डी. एण्ड ई. क्या है? कैसे और क्यों किया जाता है?

डी. एण्ड ई. यानिकी Dilatation and Evacuation  का प्रयोग गर्भावस्था के दूसरे ट्राइमेस्टर में अथवा 12 सप्ताह के बाद किया जाता है  । यह ऐसी प्रक्रिया है, जो vacuum aspiration, dilation and curettage (D&C)  व use of surgical instruments, जैसे- forceps आदि का सम्मिश्रण है । डी. एण्ड ई.  से पूर्व गर्भाशय का आकार व गर्भ की आयु देखने के लिये अल्ट्रासाउण्ड किया जाता है । D&E से 24 घंटे पहले laminaria or synthetic dilator का प्रयोग किया जाता है । सर्विक्स के फैल जाने से फिर उसको चोट पहुंचने का खतरा नहीं रहता है ।

डी. एण्ड ई.

डी. एण्ड ई. कैसे किया जाता है ?:

  • रोगिणी को टेबिल पर लिटाया जाता है ।
  • उसके बाद योनि में speculum डाला जाता है ।
  • एन्टीसेप्टिक सोल्यूशन से योनि व सर्विक्स को साफ किया जाता है ।
  • जनरल अथवा लोकल एनेस्थीसिया दिया जाता है ।
  • डी. एण्ड ई. प्रक्रिया में सर्विक्स को tenaculum नामक उपकरण से पकड़कर रखा जाता है, जिससे गर्भाशय अपने स्थान पर बना रहता है ।
  • cervical canal को probes की सहायता से फैलाया जाता है ।
  • एक ट्यूब जिसे cannula कहते हैं, को गर्भाशय में डाला जाता है ।
  • यह cannula ट्यूब के द्वारा एक बोतल व पंप से जुड़ी रहती है, जो गर्भाशय से टिशू को हटाने के लिये धीरे-धीरे vacuum भेजता है ।
  • गर्भाशय की लाइनिंग व टिशूज को हटाने के लिये curette का प्रयोग किया जाता है ।
  • डी. एण्ड ई. प्रक्रिया में टिशू के बड़े टुकड़ों को हटाने के लिये grasping instrument (forceps) का प्रयोग किया जाता है । यह प्रक्रिया अधिकतर गर्भावस्था के 16 सप्ताह के बाद प्रयोग में लायी जाती है । इसका प्रयोग curette द्वारा गर्भाशय की लाइनिंग व टिशूज को हटाने के पूर्व किया जाता है । Suctioning सबसे बाद में की जाती है, जिससे यह निश्चित हो जाता है कि गर्भाशय में से सभी कुछ बाहर आ गया है व गर्भाशय पूर्णत: खाली हो गया है । D&E मे लगभग 30 मिनट का समय लगता है । यह प्रक्रिया अस्पताल में अथवा क्लीनिक में ही की जा सकती है, परन्तु रात भर रुकने की आवश्यकता नहीं पड़ती है ।
  • डी. एण्ड ई. प्रक्रिया में निकाले गये गर्भाशय के टिशुओं की जांच की जाती है व यह देखा जाता है कि complete abortion हुआ है अथवा नहीं । D&E के दौरान अल्ट्रासाउण्ड का प्रयोग भी किया जाता है ।

सर्जरी के बाद कैसे महसूस होता है :

डी. एण्ड ई. (D&E)  एक सर्जीकल प्रक्रिया है । इसके पश्चात् महिला को निम्न लक्षण अनुभव हो सकते हैं |

  • डी. एण्ड ई. के बाद 2 सप्ताह तक अनियमित रक्तस्राव अथवा स्पॉटिंग हो सकती है । इसके लिये सैनिटरी पैड का प्रयोग करना चाहिये । टेम्पून का प्रयोग नहीं करना चाहिये । यदि दूसरे ट्राइमेस्टर में गर्भपात होता है, तो उसका रक्तस्राव पहले ट्राइमेस्टर के गर्भपात से अधिक होता है ।
  • दर्द मासिक चक्र की भांति ही होता है, जो कुछ घण्टों से कुछ दिनों तक रह सकता है ।
  • डी. एण्ड ई. के बाद दो सप्ताह तक भावनात्मक परिवर्तन रहते हैं ।

