डायबिटीज में आँखों की देखभाल कैसे करें

डायबिटीज में आँखों की देखभाल इसलिए जरुरी हो जाती है क्योंकि आँखें कुदरत की अनमोल देन हैं । इसलिए डायबिटीज में उनकी तंदुरुस्ती अर्थात स्वास्थ्य के बारे में खास तौर पर ध्यान देना होता है । अगर ब्लड शुगर अधिक घटती-बढ़ती रहे तो आँखें तरह-तरह की मुश्किलों में घिर सकती हैं । कम उम्र में मोतियाबिंद उतरने और लेंस की वक्रता बदलने से दृष्टि धुंधली हो जाती है, पर आँख के पर्दे में रेटिनोपैथी हो जाए या नेत्रगोलक का भीतरी दाब बढ़ने से काला मोतिया हो जाए तो दृष्टि जाती रह सकती है । डायबिटीज में आँखों की देखभाल के लिए ब्लड शुगर पर नियंत्रण रखना और समय से आँखों की जाँच कराते रहना जरुरी है क्योंकि ऐसा करने से आँखें इन मुश्किलों से बच सकती हैं और उनकी ज्योति उम्र-भर साथ दे सकती है ।

डायबिटीज में आँखों की देखभाल

आँखों की उपयोगिता:

आँखें ज्ञान का प्याला हैं । उनमें ही यह सुंदर दुनिया उसका हर रंग, हर छवि, रेखाएँ और बिंदु अपना अस्तित्व पाते हैं । उनके बिना जीवन बहुत सूना-सूना हो जाता है, तथा हर चीज स्याह और कभी न खत्म होने वाले अँधेरे में समा जाती है । डायबिटीज में आँखों की देखभाल न  होने पर आँखों पर तरह-तरह से आँच आ सकती है । बढ़ी हुई ब्लड शुगर का आँखों के हर अंग-प्रत्यंग पर बुरा असर पड़ सकता है । डायबिटीज जितनी पुरानी हो, यह संकट उतना ही गहराता जाता है । हर पाँच में से चार डायबिटीज के मरीज डायबिटीज से उपजी नेत्र समस्याओं से गुजरते हैं । लेकिन सजग रहकर और समय से उपचार पाकर आँखों की खूबसूरत दुनिया तब भी खिली रह सकती है ।

डायबिटीज में आँखों की देखभाल कैसे करें

डायबिटीज में आँखों की देखभाल की बात करें तो जैसा की हम सब जानते हैं की बचाव इलाज से लाख गुना अच्छा होता है । आँखों को डायबिटीज के प्रकोप से बचाने का सबसे अच्छा रास्ता ब्लड शुगर को संतुलन में रखना है । पर इसके साथसाथ समय-समय पर आँखों की ठीक प्रकार से जाँच भी कराते रहना जरूरी है । यह जाँच किसी नेत्र-विशेषज्ञ से ही कराई जानी चाहिए । इसके अपने नियम-कायदे भी हैं, जिससे कि आँख के हर हिस्से की जाँच सलीके से हो जाती है और डायबिटीज का बुरा असर यदि किसी अंग पर पड़ा हो तो समय रहते इलाज हो सकता है ।

डायबिटीज में आँखों की देखभाल के लिए कब कौन-सी जाँच कराएँ

टाइप-2 डायबिटीज में दृष्टि की जाँच दूर की दृष्टि और पास की दृष्टि की, आँख के पर्दे की जाँच ऑफ्थेलमोस्कोप द्वारा फील्ड चार्टिग द्वारा, आँख के भीतरी दाब की जाँच, स्लिट लैंप जाँच रोग का पता चलने पर फिर हर साल या जब कभी दृष्टि में किसी तरह की समस्या दिखे करानी चाहिए ।

टाइप-1 डायबिटीज में दृष्टि की जाँच दूर की दृष्टि और पास की दृष्टि की, आँख के पर्दे की जाँच ऑफ्थेलमोस्कोप द्वारा फील्ड चार्टिग द्वारा, आँख के भीतरी दाब की जाँच, स्लिट लैंप जाँच रोग का पता चलने के तीन से पांच साल के भीतर फिर हर साल या जब कभी दृष्टि सम्बन्धी कोई समस्या आये करानी चाहिए |

