डायबिटीज के ईलाज में सहायक उपकरण एवं आधुनिक तरीके.

दुनिया की अनेक प्रयोगशालाओं में डायबिटीज पर लगातार अनुसंधान कार्य चल रहा है । खोजी वैज्ञानिक दस्ते उसके रहस्यों की थाह लेने में जुटे हैं । इस शोध से रोग की बारीकियाँ और बचाव के नए रास्ते खुलकर सामने आ रहे हैं । रोगी का जीवन स्वस्थ और सहज बनाने की कोशिशें भी लगातार की जा रही हैं । बिना सूई खुबोए ब्लड शुगर की जाँच करने वाली नई मशीन, जीन-इंजीनियरी के करिश्मे से बनी मानव इंसुलिन, नई डायबिटीज-रोधी दवाएँ, शरीर में इंसुलिन पहुँचाने की नई तकनीक, कृत्रिम अग्न्याशय, अग्न्याशय प्रत्यारोपण और इंसुलिन बनानेवाली बीटा-कोशिकाओं का रोपण इसी सुखद स्वप्न की कड़ियाँ हैं । वह दिन भी दूर मालूम नहीं देता जब स्टेम सेल से अग्न्याशय की खेती होगी ।

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डायबिटीज के ईलाज के लिए कोशिशें:

प्राचीन काल से डायबिटीज मनुष्य के लिए चुनौती बनी हुई  है । इसके रहस्यों को बेपर्दा करने और सफल उपचार की खोज में वैद्य-हकीम, डॉक्टर और वैज्ञानिक सदा से जुटे रहे हैं । यह रोग कैसे उपजता है ?  टाइप-1 डायबिटीज में इंसुलिन का निर्माण  क्यों बंद हो जाता है ? और टाइप-2 डायबिटीज में इंसुलिन क्यों ठीक से काम नहीं कर पाती ? ऐसे अनेक सवाल वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय रहे हैं । यह उनके अनथक प्रयासों का ही नतीजा है कि 1991 में इंसुलिन की खोज हुई, 1926 में इंसुलिन के क्रिस्टल तैयार हुए, 1956 में मधुमेह औषध गोली टॉलब्यूटामाइड रेस्टीनॉन के नाम से मिलने लगी, 1969 में ग्लाइबेनक्लेमाइड डायोनिल के नाम से बाजार में उतरी और 1980 के दशक में परिष्कृत मानव इंसुलिन रोगियों के लिए उपलब्ध हो गई । बीते वर्षों में टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज के लिए दोषी तत्वों तथा उनकी रोकथाम से जुड़े शोध ने भी जोर पकड़ा है । सामुदायिक स्तर पर अनेक देशों-प्रदेशों में यह समझने के प्रयास किए जा रहे हैं कि डायबिटीज कैसे उत्पन्न होती है और उसकी रोकथाम कैसे की जा सकती है ।

टाइप-1 डायबिटीज कैसे पैदा होती है

आधुनिक खोजों से यह स्पष्ट हो चला है कि टाइप-1 डायबिटीज मूल रूप से एक ओटो-इम्यून रोग है । यह रोग कई कड़ियों के आपस में जुड़ने से उपजता है । इसकी पहली कड़ी व्यक्ति की खास जेनेटिक संरचना है, जो उसे रोग की तरफ ले जाती है । इस अंकुर-स्थली पर ही दूसरी कड़ियाँ आपस में जुड़कर रोग पैदा करती हैं । वैज्ञानिकों के मुताबिक कुछ विशेष मानव जीन्स रोग के लिए प्रेरक और बचावकारी भूमिका निभाते हैं । यह ‘डी.क्यू.ए.’ तथा ‘बी’ जीन्स उन ह्यूमन ल्यूकोसाइट ऐंटिजन से गहरे जुड़े हैं जिनका टाइप-1 डायबिटीज से बहुत घनिष्ट संबंध है । इन प्रतिजनों पर ‘डी.आर.बी. जीन्स का भी प्रभाव रहता है । आगे की कड़ी कुछ ऐसी अबूझ परिस्थितियों से संबंधित है जिसके तहत शरीर की इम्यून प्रणाली बागी हो जाती है और अग्न्याशय की इंसुलिन बनानेवाली बीटा-कोशिकाओं के ऊपर ही धावा बोल देती है । कुछ ऐसे प्रमाण भी मिले हैं कि शरीर की इम्यून प्रणाली को गुमराह करने में कई तरह के वायरस जैसे कनपेड़ (मम्पस), यकृतशोथ (हैपेटाइटिस), इंफेक्शियस मोनोन्यूक्लियोसिस, रूबेला और कोक्ससेकी वायरस का हाथ हो सकता है । गुमराह हुई इम्यून प्रणाली फिर खुद अग्न्याशय की बीटा-कोशिकाओं के विरुद्ध एंटिबॉडी-रूपी प्रक्षेपास्त्र छोड़ने लगती है । इससे बीटा-कोशिकाएँ तहस-नहस हो जाती हैं, इंसुलिन बननी बंद हो जाती है और डायबिटीज हो जाती है ।