डी. एण्ड ई.  के बाद उपचार :

  • इन्फेक्शन से बचने के लिये एंटीबायटिक दी जाती है ।
  • एक दिन आराम करना चाहिये । अगले दिन यदि आपको ठीक लगे, तो सामान्य दिनचर्या प्रारंभ की जा सकती है ।
  • दर्द के लिये Acetaminophen (such as Tylenol) अथवा ibuprofen (such as Advil) दी जा सकती है । गर्भाशय को संकुचित होने व अपने सामान्य आकार में आने के लिये uterotonics दी जाती है ।
  • डी. एण्ड ई. प्रक्रिया के बाद दो सप्ताह तक संभोग नहीं करना चाहिए व इसके तुरंत बाद
  • परिवार नियोजन के साधनों का प्रयोग प्रारंभ कर दें । इन्फेक्शन से बचने के लिये कण्डोम का प्रयोग भी किया जा सकता है ।

 डी. एण्ड ई.  क्यों किया जाता है :

Dilatation and Evacuation (D&E) का प्रयोग गर्भावस्था के दूसरे ट्राइमेस्टर में अथवा 12 सप्ताह के बाद गर्भपात में किया जाता है । इसके द्वारा गर्भाशय की लाइनिंग व टिशूज को बाहर निकाला जाता है । इसकी सलाह दूसरे ट्राइमेस्टर में ऐसी स्त्री को भी दी जा सकती है, जिसके भ्रूण में कोई गंभीर मेडिकल प्रॉबलम अथवा असामान्यता हो । ऐसी स्त्री जो बलात्कार आदि के परिणामस्वरूप गर्भवती हुई हो और दूसरे ट्राइमेस्टर तक गर्भावस्था का पता न चल पाया हो, तो उसके लिये भी इस प्रक्रिया का प्रयोग किया जाता है । यह second-trimester therapeutic abortion की विधि है ।

 D&E कैसे कार्य करता है :

Dilatation and Evacuation (D&E) एक सुरक्षित व प्रभावी विधि है । यह second-trimester therapeutic abortion में standard treatment की विधि बन गया है ।

 डी. एण्ड ई. से क्या खतरा हो सकता है :

डी. एण्ड ई. प्रक्रिया में निम्नलिखित खतरे हो सकते हैं

  • गर्भाशय की लाइनिंग और सर्विक्स को चोट पहुंच सकती है ।
  • सर्जीकल उपकरण से गर्भाशय की दीवार कट सकती है । यद्यपि ऐसा कम ही होता है ।
  • डी. एण्ड ई. प्रक्रिया के दौरान गर्भाशय में बैक्टीरिया प्रविष्ट हो सकते हैं, जिनसे इन्फेक्शन का खतरा होता है । यदि इस प्रक्रिया से पूर्व कोई sexually transmitted disease (STD) है, तो इन्फेक्शन की संभावना बढ़ जाती है । इस खतरे को कम करने के लिये D&E के दौरान व उसके बाद एण्टीबायटिक दी जाती है ।
  • गर्भाशय की लाइनिंग और सर्विक्स को चोट पहुंची हो । सर्जीकल उपकरण से गर्भाशय की दीवार कट गयी हो या डी. एण्ड ई. प्रक्रिया में गर्भाशय की मांसपेशियां फट गयी हों । तो ऐसे में महिला को असमान्य रक्तस्राव हो सकता है लेकिन ऐसा बहुत कम होता है ।

डी. एण्ड ई. प्रक्रिया में दूसरे ट्राइमेस्टर के गर्भपात में ये खतरे पहले ट्राइमेस्टर के गर्भपात से अधिक होते हैं, विशेषकर जब गर्भपात 16 सप्ताह के बाद किया गया हो ।

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