।
  • नींद लेते रहें ।
  • अपनी बायीं करवट लेटें ।
  • एक तकिया पेट को सहारा देने के लिये व दूसरा दोनों पैरों के बीच में लगायें ।
  • लंबी तकिया साथ लेकर सोयें ।
  • आराम कुर्सी पर लेटें ।
  • सोने से पूर्व गर्म पानी से स्नान कर सकती हैं ।

गर्भावस्था में अपच (Indigestion) :

अपच को heartburn भी कहते हैं । जबकि इसका heart से कोई संबंध नहीं होता है । इसमें जलन का अनुभव होता है, जो पेट से शुरू होकर गर्दन की ओर उठती हुई प्रतीत होती है । ऐसा तब होता है, जब आपका पचा हुआ भोजन जिसमें एसिड होता है, भोजन नली में ऊपर की ओर आता है । गर्भावस्था में होने वाले हारमोन परिवर्तन पाचन क्रिया को धीमा कर देते हैं । साथ ही बढ़ा हुआ गर्भाशय भी आमाशय पर दबाव डालकर यह लक्षण पैदा करता है । अपच से बचने के लिये निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें दिन में दो तीन बड़े आहार के स्थान पर 6 से 7 छोटे आहार लें ।

  • एक गिलास तरल पदार्थ एक आहार के बराबर है, अत: भोजन के साथ बहुत अधिक तरल पदार्थ न लें । ऐसा भोजन जो गैस उत्पन्न करे, उनसे परहेज करें ।
  • तेल-मसाले वाले भोजन से भी परहेज करें ।
  • धूम्रपान, कोकेन, चॉकलेट व अल्कोहल आदि से परहेज करें ।
  • व्यायाम से कुछ देर पहले कुछ न खायें ।

गर्भावस्था में बवासीर (Hemorrhoids) :

यह परेशानी उन स्त्रियों को होती है, जिन्हें कब्ज रहता है । इसमें गुदा (Rectum) के पास की नसें सूज जाती हैं, जिससे दर्द होता है । बच्चे के जन्म के बाद यह ठीक होने लगता है । इससे बचने के लिये निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें  |

  • कब्ज होने से रोकें ।
  • फाइबर डाइट खायें ।
  • तरल पदार्थ अधिक पियें ।
  • किसी क्रीम का प्रयोग करें ।

गर्भावस्था में पैरों की ऐंठन (Leg cramps) :

गर्भावस्था के आखिरी तीन महीनों में आपके पैरों में ऐंठन हो सकती है । यह अधिकतर सोते समय होती है । गर्भावस्था में पैरों की ऐंठन से बचने के लिये निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिये |

  • सोने से पूर्व अपने पैरों में थोड़ा खिंचाव लायें ।
  • सोने से पूर्व पैरों की मांसपेशियों की सेंक करें ।
  • सोने से पूर्व अपने पैरों की मांसपेशियों की मालिश करें ।
  • पानी अधिक पियें व अल्कोहल का सेवन न करें ।
  • दिन में तीन-चार बार कैल्शियम से पूर्ण भोजन करें ।

 गर्भावस्था में सुन्न होना या झुनझुनी चढ़ना (Numbness & Tingling) :

जैसे-जैसे गर्भाशय का विकास होता है, यह आपकी कुछ ऐसी नसों को प्रभावित करता है, जो पैर की ओर जाती हैं । आपके पैरों में सूजन आने से भी पैर की कुछ नसों पर दबाव पड़ता है । नसों पर दबाव पड़ने से पैर सुन्न होने व पैरों में झुनझुनी होने जैसे लक्षण उत्पन्न होते हैं । यह कोई गंभीर बात नहीं है । बच्चे के जन्म के बाद यह लक्षण स्वत: ही ठीक हो जाता है । यह लक्षण बांहों में, हाथों में व हाथ की उंगलियों में भी दिखाई दे सकता है । गर्भावस्था में सुन्नपन व झनझनाहट को कम करने के लिये निम्नलिखित बातों का ध्यान रख सकते हैं |

  •  लेटी हुई अथवा बैठी हुई स्थिति से धीरे-धीरे उठे ।
  • डॉक्टर से व्यायाम व लेटने-बैठने की स्थिति के बारे में पूछे, जो आपको आराम दे सकें ।

गर्भावस्था में सांस की तकलीफ (Shortness of breath) :

गर्भ में बच्चे का विकास होने से गर्भाशय पेट में फैलता है व अधिक स्थान लेता है, जिसका प्रभाव शरीर के अन्य अंगों पर पड़ता है । गर्भावस्था के 31 से 34वें सप्ताह तक गर्भाशय इतना बढ़ जाता है कि यह पाचन तंत्र व फेफड़ों पर दबाव डालता है, जिससे सांस लेते समय फेफड़े पूरे नहीं फैल पाते हैं और आपको सांस लेने में तकलीफ होती है । लेकिन इस परेशानी के बावजूद आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये, क्योंकि आपके बच्चे को पूरी ऑक्सीजन मिलती रहती है । आपको सांस लेने में कठिनाई होती है, लेकिन बच्चा अपनी पूरी ऑक्सीजन ग्रहण करता रहता है । यदि आपको गर्भावस्था से पूर्व अस्थमा की समस्या है, तो गर्भावस्था के दौरान यह समस्या काफी बढ़ सकती है । गर्भावस्था के 36 से 38वें माह में, बच्चा प्रसव के लिये पेट के नीचे की ओर आ जाता है । इस अवस्था में फेफड़ों पर पड़ने वाला दबाव कम हो जाता है । और आप आसानी से सांस ले सकती हैं । गर्भावस्था में सांस की तकलीफ से बचने अथवा उसे कम करने के लिये निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं |

  • थोडा धीरे-धीरे चलें, जिससे आपके हृदय व फेफड़ों पर जोर न पड़े ।
  • सीधे बैठे, जिससे सांस लेते समय आपके फेफड़ों को फैलने के लिये पर्याप्त जगह मिल जाये ।
  • सोते समय शरीर के ऊपरी भाग को तकिये पर रखें अथवा आराम कुर्सी पर विश्राम करें ।

गर्भावस्था में त्वचा व बालों में होने वाले परिवर्तन (Skin & Hair changes) :

गर्भावस्था में होने वाले हारमोन परिवर्तन के कारण त्वचा में कुछ अस्थाई परेशानियां हो सकती हैं । कुछ स्त्रियों के आंखों के चारों ओर, नाक पर या गाल पर भूरे-भूरे धब्बे हो सकते हैं । इन्हें chloasma कहते हैं । ये धूप में बढ़ते हैं । अत: धूप से बचें । धूप में कैप अथवा सनस्क्रीन का प्रयोग करें । बच्चे के जन्म के बाद यह धब्बे स्वतः दूर हो जाते हैं । स्त्रियों में नाभि के नीचे एक धारी भी बन जाती है, जिसे linea nigra कहते हैं । यह नीचे की ओर जाती है । यह धारी प्रसव के बाद हल्की पड़ जाती है । कई स्त्रियों में पेट व स्तनों पर लाल चकत्ते व धब्बे से पड़ जाते हैं । चूंकि गर्भाशय बढ़ने से त्वचा फैलती है, इसलिये खिंचाव के कारण ऐसे निशान पड़ जाते हैं । इन्हें रोकना संभव नहीं है । प्रसव के बाद ये स्वतः ही कम हो जाते हैं । गर्भावस्था के प्रारंभ में मुंहासे भी हो सकते हैं । विशेषकर जब गर्भावस्था से पूर्व मुंहासों की प्रवृत्ति रही हो । इन्हें रोकने के लिये मुंह को दिन में कई बार हल्के क्लीन्जर से धोना चाहिये । गर्भावस्था में मुंहासों के लिये दी जाने वाली कोई एन्टीबाइटिक न लें । कई स्त्रियां अनुभव करती हैं कि गर्भावस्था के दौरान उनके बाल घने होते हैं व कुछ के इसके विपरीत कम होते दिखते हैं । प्रसव के बाद कुछ सप्ताह आपके बाल काफी मात्रा में झड़ेंगे, पर यह धीरे-धीरे पुन: ठीक हो जाते हैं ।

गर्भावस्था में नाक से खून आना (Nose bleeds) :

गर्भावस्था में नाक की झिल्ली में सूजन हो सकती है । यह सूख जाती है, जिससे आसानी से खून निकल आता है । इससे बचने के लिये निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं |

  • अधिक तरल पदार्थ पियें ।
  • नाक के नथुनों के किनारे पर पेट्रोलियम जैली आदि लगायें ।
  • अपने शयनकक्ष में Humidifier लगायें ।

गर्भावस्था में मुंह का स्वास्थ्य (Oral health) :

गर्भावस्था के प्रारंभ में आपको दांतों की जांच भी करानी चाहिये । दांतों के डॉक्टर को बता दें कि आप गर्भवती हैं, जिससे यदि आपको एक्सरे की आवश्यकता हो, तो वे सावधानी बरतें । गर्भावस्था के दौरान अपने दांतों को नियमित रूप से ब्रश करें । गर्भावस्था के दौरान आपको अधिक लार आती है । हारमोन्स में होने वाले परिवर्तन के कारण मसूड़ों से खून भी निकल सकता है ।

गर्भावस्था में योनि स्राव (Vaginal discharge) :

गर्भावस्था में योनि के आसपास की त्वचा व मांसपेशियों में रक्त का प्रवाह बढ़ जाता है, जिससे योनि स्राव भी बढ़ जाता है । योनि स्राव को leucorrhea कहते हैं । यदि गर्भावस्था में आपको योनिक्षेत्र में दर्द, जलन व खुजली आदि का अनुभव हो, तो अपने डॉक्टर को बतायें । आपको इन्फेक्शन हो सकता है। यदि इस स्राव में खून अथवा पानी जैसा दिखे, तो तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करें ।

गर्भावस्था में सूजन (Swelling & Varicose veins) :

गर्भावस्था के आखिरी महीनों में सूजन एक सामान्य लक्षण है । यह मुख्यत: पैरों व घुटनों में रहती है । गर्मी के महीनों में यह तीव्र हो जाती है । बैठते व लेटते समय पैरों को फैला कर रखें । यदि आप सोते समय पैरों को फैला लें, तो सुबह तक यह सूजन ठीक हो जाती है । यदि आपके सूजन ज्यादा है, तो अपने डॉक्टर से संपर्क करें । यह किसी अन्य बीमारी का लक्षण हो सकता है । बिना डॉक्टर की सलाह के कोई दवा न लें ।

गर्भावस्था में सूजन से बचने के लिये निम्न उपाय कर सकती हैं

  • देर तक न तो खड़े रहें, न ही बैठे ।
  • जहां तक संभव हो पैर फैलाकर रखें ।
  • बिस्तर पर अपने बायीं तरफ लेटें ।
  • लेटते समय पैर को छोटे स्टूल अथवा तकियों पर रखें ।
  • गर्भावस्था में तंग इलास्टिक के मोजे आदि न पहनें ।
  • उचित व्यायाम नियमित रूप से करें ।
  • बैठते समय क्रास लेग (cross leg) न करें ।

About Author:

HBG Health desk is a team of Experienced professionals holding various skills. They are expert to do research online and offline on health, beauty, wellness, and other components of health in Hindi.

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *