जी. आई. एफ. टी. अर्थात् गिफ्ट क्या है क्यों और कैसे किया जाता है

गिफ्ट Gamete Intra-Fallopian Transfer (GIFT) एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें अण्डे व शुक्राणु का मेल शरीर से बाहर कराया जाता है, फिर उस मिश्रण को इन्जेक्शन के माध्यम से डिम्बवाहिनी (fallopian tube) में भेज दिया जाता है, जहां फर्टिलाइजेशन होता है । यह विधि उस स्त्री के लिये उपयुक्त है, जिसकी कम से कम एक डिम्बवाहिनी स्वस्थ हो । इस विधि का लक्ष्य यही होता है कि फर्टिलाइजेशन सही स्थान पर हो व implantation सही वक्त पर हो ।

गिफ्ट

गिफ्ट (GIFT) की सलाह कब और किन्हें डी जाती है?

अब प्रश्न यह उठता है कि किन दम्पत्तियों को नि:संतानता का उपचार करने के लिए गिफ्ट नामक इस विधि की सलाह दी जाती है?  तो आइये जानते हैं ऐसी परिस्थितियों के बारे में जब चिकित्सक द्वारा दम्पति को संतान प्राप्ति के लिए गिफ्ट की सलाह दी जा सकती है |

जब कोई दम्पत्ति unexplained infertility की स्थिति से गुजर रहे हों :

जब कोई दम्पत्ति विवाह के एक वर्ष तक परिवार नियोजन के साधनों का प्रयोग न करते हुए संभोग करते हैं व स्त्री गर्भधारण नहीं कर पाती है और सारी जांच के बाद भी इनफर्टिलिटी का कोई कारण सामने नहीं आता है । तो ऐसी स्थिति को unexplained infertility कहते हैं । जिन दम्पतियों में यह होती है उन्हें गिफ्ट (Gamete intra-fallopian transfer ) की सलाह डी जा सकती है |   ऐसे दम्पत्तियों की संख्या 10 से 15 प्रतिशत होती है । इसका कारण तो ज्ञात नहीं है, परन्तु इस विषय में पति-पत्नी दोनों की हुई जांचों से कुछ कारण सामने आये हैं, जो निम्नलिखित हैं |

  • fimbriae में खराबी होती है, जिसके कारण वे डिम्बोत्सर्ग के समय अण्डे को ग्रहण नहीं कर पाते हैं ।
  • शुक्राणु में फर्टिलाइज करने की क्षमता में कमी होती है ।
  • एण्डोमेट्रियम में कमी होती है, जिसके कारण भूण implant नहीं हो पाता है ।
  • Luteinized unruptured follicle syndrome के कारण follicle rupture नहीं हो पाता है व अण्डा बाहर नहीं निकल पाता है ।
  • उपर्युक्त कारणों के अलावा कुछ मनोवैज्ञानिक कारण भी होते हैं ।

जब किसी स्त्री को प्रारंभिक endometriosis हो :

एण्डोमेट्रियोसिस एक ऐसी बीमारी है, जिसमें गर्भाशय की परत अथवा एण्डोमेट्रियम के टिशू गर्भाशय के बाहर विकसित हो जाते हैं व पेट की कैविटी में अन्य अंगों ovaries, tubes, pelvis, bowels, bladder आदि में से जुड़ जाते हैं । जिन स्त्रियों को एण्डोमेट्रियोसिस होता है, उनमें ये टिशू मासिक के समय एण्डोमेट्रियम की भांति ही हारमोन के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं । जैसे एण्डोमेट्रियम मासिक के रूप में गिरकर बाहर निकल जाती है, उसी प्रकार की प्रतिक्रिया एण्डोमेट्रियोसिस के ये टिशू भी करते हैं, परन्तु ये गर्भाशय से बाहर होते हैं । अतः इन्हें बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलता है और ये जम जाते हैं । इन्हें chocolate cysts भी कहते हैं । यह 30 से 40 वर्ष की आयु के बीच होते हैं । कभी-कभी ये 30 वर्ष से पहले भी हो सकते हैं । कुछ स्त्रियों में इसके कारण मासिक के समय भारी रक्तस्राव होता है, दर्द होता है व संभोग के दौरान व उसके बाद भी दर्द हो सकता है, परन्तु कुछ स्त्रियों में कोई भी लक्षण नहीं दिखाई देता है । ऐसी स्त्रियां जिन्हें यह बीमारी कम होती है, वे अधिकांशत: गर्भवती हो सकती हैं, परंतु यदि यह बीमारी बहुत बढ़ जाती है, तो यह इनफर्टिलिटी का कारण बन सकती है । इसके निदान के लिये सर्वाधिक प्रभावी विधि लैप्रोस्कोपी है । अल्ट्रासाउण्ड कैट स्कैनिंग व एम. आर. आई. का भी प्रयोग किया जा सकता है, परंतु ये विधियां एण्डोमेट्रियोसिस के निदान के लिये उपयुक्त नहीं हैं । यह बीमारी 4 से 8 प्रतिशत स्त्रियों में पायी जाती है । इसके कारण अज्ञात ही हैं, फिर भी यह माना जाता है कि मासिक के समय एण्डोमेट्रियम के कुछ टिशू fallopian tubes से बाहर पेट की कैविटी की ओर निकल जाते हैं व वहां विकसित होने लगते हैं, जिस कारण यह बीमारी विकसित होती है । इसलिए जिस महिला को यह बीमारी हो उसे संतान प्राप्ति के लिए गिफ्ट (Gamete intra-fallopian transfer) की सलाह चिकित्सक द्वारा डी जा सकती है |