डायबिटीज होते हुए गर्भवती होने पर आँखों की देखभाल के लिए दृष्टि की जाँच दूर की दृष्टि और पास की दृष्टि की, आँख के पर्दे की जाँच ऑफ्थेलमोस्कोप द्वारा फील्ड चार्टिग द्वारा गर्भधारण करने से पहले और पहली तिमाही में करनी चाहिए |

डायबिटीज और आँख का पर्दा (रेटिना):

डायबिटीज में आँखों की देखभाल में रेटिना का विशेष ध्यान रखना पड़ता है, क्योंकि डायबिटीज का सबसे गंभीर असर आँख के पर्दे पर पड़ता है । इसके कारण आँख की रोशनी गुम हो सकती है । इसे डायबिटिक रेटिनोपैथी कहते हैं ।  डायबिटीज जितनी पुरानी हो, रेटिनोपैथी होने की आशंका उतनी ही बढ़ती जाती है । टाइप-1 डायबिटीज में रोग के पहले दस साल पूरे होने पर 10 प्रतिशत, पंद्रह साल तक 50 प्रतिशत और पच्चीस साल पूरे होते-होते 80 प्रतिशत मरीज रेटिनोपैथी के कष्ट से गुजरते हैं । टाइप-2 डायबिटीज में ये आँकड़े कुछ अलग हैं । उसमें पहले पाँच सालों में 30 प्रतिशत, दस साल पूरे होने तक 50 प्रतिशत, पंद्रह साल तक 60 प्रतिशत और पच्चीस साल तक 70-80 प्रतिशत रोगियों में आँख के पर्दे में रेटिनोपैथी के परिवर्तन उभरते देखे गए हैं । इसलिए डायबिटीज में आँखों की देखभाल के लिए ब्लड शुगर जितनी नियंत्रण में रहे, रेटिनोपैथी का खतरा उतना ही कम होता है । लेकिन शुगर का स्तर बहुत घटता-बढ़ता रहे, तो खतरा बढ़ जाता है । इसी प्रकार रक्तचाप के बढ़े होने पर भी यह खतरा बढ़ जाता है । गर्भवती डायबिटिक स्त्री में भी रेटिनोपैथी के दुष्परिवर्तन अधिक गंभीर होते हैं ।

आँख के पर्दे में बदलाव:

डायबिटीज में आँखों की देखभाल न होने के कारण उत्पन्न समस्या डायबिटिक रेटिनोपैथी में आँख के पर्दे की महीन रक्त-वाहिकाएँ फूल जाती हैं शिराएँ बेतरतीब हो जाती हैं और उनमें फैलाव आ जाता है | पर्दे पर जगह-जगह खून के गोलाकार धब्बे उभर आते हैं और पीला तथा साफ पानी जम जाता है । ये परिवर्तन पर्दे के बाहरी हिस्से तक सीमित रहें, तो पता नहीं चलता । पर पर्दे के सबसे संवेदनशील भाग मेक्यूला में जैसे ही रेटिनोपैथी शुरू होती है, नजर एकदम से गिर जाती है । कुछ मरीजों में थोड़े समय बाद पर्दे पर नई रक्त-वाहिकाओं की फूटन शुरू हो जाती है । ये नई धमनियाँ बहुत कमजोर होती हैं । इनमें जगह-जगह दरारें आ जाती हैं, जिससे पर्दे पर खून उतर आता है, नजर धुंधली हो जाती है और धमनियों से बहा खून पर्दे के ठीक आगे विट्रियस में भी पहुँच सकता है । यह खून कई बार तीन-चार महीनों में खुद साफ हो जाता है । लेकिन ऐसा न हो, तो यह पर्दे को अपनी तरफ खींचकर रेटिना की तहों में डिटेचमेंट पैदा कर सकता है । बार-बार के रक्तस्राव से आँख का आंतरिक दाब भी बढ़ सकता है । यह पूरी प्रक्रिया ‘प्रोलिफरेटिव रेटिनोपैथी’ के नाम से जानी जाती है । इसमें आँख की ज्योति कभी भी छिन सकती है ।

आँखों की देखभाल के लिए रेटिनोपैथी से बचाव:

डायबिटीज में आँखों की देखभाल के लिए रेटिनोपैथी जब बिल्कुल शुरू की अवस्था में हो और तभी उसका पता चल जाए, तो उसका पूरा और सही इलाज हो सकता है । पर शुरू में उसके कारण कोई कष्ट ही नहीं होता कि रोगी आँख के डॉक्टर के पास जाए । इसीलिए गंभीर रेटिनोपैथी से बचने के लिए यह अनिवार्य है कि आँखों की समय से जाँच कराते रहें । कभी आँखों के आगे इधर-उधर भागते काले धब्बे दिखें या नजर में धुंधलापन आ जाए, तो यह समझ लें कि आँखों की खैर नहीं तुरंत नेत्र-विशेषज्ञ से परामर्श लें । डायबिटीज में आँखों की देखभाल के लिए जाँच के समय नेत्र-विशेषज्ञ न सिर्फ दूर और पास की नजर की जाँच करता है, बल्कि दोनों आँखों के दाब, पर्दे और दृष्टि-क्षेत्र की भी जाँच करता है । जरूरत पड़ने पर आँख के पर्दे की जीती-जागती तस्वीरें उतारने के लिए फ्लोरोसिन एंजियोग्राफी भी की जाती है । इसके लिए बाँह की शिरा में कंट्रास्ट दवा का टीका दिया जाता है । दवा कुछ ही समय में आँख की रक्त-वाहिकाओं में पहुँच जाती है । उसी समय एक खास कैमरे से आँख के पर्दे के चित्र उतार लिये जाते हैं । इस जाँच के बाद अगले दो-तीन दिनों के लिए त्वचा में हल्का पीलापन और मूत्र की रंगत में गाढ़ापन रहता है । इससे परेशान नहीं होना चाहिए ।

रेटिनोपैथी का इलाज

डायबिटीज में आँखों की देखभाल में रेटिनोपैथी के इलाज में दवाओं की उपयोगिता सीमित होती है । हाँ, विटामिन-सी, फ्लेविनॉयड यौगिक और कैल्शियम डोबिसिलेट लेने से सूक्ष्म रक्त-वाहिकाएँ थोड़ी मजबूत बन सकती हैं । रोजाना एस्प्रिन लेने से भी लाभ पहुँचता है खून का गाढ़ापन कम हो जाता है, जिससे खून में थक्के बनने की क्रिया थम जाती है । पर्दे में आ चुके रेटिनोपैथी के दुष्परिवर्तनों को दवाओं से दूर नहीं किया जा सकता । इनसे निपटने के लिए उपयुक्त मामलों में फोटो को एगुलेशन किया जाता है । लेजर की शक्तिशाली किरणों या जेनोन आर्क की मदद से पर्दे की कमजोर हुई रक्त-वाहिकाओं पर ताला कस दिया जाता है ताकि उनसे आगे खून न बहे और नई वाहिकाएँ न फूटें । इससे रोग आगे नहीं बढ़ता, लेकिन नजर में सुधार आए, यह जरूरी नहीं । विट्रियस में यदि खून उतर आता है, तो छः महीने तक इंतजार करते हैं कि यह अपने से साफ हो जाए । फिर भी यदि यह साफ नहीं होता, तो डायबिटीज में आँखों की देखभाल के लिए विट्रेक्टमी ऑपरेशन किया जाता है । इसमें एक पेंसिलनुमा यंत्र से रक्तरंजित विट्रियस बाहर खींच लिया जाता है । कामयाब ऑपरेशन के बाद रोशनी फिर से पर्दे तक पहुँचने लगती है और दृष्टि वापस लौट आती है ।

डायबिटीज का आँखों के लेंस पर प्रभाव

डायबिटीज में आँखों की देखभाल की बात करें तो आँख की फोकसीय प्रणाली का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा लेंस है । तारामंडल के ठीक पीछे, महीन तंतु पेशियों से बँधे रहकर यह खूब काम करता है । स्वस्थ लेंस द्रव अवस्था में होता है और आवश्यकतानुसार पल-पल अपना आकार बदलता रहता है । पास की चीजें देखनी हों, तो यह मोटा हो जाता है और दूर की चीजें देखनी हों तो पतला । इसी से बाहर से आ रही रोशनी की किरणें रेटिना पर केंद्रित हो पाती हैं । पर ब्लड शुगर के अधिक घटने-बढ़ने से लेंस अछूता नहीं रह पाता है । उसके ऊतकों का घनत्व बार-बार बदलता रहता है, जिससे उसका फोकस भी तब्दील होता रहता है । नतीजतन साफ देखने के लिए चश्मे का नंबर बार-बार बदलना पड़ता है । कुछ लोगों में डायबिटीज का पता ही इस प्रकार चलता है । बढ़ी हुई शुगर को नियंत्रण में लाने के लिए जब दवा शुरू करते हैं, उस समय पहले चार-छह हफ्तों में लेंस की वक्रता में प्रायः ही परिवर्तन आते हैं ।डायबिटीज में आँखों की देखभाल के लिए जब तक सुधार हुए कुछ दिन न बीत जाएँ, चश्मे का नया नंबर लेने में हड़बड़ी नहीं दिखानी चाहिए ।

डायबिटीज में मोतियाबिंद

डायबिटीज में आँखों की देखभाल की बात हो रही हो तो मोतियाबिंद की बात होना स्वभाविक है डायबिटीज में दो तरह का मोतियाबिंद हो सकता है । एक साधारण मोतियाबिंद, जो उम्र बढ़ने के साथ तकरीबन हर आँख में उतर आता है । लेकिन डायबिटीज हो, तो यह अक्सर कुछ पहले ही, यानी कम उम्र में शुरू हो जाता है । जिन रोगियों की ब्लड शुगर ज्यादा घटती-बढ़ती रहती है, उनकी आँखों में मोतियाबिंद और भी जल्दी हो जाता है ।  डायबिटीज के कुछ रोगी ‘डायबिटिक केटरेक्ट से भी लेंस की पारदर्शिता गँवा बैठते हैं । उनकी आँख के लेंस में हिमवृष्टि जैसी आकृतियाँ उभर आती हैं । लगता है जैसे लेंस पर बर्फ के फोए जम गए हों । दोनों ही तरह के मोतियाबिंद का उपचार ऑपरेशन ही है । इस ऑपरेशन में धुंधला प्राकृतिक लेंस आँख से बाहर निकाल दिया जाता है और उसके स्थान पर कृत्रिम लेंस लगा दिया जाता है । यह ऑपरेशन करते समय दो बातों का खास ध्यान रखा जाता है : एक, कि ब्लड शुगर पूरे कंट्रोल में हो; और दो, कि आँख संक्रमण से बची रहे । डायबिटीज में आँखों की देखभाल में इसी पर ऑपरेशन की कामयाबी टिकी होती है ।

काला मोतिया और डायबिटीज:

डायबिटीज में आँखों की देखभाल का जिक्र करते वक्त काला मोतिया के बारे में जिक्र करना इसलिए जरुरी हो जाता है क्योंकि दूसरे लोगों की तुलना में डायबिटीज में काला मोतिया (ग्लूकोमा) की दर आठ गुना अधिक है । काला मोतिया होने पर आँख का भीतरी दाब बढ़ जाता है, जिससे आँख की दृष्टि तंत्रिका पर दबाव पड़ता है और वह सूख जाती है । जैसे-जैसे यह परिवर्तन होते हैं, आँख बेचारी अँधियारी होती जाती है ।  पुरानी डायबिटीज में पुतली के इर्द-गिर्द नई धमनियाँ फूटने से भी आँख का दाब बढ़ सकता है । इसे सेकेंडरी ग्लूकोमा कहते हैं । इसका आँख पर प्राइमरी ग्लूकोमा से भी अधिक गंभीर प्रभाव पड़ता है ।

काला मोतिया से बचाव और उपचार

डायबिटीज में आँखों की देखभाल के लिए आँख की नियमित रूप से जाँच होती रहे तो दाब बढ़ने का समय से पता लग सकता है । आरंभिक अवस्था में निदान होने से यह दाब दवाओं और लेजर की मदद से कंट्रोल किया जा सकता है । काला मोतिया के दृष्टि-घातक प्रभावों से बचने का यही एकमात्र उपाय है । डायबिटिक ग्लूकोमा के इलाज के लिए लेजर और विशिष्ट विट्रियो-रेटिनल सर्जरी की मदद ली जाती है । पर ध्यान रहे कि डायबिटीज में आँखों की देखभाल में लापरवाही या इलाज में जरा सी भी देरी आँख की ज्योति के लिए अभिशाप साबित हो सकती है ।

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