गर्भधारण होने की प्रक्रिया Conceiving Process in Hindi.

गर्भावस्था  या गर्भधारण के लिये निम्नलिखित चार अवस्थाओं का होना आवश्यक होता है |

  • शुक्राणुओं का निषेचन के स्थान पर एकत्र होना (Sperm Transportation) ।
  • अण्डे का पैदा होना (Ovulation) ।
  • शुक्राणु व अण्डे का मिलना (Fertilization) ।
  • भ्रूण का implant होना (Implantation) ।

आइये गर्भधारण सम्बन्धी इन चार अवस्थाओं के बारे में थोड़ा विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं |

  1. शुक्राणुओं का निषेचन के स्थान पर एकत्र होना (Sperm transportation) :

गर्भधारण प्रक्रिया में शुक्राणुओं का ट्रान्सपोर्टेशन कई बातों का निर्भर करता है । सर्वप्रथम तो शुक्राणु में यह क्षमता होनी चाहिये कि स्त्री के शरीर में योनि व सर्विक्स के वातावरण में स्वयं को ऊपर की ओर धकेल सकें । हारमोन परिवर्तन के कारण मासिक चक्र के इस समय में यह वातावरण शुक्राणु को नष्ट किये बिना व उसे स्वीकार करने वाला होना चाहिये । साथ ही शुक्राणु में यह क्षमता भी होनी चाहिये कि वह अण्डे की cell membrane के भीतर प्रवेश कर सके । क्योंकि यह फर्टिलाइजेशन के लिये यह आवश्यक है । स्खलन (ejaculation) के पश्चात् वीर्य एक जैल जैसा बनाता है, जो शुक्राणु को योनि में सुरक्षा प्रदान करता है । लगभग 20 से 30 मिनट में यह जैल प्रोस्टेट ग्रंथि के एन्जाइम्स के कारण पतला हो जाता है । शुक्राणु के ऊपर की ओर बढ़ने के लिये इसका पतला होना आवश्यक होता है । seminal plasma योनि में रह जाता है व गर्भाशय के मुख पर एकत्र सर्विकल म्यूकस में से होते हुए व सुरक्षित शुक्राणु गर्भाशय में ऊपर की ओर बढ़ते हैं । ovulation के समय यह म्यूकस पतला हो जाता है, इसकी एसिडिटी परिवर्तित हो जाती है व शुक्राणु के लिये एक सहायक वातावरण तैयार हो जाता है । एक बार शुक्राणु गर्भाशय में प्रवेश कर लेता है, तो फिर गर्भाशय के संकुचन शुक्राणु को गर्भधारण करने के लिए ऊपर डिम्बवाहिनी नलिकाओं (fallopian tubes) की ओर धकेलते हैं । स्खलन के बाद पहला शुक्राणु इन डिम्बवाहिनियों में कुछ मिनटों पश्चात् प्रवेश करता है ।

  1. डिम्बोत्सर्ग होना (Egg transportation) :

गर्भधारण प्रक्रिया में अण्डे का ट्रान्सपोर्ट डिम्बोत्सर्ग के साथ प्रारंभ होता है व जब अण्डा गर्भाशय में पहुंचता है, उसके साथ ही समाप्त हो जाता है । डिम्बोत्सर्ग के पश्चात् डिम्बवाहिनियों के उंगलियों जैसे छोर (finger-like end) के अण्डे को डिम्बवाहिनी नलिकाओं (fallopian tubes) में खींच लेते हैं । इनके अंदर स्थित रोम व मांसपेशीय संकुचन से यह अण्डा ट्यूब में आगे बढ़ने लगता है । जब अण्डा ट्यूब के एक विशिष्ट हिस्से में जिसे ampullar-isthmic junction कहते हैं पहुंचता है, तब वहां 30 घंटे और ठहरता है । इसके बाद तेजी से गर्भाशय की ओर बढ़ने लगता है । ट्यूब में अण्डे के ठहरने का जो अतिरिक्त समय होता है वह निषेचित अण्डे के पूर्ण विकास व गर्भाशय के निषेचित अण्डे के लिये तैयार होने के लिये आवश्यक होता है । गर्भधारण की इस प्रक्रिया में यदि इस दौरान कोई खराबी होती है, तो tubal (ectopic) pregnancy की संभावना हो जाती है ।

  1. शुक्राणु व अण्डे का मिलना (Fertilization) :

गर्भधारण के लिए शुक्राणु एवं अंडे का मिलना जरुरी होता है |  Ovulation के बाद 12 से 24 घंटे तक अण्डा फर्टिलाइजेशन के योग्य होता है । फर्टिलाइजेशन ampulla में होता है, जो डिम्बवाहिनी नलिकाओं (fallopian tubes) का सबसे चौड़ा भाग होता है । शुक्राणु व अण्डे का मिलना संयोगिक होता है । अण्डे के चारों ओर एक झिल्ली होती है, जिसे zona pellucida कहते हैं । ये फर्टिलाइजेशन में दो भूमिकाओं का निर्वाह करती है । एक तो इसमें sperm receptors होते हैं, जो species specific होते हैं और दूसरी यह कि एक बार यदि एक शुक्राणु द्वारा इसे भेदकर इसमें प्रवेश किया जाता है, तो उसके बाद अन्य शुक्राणु द्वारा इसमें प्रवेश करना संभव नहीं होता है । फर्टिलाइजेशन के बाद निषेचित अण्डे में कोशिकाओं का विभाजन प्रारंभ हो जाता है ।

  1. भ्रूण का Implantation :

गर्भधारण conceiving process

गर्भधारण प्रक्रिया में यह अंतिम अवस्था होती है एक बार जब भ्रूण blastocyst stage तक पहुंच जाता है, अर्थात् फर्टिलाइजेशन के पांच से छ: दिन बाद यह अपनी Zona pellucida से बाहर आ जाता है और implantation की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है, तब सामान्यतः 50 प्रतिशत फर्टिलाइज्ड अण्डे मासिक की तिथि से पूर्व ही समाप्त हो जाते हैं, क्योंकि blastocyst, implant हो सकता है, परन्तु विकसित नहीं होता है अथवा विकसित तो होता है, परन्तु दो सप्ताह के अंदर ही इसका विकास रुक जाता है । अतः इसका पता ही नहीं चल पाता है । implantation की प्रक्रिया के लिये मुख्यतः दो बातें महत्वपूर्ण हैं : एक तो गर्भाशय की ग्राह्यता अर्थात् गर्भाशय भूण को स्वीकार करता है अथवा नहीं और दूसरा भूण का स्वस्थ होना । अत: यह आवश्यक है कि आने वाला भूण पूर्णतया स्वस्थ है व गर्भाशय उसे स्वीकार अथवा ग्रहण करने के लिये तैयार है, तभी implantation संभव है और तभी गर्भधारण भी मुमकिन हो सकता है ।

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