किडनी की जन्मजात विसंगतियाँ (Congenital Anomalies Of Kidneys in Hindi)

किडनी की जन्मजात विसंगतियाँ उन्हें कहा जाता है जो विकृतियाँ किडनी में जन्म से पहले ही विद्यमान रहती हैं | सामान्यतया हर व्यक्ति के पेट में दो गुर्दे होते हैं जो दायीं एवं बायीं तरफ क्रमशः लिवर एवं तिल्ली (स्प्लीन) के नीचे टिके होते हैं । गर्भ के अन्दर पलते बच्चे में प्रारम्भ में गुर्दो के उत्तक पेट के निचले भाग में रहते हैं, जो बच्चे के विकसित होने के साथ धीरे-धीरे ऊपर खिसककर स्थायी स्थान ग्रहण कर लेते हैं । लेकिन कभी कभी किडनी में बच्चे के जन्म लेने से पहले ही विकृतियाँ होती हैं जिन्हें किडनी की जन्मजात विसंगतियां या विकृतियाँ कहा जाता है |

किडनी की जन्मजात विसंगतियां

अस्थानी गुर्दा (Ectopic Kidney) :

यह भी एक प्रकार की किडनी की जन्मजात विसंगतियों में शामिल है कुछ लोगों में भ्रूण के विकास क्रम में ही कुछ बाधा पड़ने से गुर्दे अपने सामान्य स्थान से अलग रह जाते हैं जिन्हें अस्थानी गुर्दा (एक्टोपिक किडनी) कहा जाता है । ऐसी स्थिति में प्रायः गुर्दो के काम पर कोई असर नहीं पड़ता, परन्तु इस  तथ्य की जानकारी रोगी के लिए बहुत लाभकारी होती है । उदाहरणार्थ, अगर व्यक्ति की दाहिनी किडनी खिसक कर नाभि के नीचे दाहिनी तरफ एपेंडिक्रू के क्षेत्र में आ जाती है, तो व्यक्ति को गुर्दे की पथरी का दर्द होने पर एपेंडिक्रू में सूजन-एपेंडिसाइटिस की गलत डायग्नोसिस हो सकती है और एपेंडिक्स  के ऑपरेशन की सलाह दे दी जा सकती है । सौभाग्यवश अब अल्ट्रासाउंड जाँच  करके इस बात का आसानी से खुलासा हो सकता है । अपने सामान्य स्थान से अलग होने पर पेट के चेक-अप के समय छूने पर गुर्दा एक गोले या गाँठ के रूप में महसूस हो सकता है और बीमारी का शक पैदा कर सकता है ।

किडनी की अन्य जन्मजात विसंगतियां:

अपने स्थान से खिसके होने के अलावा निम्न किडनी की जन्मजात विसंगतियां भी हो सकती हैं |

  1. अश्वनाल गुर्दा (Horse ShoeKidney):

किडनी की जन्मजात विसंगति में शामिल इस विकृति में गुर्दो के निचले ध्रुव आपस में जुट कर घोड़े की नाल जैसा आकार बना लेते हैं, और जुटा हुआ भाग प्रायः पेट के बीच में आ जाता है ।

  1. वक्राकार गुर्दा (Unilateral Fused Kidneys):

कभी-कभी दोनों गुर्दे पेट में एक ही, बायीं या दायीं तरफ होते हैं और आपस में जुटकर ‘S’ आकार बना देते हैं ।

  1. छोटा गुर्दा (Small Kidney):

भ्रूण की अवस्था में गुर्दे के विकास में बाधा पड़ने से कभी-कभी एक गुर्दा छोटा रह जाता है । जन्मजात रूप से छोटे गुर्दे की आंतरिक संरचना प्रायः सामान्य होती है तथा यह काम भी करता है; एवं इसकी कमी की भरपाई दूसरा गुर्दा बड़ा होकर देता है |

  1. एकल गुर्दा (Single Kidney):