जब पुरुष को इनफर्टिलिटी की समस्या हो :

जब किसी पुरुष में पिता बनने की क्षमता नहीं होती है, तो उसे पुरूष की इनफर्टिलिटी कहते हैं । जिनमे यह समस्या हो उन्हें भी गिफ्ट (Gamete intra-fallopian transfer ) की सलाह दी जा सकती है | यह पुरुष की नपुंसकता से भी संबंधित हो सकती है । कई ऐसे पुरुषों का सेक्स जीवन पूर्णत: सामान्य व सुखद होता है । पुरुषों की इनफर्टिलिटी मुख्यत: चार प्रकार की हो सकती है ।

  1. इसमें शुक्राणु नहीं बनते हैं । इसे azoospermia कहते हैं । पुरुषों में इस प्रकार की इनफर्टिलिटी लगभग 3 से 4 प्रतिशत होती है ।
  2. शुक्राणु की मात्रा अच्छी नहीं होती है, जिसे oligospermia कहते हैं अथवा शुक्राणु की गतिशीलता कम होती है, जिसे asthenozoospermia कहते हैं अथवा असामान्य शुक्राणुओं का प्रतिशत अधिक होता है, जिसे teratozoospermia कहते हैं । इस प्रकार की इनफर्टिलिटी लगभग 90 प्रतिशत होती है ।
  3. जहां वीर्य की जांच तो सामान्य होती है, परन्तु शुक्राणु की फर्टिलाइज करने की क्षमता कम होती है, जिससे या तो IVF में फर्टिलाइजेशन नहीं हो पाता है या फिर अच्छा फर्टिलाइजेशन नहीं होता है । पुरुषों में इस प्रकार की इनफर्टिलिटी लगभग 3 से 6 प्रतिशत होती है ।
  4. जब योनि में स्खलन (ejaculation) नहीं हो पाता है । पुरुषों में इस प्रकार की इनफर्टिलिटी लगभग 4 से 6 प्रतिशत होती है ।

जो पुरुष इनफर्टिलिटी की स्थिति से गुजर रहे होते हैं, उनके शरीर से कोई ऐसा लक्षण नहीं दिखाई देता है, जो इनफर्टिलिटी का कारण हो सकता हो, परन्तु कभी-कभी शरीर व चेहरे के बाल, उभरी हुई छाती, छोटे अण्डकोष आदि से असामान्यता दिखाई देती है ।

पुरुष की इनफर्टिलिटी के कारण:

पुरुष की इनफर्टिलिटी के मुख्य कारण निम्न हैं |

स्खलन में शुक्राणुओं का न होना :

ऐसी स्थिति में या तो अण्डकोष शुक्राणुओं का निर्माण नहीं करते हैं या फिर अण्डकोष शुक्राणुओं का निर्माण तो करते हैं, परन्तु vas deferens या तो अवरुद्ध होता है या ठीक से विकसित नहीं होता है । अतः स्खलन में शुक्राणु नहीं होते हैं । कई पुरुषों में, जिनमें अण्डकोष शुक्राणुओं का निर्माण नहीं करते हैं, उनमें कोई स्पष्ट कारण तो नहीं होता है, परन्तु अण्डकोष में ट्रोमा का इतिहास होता है अथवा किशोरावस्था के बाद severe mumps infection होता है या पिट्यूटरी ग्रंथि पर्याप्त मात्रा में हारमोन नहीं बनाती है । कैंसर के लिये प्रयुक्त कीमोथैरेपीरेडियोथैरेपी भी अण्डकोषों को क्षति पहुंचा सकती है । जैनेटिक कमी, जैसे- क्रोमोसोम संबंधी असामान्यतायें Klinefelter’s syndrome व Y क्रोमोसोम की कमी भी स्खलन में शुक्राणु की कमी का कारण बन सकते हैं ।

