डायबिटिक कीटो-एसिडोसिस के कारण लक्षण एवं ईलाज

डायबिटीज की इमरजेंसी की बात करें तो डायबिटिक कीटो-एसिडोसिस नामक यह दूसरी सबसे बड़ी इमरजेंसी है | यह टाइप 1 डायबिटीज में पैदा होने वाली बेहद गंभीर स्थिति है | एक आकड़ें के मुताबिक जब इन्सुलिन की खोज नहीं हुई थी तो लगभग डायबिटीज के पचास प्रतिशत रोगी इसी के कारण दुनिया को विदा कर जाते थे | लेकिन जब से इन्सुलिन की खोज हुई है और यह आम इन्सान के लिए उपलब्ध हुई है तब से इन्सुलिन को नियम के मुताबिक लेकर और ब्लड शुगर पर नियंत्रण रखकर कीटो-एसिडोसिस नामक डायबिटिक इमरजेंसी से बचा जा सकता है | लेकिन इंडिया में अभी भही ऐसा देखा गया है की बहुत सारे लोग इस रोग को लेकर सावधान नहीं रहते हैं और इसका ईलाज नीम हकीमों के पास जाकर ढूँढने लगते हैं जिससे स्थिति सुधरने की बजाय बिगड़ जाती है | ऐसे लोगों में आज भी कीटो-एसिडोसिस मृत्यु का प्रमुख कारण बनता है |

डायबिटिक कीटो-एसिडोसिस

कीटो-एसिडोसिस क्या है?

डायबिटिक कीटो-एसिडोसिस में मनुष्य शरीर की सम्पूर्ण जैव रासायनिकी चरमरा अर्थात गड़बड़ हो जाती है | इस स्थिति में खून में शुगर की मात्रा बहुत बढ़ जाती है, लेकिन शरीर में इन्सुलिन की कमी होने के चलते शरीर की कोशिकाओं को ग्लूकोज़ नहीं मिल पाता है | इसका परिणाम यह होता है की शरीर की सम्पूर्ण रस प्रक्रिया बिगड़ जाती है | मनुष्य की रस प्रक्रिया सिस्टम शरीर में ग्लूकोज़ बनाने की पूरी कोशिश करता है | यह रस प्रकिया प्रणाली पहले जिगर में जमा ग्लाईकोजन, फिर शरीर में जमा प्रोटीन और उसके बाद बसा को यह ग्लूकोज़ में बदलती है | इससे शरीर में नुकसान पहुँचाने वाले जैव रसायन एकत्र हो जाते हैं और मूत्र के रस्ते भारी मात्रा में पोटेशियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस इत्यादि महत्वपूर्ण तत्वों को शरीर से बाहर फेंक देते हैं | तत्पश्चात शरीर में वासिय अम्ल इकट्ठे होने लगते हैं, रक्त में अम्ल की टोटल मात्रा बढ़ जाती है, रक्त में कीटोन आ जाते हैं, शरीर के अन्दर पानी की भी कमी आ जाती है जिससे मूत्र में भी कीटोन आने लगता है एवं शरीर में कार्बन डाईआक्साइड के बढ़ने से साँसे भी बहुत तेज आती है शरीर में होने वाली इसी प्रक्रिया को कीटो-एसिडोसिस कहा जाता है |

डायबिटिक कीटो-एसिडोसिस के कारण:

कीटो-एसिडोसिस डायबिटीज नामक रोग के प्रति ढिलाई बरतने या किसी तनाव कारी स्थिति के कारण इन्सुलिन की आवश्यकता अचानक बढ़ने से पैदा होती है | शरीर के किसी भी अंग में हुआ कोई तीव्र संक्रमण जैसे निमोनिया, मूत्रीय सिस्टम का संक्रमण, दिल का दौरा एवं फालिज जैसी गंभीर स्थितियां एवं कोई बड़ी चोट इस प्रकार की इमरजेंसी को पैदा कर सकती है | इसके अलावा डायबिटिक कीटो-एसिडोसिस होने के मुख्य कारण कुछ इस प्रकार से हैं |

  • तीव्र इन्फेक्शन
  • इन्सुलिन छोड़ देना
  • तनावकारी स्थितियां पैदा होना
  • दिल का दौरा पड़ना
  • मष्तिष्क की किसी धमनी में खून का दौरा रुकना या धमनी का फटना
  • कोई ऑपरेशन होना
  • मरीज को कोई बड़ी चोट लग जाना

डायबिटिक कीटो-एसिडोसिस के लक्षण एवं पहचान:

कीटो-एसिडोसिस की पहचान सामान्यतया आसानी से की जा सकती है जिन लक्षणों के माध्यम से इसकी पहचान की जा सकती है उसका उल्लेख निम्नवत है |

  • इसमें जोरों से प्यास लगती है और लघु शंका के लिए बार बार बाथरूम जाना पड़ सकता है |
  • इसमें पेट में तेज दर्द हो सकता है |
  • देखने में धुंधलापन अर्थात नज़र में धुंधलापन आ जाता है |
  • रोगी को बार बार उल्टियाँ हो सकती हैं |
  • ऐसा लगता है जैसे होंठ, जीभ एवं गला सूख रहे हों |
  • कीटो-एसिडोसिस से ग्रसित व्यक्ति की साँसे तेज चलनी लगती है और साँसों से सड़े हुए फलों की भांति दुर्गन्ध आने लगती है |
  • इसमें नब्ज कमजोर पड़ जाती है |
  • सिर में एवं पेशियों में दर्द होना भी डायबिटिक कीटो-एसिडोसिस का लक्षण हो सकता है |

उपर्युक्त लक्षणों के बावजूद भी ईलाज न होने पर मरीज बेहोश हो सकता है और उसकी जान पर बन सकती है | मरीज में यह बेहोशी गहरी होने के चलते यह कोमा का रूप धारण कर सकती है | फिर इससे मरीज का बच पाना मुश्ह्किल हो जाता है |

डायबिटिक कीटो-एसिडोसिस का ईलाज:

डायबिटिक कीटो-एसिडोसिस का ईलाज अर्थात उपचार अस्पताल या नर्सिंग होम में चौबीसों घंटे एडमिट होकर किया जा सकता है | स्थिति की पुष्टी के लिए सबसे पहले खून एवं मूत्र की जांच की जाती है | उसके बाद चिकित्सक द्वारा तेजी से ईलाज शुरू कर दिया जाता है | इसमें चिकित्सकों द्वारा शरीर की बिगड़ी जैव रसायनिकी को जल्द से जल्द सुधारने का भरसक प्रयत्न किया जाता है | इसमें चिकित्सकों की यह भी कोशिश रहती है की रक्त अम्लता के स्तर को सामान्य अवस्था में लाया जाय और शरीर में आई पानी की कमी को दूर किया जाय | डायबिटिक कीटो-एसिडोसिस का ईलाज करते वक्त चिकित्सकों द्वारा शरीर से इन्फेक्शन को दूर करने के लिए उपयुक्त एंटी बायोटिक दवाएं भी दी जाती हैं | ब्लड शुगर को कण्ट्रोल करने के लिए इन्सुलिन तथा शरीर में पानी की कमी एवं इलेक्ट्रोलाइट की कमी की पूर्ति के लिए इनका घोल शिरा द्वारा चढ़ाया जा सकता है | शुरूआत के चौबीस घंटे यदि ठीक अच्छी तरह बीत जाएँ तो इसमें मरीज के बचने की संभावना बढ़ जाती है लेकिन मरीज की तबियत में पूरी तरह से सुधर आने में काफी समय लग जाता है |

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