किसी व्यक्ति के पेट में एक ही  किडनी का होना, दो परिस्थितियों में सम्भव है

  • जन्मजात (Congenital) : उस व्यक्ति में जन्म से ही केवल एक गुर्दा हो। इसकी सम्भावना पुरुषों में ज्यादा होती है तथा आबादी के 750 में एक व्यक्ति में ऐसी स्थिति होती है ।
  • ऑपरेशन: जब एक गुर्दा बीमारी के कारण खराब हो गया हो और निकाल दिया गया हो या एक स्वस्थ गुर्दा प्रत्यारोपण के लिए दान कर दिया गया हो ।

एक ही किडनी होने का परिणाम:

एक ही किडनी होना किडनी की जन्मजात विसंगतियों में शामिल है जिस व्यक्ति के शरीर में जन्म से या गुर्दा हटाने के ऑपरेशन के बाद एक ही गुर्दा बचा हो तथा उसे गुर्दे का कोई रोग न हो तो भी उसके जीवन में कोई बाधा नहीं होगी । पूरी उम्र सामान्य तौर पर जीने के लिए हमारे लिए केवल एक गुर्दा ही काफी है ।  प्रकृति ने हमें गुर्दो की कार्य ईकाई, नेफ्रॉन की जरूरत की दस गुना मात्रा, रिजर्व के रूप में दे रखी है जिससे गुर्दो के आंशिक रूप से नष्ट होने पर शरीर पर दुष्प्रभाव न पड़े । परन्तु ऐसे व्यक्ति जिनके केवल एक ही गुर्दा हो उनके मूत्रवाहिनी (यूरेटर) में पथरी हो जाए, तो मूत्र प्रवाह में अवरोध पैदा होने से, मरीज की स्थिति तीव्र गति से गम्भीर हो जाएगी और जान पर खतरा पैदा हो जाएगा । एक ही गुर्दा के मरीजों में गुर्दा के ऊपर चोट लगने के गम्भीर परिणाम हो सकते हैं । मारपीट, दुर्घटना, कुछ खेल (मुक्केबाजी, कराटे, हॉकी, कुश्ती आदि) में गुर्दा के क्षेत्र में चोट लग सकती है ।

एक ही किडनी होने पर बरती जानेवाली सावधानी:

  • ऐसे मरीजों को किसी भी प्रकार की बीमारी होने पर चिकित्सक से मिलते समय बता देना चाहिए की उसके शरीर में एक ही किडनी है । इस जानकारी के आधार पर चिकित्सक उस व्यक्ति को कोई भी ऐसीदवा लेने की सलाह नहीं देगा, जो गुर्दो को हानि पहुँचाती है ।
  • मूत्र सम्बन्धी या किसी भी अन्य प्रकार की व्याधि होने पर तुरन्त ईलाज कराना चाहिए ।
  • पेट में घातक चोट लगनेवाले खेलों जैसे मुक्केबाजी, कुश्ती, तलवारबाजी आदि से बचना चाहिए ।
  • यह बात ध्यान देने योग्य है कि शरीर में किडनी की जन्मजात विसंगति के रूप में एक ही गुर्दे का होना वंशानुगत नहीं है, अतः यह स्थिति या विकृति प्रभावित माता या पिता के बच्चों में एकल गुर्दा होने की सम्भावना को बेहद कम करती है |
  1. पॉलिसिस्टिक किडनी रोग:

किडनी की जन्मजात विसंगतियों या बीमारी में शामिल यह एक आनुवंशिक रोग है । इस रोग में प्रभावित व्यक्ति के गुर्दे में छोटी-बड़ी (1-2 मिलीमीटर से 4-5 सेंटीमीटर तक की) पानी के बुलबुले जैसी संरचनाएँ बन जाती हैं । इन बुलबुलों में मूत्र या रक्त मिश्रित मूत्र भरा रह सकता है । हमारे गुर्दो में लगभग दस लाख महीन नेफ्रॉन होते हैं, जो मूत्र बनाते हैं । इनमें दोष होने से सिस्ट बनते हैं, अर्थात् एक सिस्ट एक नेफ्रॉन के नष्ट होने का द्योतक है । सिस्ट स्वयं तो कार्यहीन हो कर गुर्दो की छनन क्षमता घटाते हैं, पर साथ ही अगल-बगल दबाव दे कर आस-पास के स्वस्थ नेफ्रॉन के कार्य में भी बाधा डालते हैं । इन सिस्ट के कारण गुर्दो का आकार भी बढ़ जाता है । पॉलिसिस्टिक गुर्दा रोग एक आनुवंशिक रोग है, अर्थात् यह गुणसूत्र (क्रोमोजोम) पर पड़े जीन के दोष से होती है । आबादी के लगभग 1000 में एक व्यक्ति के गुर्दो में इस विकृति के होने की सम्भावना रहती है । माता-पिता में किसी एक के इस रोग से प्रभावित होने पर उनके बच्चों में इसके रोग के होने की सम्भावना पचास प्रतिशत रहती है । अगर माता-पिता दोनों ही प्रभावित हों, तो सन्तान में इस रोग के होने की सम्भावना लगभग शत-प्रतिशत हो जाती है । पॉलिसिस्टिक गुर्दा रोग में, सिस्ट बनने की प्रक्रिया जीवन के प्रारम्भ से ही (कुछ लोगों में गर्भावस्था से ही शुरू हो जाती है, परन्तु रोग और लक्षण प्रायः 35-40 वर्ष की उम्र के आसपास परिलक्षित होते हैं ।

पॉलिसिस्टिक किडनी रोग के लक्षण:

  • ऐसे मरीजों का आकार में बढ़ा हुआ गुर्दा पेट में गोला (Lump) का रूप धारण कर सकता है ।
  • किडनी की जन्मजात रोग से प्रभावित व्यक्ति उच्च रक्तचाप का शिकार होता है, जिस कारण उसे सिरदर्द, चक्कर, छाती दर्द, कमजोरी इत्यादि हो सकती है ।
  • रोगी को पेट में दर्द हो सकता है तथा पेशाब में रक्त आ सकता है ।
  • जाँच-पड़ताल करने पर, विशेषकर अल्ट्रासाउंड जाँच के बाद पॉलिसिस्टिक गुर्दा रोग का सटीक निदान हो पाता है ।
  • ऐसे रोगियों में पथरी बनने की सम्भावना ज्यादा रहती है, जिसके बनने पर पेट दर्द आदि शुरू हो सकता है ।
  • गुर्दो के अलावा लिवर एवं स्प्लीन में भी सिस्ट हो सकते हैं ।
  • पॉलिसिस्टिक किडनी रोग से प्रभावित रोगी के गुर्दे धीरे-धीरे काम करना कम कर देते हैं तथा वे चिरकालिक गुर्दा रोगी (क्रोनिक किडनी डिसीज) बन जाते हैं ।
  • ऐसे रोगियों के गुर्दा प्रत्यारोपण में कठिनाई आ सकती है क्योंकि उनके सगे-सम्बन्धियों में भी यह रोग हो सकता है ।
  • माता-पिता के गुर्दे पॉलिसिस्टिक होने की स्थिति में पुत्र-पुत्रियों के, चिकित्सक के द्वारा निर्देशित अन्तराल पर अल्ट्रासाउंड जाँच कराके, उनमें भी इस रोग के होने की सम्भावना का पता लगाया जाना चाहिए जिससे सही समय पर सावधानियाँ बरती जा सकें ।

फ्लोटिंग गुर्दा (Floating or Hypermobile kidney):

किडनी की जन्मजात विसंगतियों के बारे में बात करते वक्त फ्लोटिंग किडनी के बारे में भी बात करना बेहद जरुरी हो जाता है | गुर्दे सामान्यतया पेट की पिछली दीवार (Retroperitoneum) से सटे होते हैं तथा साँस की गतिविधि से थोड़ा-बहुत ऊपर-नीचे खिसकते हैं । कुछ व्यक्तियों में प्रायः दायीं तरफ का गुर्दा नीचे खिसक जाता है, जिसे फ्लोटिंग गुर्दा (Floating or Hypermobile kidney) कहते हैं । सामान्यतया इससे कोई हानि नहीं होती है, पर फ्लोटिंग गुर्दे के मूत्रवाहिनी नली के मुड़ने से अगर मूत्र प्रवाह में रुकावट पैदा होती हो तो शल्य चिकित्सा के द्वारा उसे स्थिर (Fix) करने की जरूरत पड़ सकती है ।

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