शुक्राणुओं की मात्रा व गुणों की कमी :

यह कई कारणों से हो सकता है, जैसे हॉरमोन की कमी, अण्डकोषों के आस-पास रक्त वाहिकाओं में असामान्य सूजन, इन्फेक्शन, antidepressants, antihypertensive drugs, anabolic steroids, social drugs जैसे- कोकेन, धूमपान व अल्कोहल आदि । अधिक देर तक गर्म पानी से नहाने से भी शुक्राणुओं की मात्रा में कमी हो सकती है । अण्डकोषों के कैंसर भी शुक्राणुओं के उत्पादन को प्रभावित करता है ।

शुक्राणुओं में फर्टिलाइजेशन की क्षमता न होना :

यह क्रोमोसोम में कमी होने के कारण होता है । शुक्राणुओं के असामान्य lateral head movements के कारण भी ऐसा होता है ।

 योनि में स्खलन करने की क्षमता न होना :

ऐसा नपुंसकता के कारण होता है, जिससे जल्दी ही स्खलन हो जाता है व योनि से बाहर ही स्खलन हो जाता है, योनि में स्खलन नहीं हो पाता है ।

ऐसे दम्पत्ति जिन्हें donor insemination से कोई लाभ न हुआ हो :

donor insemination अथवा Artificial insemination में शुक्राणुओं को कृत्रिम तरीके से स्त्री के गर्भाशय में डाला जाता है । इस प्रक्रिया का लाभ जिन्हें नहीं होता है उन्हें गिफ्ट (Gamete Intra-Fallopian Transfer) कराने की सलाह डी जा सकती है | लेकिन donor insemination की सलाह निम्नलिखित लोगों को दी जाती है

  • जो पुरुष योनि में स्खलन में अक्षम होते हैं ।
  • जिन पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या कम होती है ।
  • कुछ पुरुष भविष्य के लिये शुक्राणुओं को फ्रीज कराते हैं ।
  • यदि स्त्रियों में कुछ मात्रा में एण्डोमेट्रियोसिस होता है ।
  • जिन स्त्रियों में सर्विकल म्यूकस होस्टाइल होता है ।
  • जिन दम्पत्तियों की unexplained infertility होती है ।
  • जिन दम्पत्तियों में पति का एच. आई. वी. पॉजिटिव होता है व पत्नी का निगेटिव होता है, उनमें पति के शुक्राणुओं को वॉश करके intrauterine insemination किया जाता है ।

गिफ्ट (Gamete Intra-Fallopian Transfer) कैसे किया जाता है :

गिफ्ट (Gamete Intra-Fallopian Transfer) एक सर्जरी की प्रक्रिया है, जिसमें जनरल एनेस्थीसिया दिया जाता है । इसमें पेट में तीन छोटे कट लगाये जाते हैं । ओवरी को उत्तेजित करने के लिये फर्टिलिटी ड्रग्स दिये जाते हैं । IVF की भांति ही मॉनिटर किया जाता है । अण्डों को vaginal ultrasound scan अथवा laparoscopy से fine needle व gentle Suction के द्वारा एकत्र किया जाता है । जब अण्डों को एकत्र किया जाता है, तब माइक्रोस्कोप द्वारा उनकी गुणवत्ता की जांच की जाती है । उसके बाद सबसे अच्छे अण्डों को वॉश किये गये शुक्राणुओं के साथ मिलाया जाता है । इस मिश्रण को लैप्रोस्कोप द्वारा देखते हुए fine plastic catheter की सहायता से एक अथवा दोनों डिम्बवाहिनियों में डाला जाता है । गिफ्ट नामक इस  प्रक्रिया को सरल बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं । अण्डों को vaginal ultrasound द्वारा एकत्र किया जाता है व अण्डे और शुक्राणु के मिश्रण को विशेष नली (catheter) की सहायता से सर्विक्स के द्वारा डिम्बवाहिनी में भेजा जाता है । गिफ्ट के बाद भूण के implantation के लिये मरीज को हारमोन के सप्लीमेन्ट, दवा, इन्जेक्शन, जैल आदि के माध्यम से दिये जाते हैं । गिफ्ट की सफलता की दर लगभग 24.5% होती है ।

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