टाइप-2 डायबिटीज कैसे पैदा होती है

टाइप-2 डायबिटीज की गुत्थियाँ अब तक रहस्यमय ही बनी हुई हैं । यह मोटापे से बहुत गहरे जुड़ी है । प्रयोगों से यह साबित हुआ है कि मोटापा इंसुलिन के असर को कमजोर कर देता है । बेजल मेटाबमलिक इंडेक्स के आधार पर जो लोग मोटे नहीं कहे जा सकते पर जिनमें पेट पर चर्बी जमी होती है उनमें भी टाइप-2 डायबिटीज अधिक पाई जाती है । इनमें इंसुलिन की कुल मात्रा तो सामान्य या सामान्य से भी अधिक होती है पर उसमें कोई ऐसा दोष होता है कि वह ब्लड शुगर को संयत नहीं रख पाती । लेकिन वजन कम करने से कई रोगियों में इंसुलिन की प्रभावशीलता फिर से लौट आती है और इसी से रक्त शर्करा नियंत्रण में आ जाती है।  लेकिन फिर तो हर स्थूलकाय व्यक्ति को डायबिटिक होना चाहिए था ! ऐसा तो नहीं है । इसका अर्थ यह हुआ कि टाइप-2 डायबिटीज के रोगियों में अवश्य ही अग्न्याशय में कोई ऐसी कमी होगी जिसके कारण उन्हें यह रोग हो जाता है । यह कमी कई तरह की हो सकती है : या तो बीटा-कोशिकाओं की कुल संख्या ही कम हो सकती है या बीटा-कोशिकाएँ किसी कारण सुस्त हो जाती हैं और उतनी इंसुलिन नहीं बना पातीं जितनी आवश्यक होती है या वे इंसुलिन तो बना लेती हैं पर उसे सही समय पर छोड़ नहीं पातीं या फिर इंसुलिन में ही कहीं कोई कमी रह जाती है कि वह अपना काम नहीं कर पाती । सामुदायिक अध्ययनों के आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि उम्र बढ़ने के साथ भी टाइप-2 डायबिटीज की दर में वृद्धि आती है । ऐसे लोग जो शारीरिक रूप से निष्क्रिय जीवन व्यतीत करते हैं उनमें यह रोग अधिक होता है । आनुवंशिकी का भी रोग की उपज में बहुत गहरा हाथ है । यदि माता-पिता, भाई-बहन को टाइप-2 डायबिटीज है, तो इसके होने की आशंका बढ़ जाती है ।  इस खोजबीन का ही यह नतीजा है कि आज दुनिया के कई हिस्सों में टाइप-2 डायबिटीज की रोकथाम के लिए कई प्रकार के प्रयोग किए जा रहे हैं । नियमित व्यायाम और खानपान में सुधार से वजन घटाकर बहुत से लोग टाइप-2 डायबिटीज को दूर रख पाने में सफल हुए हैं ।

डायबिटीज के ईलाज में सहायक उपकरण एवं आधुनिक तरीके:

प्रयोगशालाओं में जुटे वैज्ञानिक हर साल तरह-तरह के नए संयंत्र और उपकरण भी विकसित करने में लगे हैं ताकि डायबिटिक व्यक्तियों का जीवन बेहतर बन सके । सिगरेट-लाइटर के आकार का इंसुलिन पंप, कंप्यूटर से लैस कृत्रिम अग्न्याशय, अग्न्याशय और बीटा कोशिकाओं का प्रत्यारोपण, बेहतर दवाओं की खोज इन्हीं कोशिशों का हिस्सा हैं ।

इंसुलिन पंप क्या है और इसका इस्तेमाल:

डायबिटीज के दूरगामी दुष्प्रभावों से बचे रहने के लिए रक्त में शुगर की मात्रा का चौबीसों घंटे सही स्तर पर बने रहना जरूरी है । इसे ध्यान में  रखते हुए ही इंसुलिन पंप ईजाद किया गया है । सिगरेट-लाइटर जैसा छोटा, सिर्फ 130 ग्राम वजन का यह पंप बैटरी से चलता है । और इसे आसानी से कमरबंद में बाँधा जा सकता है । इस पंप से एक बहुत महीन, 27-गॉज की पतली-सी सुई जुड़ी रहती है, जिसे पेट की त्वचा के भीतर रोपित कर दिया जाता है । पंप में इंसुलिन भरी रहती है, जो सुई के माध्यम से चौबीसों घंटे शरीर में पहुँचती रहती है । पंप में एक सिलेक्टर भी लगा रहता है, जिसे घुमाकर इंसुलिन की भीतर जाने वाली मात्रा बढ़ाई-घटाई जा सकती है । आज यह पंप विदेशों में बड़ी संख्या में इस्तेमाल होने लगा है । इसकी कीमत लगभग 50,000 रुपए है । पर इसका इस्तेमाल सिर्फ वही रोगी कर सकता है जो पढ़ा- लिखा हो और डॉक्टरी हिदायतों का पूरा-पूरा पालन कर सकने में समर्थ हो । इसे इस्तेमाल करनेवाले को काफी चौकस रहना पड़ता है । यंत्र के साथ कभी-कभी पेचीदगियाँ भी पैदा हो जाती हैं । पंप से आ रही प्लास्टिक की नली बंद हो जाने से इंसुलिन आनी कम या बंद हो सकती है । इसी तरह पंप में गड़बड़ी होने से एकसाथ ज्यादा इंसुलिन भी शरीर के भीतर पहुँच सकती है, जिससे खून में शुगर अचानक बहुत घट सकती है । यह हाइपोग्लाइसीमिया बहुत जोखिम-भरा होता है । कुछेक रोगियों में सूई वाले स्थान पर त्वचा के नीचे के ऊतक में संक्रमण भी हो सकता है, और मवाद इकट्ठा होकर फोड़े की शक्ल ले सकता है । इंसुलिन पंप सिर्फ उन रोगियों के इस्तेमाल के लिए है जो पंप की नाजुक बारीकियाँ ठीक प्रकार समझ सकते हैं और पंप की पूरी देखभाल कर सकते हैं ।

कृत्रिम अग्न्याशय क्या है और इसका इस्तेमाल:

कृत्रिम अग्न्याशय (आर्टिफिशियल पैन्क्रियाज) बहुत कुछ कुदरती अग्न्याशय का ही मशीनी रूप है । इसमें एक ग्लूकोमीटर होता है, जो लगातार रोगी का ब्लड शुगर नापता रहता है । यह ग्लूकोमीटर एक कंप्यूटर से जुड़ा होता है, जो ब्लड शुगर के आधार पर मिनट-दर-मिनट शरीर की इंसुलिन की आवश्यकता का हिसाब लगाता रहता है । यह कंप्यूटर एक इंसुलिन पंप से जुड़ा रहता है जो पेट में ही रोपित (इम्प्लांट) कर दिया जाता है । कंप्यूटर पंप को यह सिगनल देता रहता है कि शरीर को किस समय कितनी इंसुलिन चाहिए और पंप उतनी ही मात्रा में शरीर को इंसुलिन देकर यह जरूरत पूरी करता रहता है । इस पंप में इंसुलिन समय-समय पर बाहर से ही भरी जा सकती है ।

क्या इंजेक्शन के बिना इंसुलिन ली जा सकती है?

इंसुलिन के साथ एक बड़ी दिक्कत यह है कि उसे गोली, शरबत या घोल के रूप में मुँह से नहीं लिया जा सकता । उसे मुँह से लेने से वह आँतों में उपस्थित पाचक एन्जाइम के प्रभाव से नष्ट हो जाती है । इसलिए उसे सदा इंजेक्शन द्वारा ही लेना पड़ता है । पर शोध-चिकित्सक अब इस प्रयास में जुटे हुए हैं कि ऐसी इंसुलिन विकसित की जाए जिसे स्प्रे के रूप में मुँह या नाक से ले पाना संभव हो । वैज्ञानिकों का मानना है कि वह दिन बहुत दूर नहीं जब वे ऐसी इंसुलिन तैयार करने में कामयाब हो जाएँगे । तब इंसुलिन लेना सचमुच सहज हो जाएगा । नाक से उसे ग्रहण करने पर वह सीधे फेफड़ों में पहुँच जाएगी और वहाँ से झटपट रक्त-संचार व्यवस्था में चली जाएगी । कुछ इसी तरह की कोशिश एक ऐसी इंसुलिन बनाने के लिए भी हो रही है, जो मलद्वार के रास्ते ली जा सकेगी ।

 डायबिटीज के ईलाज के लिए दवाइयों की खोज:

औषध-वैज्ञानिक इंसुलिन से मिलती-जुलती बेहतर दवाएँ विकसित करने के कार्य में भी जुटे हैं । इसके लिए वे जंतुओं से प्राप्त होनेवाली इंसुलिन की प्रोटीन-संरचना परिवर्तित कर तरह-तरह के प्रयोग कर रहे हैं । उनकी कोशिश है कि इससे वे एक ऐसी इंसुलिन तैयार कर लें जो ज्यादा प्रभावशाली हो और रोगी को डायबिटीज की पेचीदगियों से बचा पाने में समर्थ भी । अब तक उपलब्ध जंतु-इंसुलिन असरकारक तो है, पर उसकी कार्यशीलता मानव इंसुलिन से अलग है ।

डायबिटीज के ईलाज के लिए अग्न्याशय का प्रत्यारोपण:

गुर्दे और दिल के प्रत्यारोपण आज दुनिया के बहुत-से देशों में होने लगे हैं । कुछ ऐसे ही प्रयास अग्न्याशय को लेकर भी किए गए हैं । इसमें किसी ऐसे मृतक की देह से, जिसने अपने जीवन-काल में ही अंग-दान की इच्छा व्यक्त की हो, स्वस्थ अग्न्याशय प्राप्त करके रुग्ण व्यक्ति की देह में रोपित कर दिया जाता है । अब तक ऐसे 1,000 से अधिक प्रत्यारोपण किए जा चुके हैं, पर उनके परिणाम बहुत सफल नहीं रहे हैं । यों भी डायबिटीज के लिए इतना जटिल, महँगा और जोखिम-भरा ऑपरेशन करना तर्कसंगत नहीं लगता, जबकि दूसरी विधियों से उसका उपचार संभव है ।  जिन मामलों में अग्न्याशय के साथ-साथ गुर्दे भी बेकार हो जाते हैं, उनमें गुर्दे और अग्न्याशय का संयुक्त प्रत्यारोपण जीवनदायक बन सकता है ।  किसी भी प्रत्यारोपण में सबसे बड़ी समस्या यह रहती है कि प्राप्तकर्ता का शरीर कई बार नए अंग को स्वीकार नहीं करता । प्राप्तकर्ता के शरीर की इम्यून प्रणाली दाता के शरीर से आए नए अंग को दुश्मन मान नष्ट कर देती है । इसे ‘रिजेक्शन फिनोमिना’ कहते हैं । इसीलिए दाता से लिया गया अंग किसी ऐसे व्यक्ति के शरीर में ही प्रत्यारोपित किया जाता है जिसके ऊतक दाता के ऊतकों से मेल खाते हैं । फिर अंग प्रत्यारोपित करने के बाद प्राप्तकर्ता को लंबे समय तक ऐसी औषधियाँ भी दी जाती हैं, जो उसकी इम्यून प्रणाली को दबाए रखती हैं । इसके कुछ दुष्प्रभाव भी होते हैं । इम्यून प्रणाली के दबे रहने से रोगी का शरीर रोगाणुओं से अपना बचाव नहीं कर पाता । ऐसे रोगियों को इसीलिए बहुत अलग (आइसोलेशन में) रखा जाता है । पर सभी कोशिशों के बावजूद बहुत से मामलों में प्राप्तकर्ता का शरीर प्रत्यारोपित अंग को नकार देता है । अग्न्याशय प्रत्यारोपण में भी यह समस्या सबसे बड़ी है ।

डायबिटीज के ईलाज के लिए बीटा-कोशिकाओं का प्रत्यारोपण:

अब कुछ शोध-चिकित्सकों ने अग्न्याशय प्रत्यारोपण में उठने वाली समस्या का हल भी सोच निकाला है । पूरे अग्न्याशय की जगह, सिर्फ इंसुलिन बनाने वाली बीटा-कोशिकाओं को प्रत्यारोपित कर रिजेक्शन की समस्या से बचा जा सकता है । इस दिशा में आजकल प्रयोग चल रहे हैं । वैज्ञानिक बीटा-कोशिकाएँ प्राप्त करने के लिए गर्भपात के समय नष्ट हुए गर्भ से ये कोशिकाएँ जुटाने में सफल हो गए हैं । उन्होंने पाया है । कि प्रयोगशाला में टिशू-कल्चर तकनीक से ऐसी कोशिकाओं की आगे खेती कर पाना भी संभव है । पर क्या ये कोशिकाएँ रिजेक्शन का पात्र नहीं बनतीं? इसके लिए दो विलक्षण तरकीबें अपनाई गई हैं पहली यह कि बीटा-कोशिकाओं को एकदम विशुद्ध रूप से तैयार किया गया है । दूसरी यह कि उन्हें रोपित करने से पहले एक ऐसे कैप्सूल में बंद करने का इंतजाम किया गया है, जो भीतर बन रही इंसुलिन को बाहर तो आने देता है, पर श्वेत रक्त कणों को अंदर नहीं घुसने देता । उल्लेखनीय है कि श्वेत रक्त कण ही रिजेक्शन प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार होते हैं । प्रायोगिक दौर में ये तरकीबें बहुत कामयाब दिख रही हैं । देखना यह है कि व्यावहारिक स्तर पर क्या यह सफलता दोहराई जा सकेगी |

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