स्तनपान के लाभ महत्वता एवं इससे जुड़े सवाल जवाब

एक मां के जीवन में स्तनपान यानिकी Breast Feeding वहुत सुखद व गौरवमय अनुभव होता है । आम तौर पर देखा जाय तो यह बच्चे का जन्मसिद्ध अधिकार होने के साथ साथ प्रकृति द्वारा प्रदत्त एक प्रक्रिया है, जो प्रकृति द्वारा नवजात शिशु के पोषण व उसकी सुरक्षा के लिये बनायी गयी है । यद्यपि स्तनपान एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, परन्तु इसे सीखा भी जा सकता है । धैर्य व अभ्यास इसे एक सफल प्रक्रिया बना सकते हैं । कहने का आशय यह है की जब महिला अपने बच्चे को जन्म देने की तैयारी कर रही होती हैं, तभी उसके पोषण, सुरक्षा व अच्छे स्वास्थ्य के लिये स्तनपान के लिये स्वयं को तैयार भी  कर सकती हैं । यदि इस विषय में महिला को कोई शंका हो अथवा उसके मन में इससे संबंधित सवाल हों, तो उन्हें वह अपने डाक्टर से पूछ कर उनका समाधान कर सकती हैं । महिला चाहे तो ऐसी महिलाओं से भी जानकारी प्राप्त कर सकती हैं, जो अपने बच्चे को स्तनपान करा रही हों अथवा करा चुकी हों ।

स्तनपान

पूरा आर्टिकल (लेख) एक नज़र में.

स्तनपान के लाभ (Benefits of Breast Feeding in Hindi):

ब्रैस्ट फीडिंग के कुछ मुख्य लाभों की लिस्ट इस प्रकार से है | इन मुख्य लाभों को हम दो वर्गों बच्चे को होने वाले लाभ एवं माँ को होने वाले लाभों में बाँट सकते हैं |

बच्चे को होने वाले लाभ:

  • स्तनपान एक पूर्ण आहार है, जो जन्म से छ: माह तक बच्चे की सारे पोषक तत्वों की आवश्यकताओं को पूरा करता है । यह आसानी से हजम हो जाता है । स्तनपान करने वाले बच्चों को छ: माह की आयु तक विटामिन आदि के सप्लीमेन्ट की आवश्यकता नहीं होती है ।
  • मां के दूध में कई एन्टीबॉडीज होते हैं, जो बच्चे को कई बीमारियों जैसे डायरिया इत्यादि से बचाते हैं ।
  • स्तनपान करने वाले बच्चों में एलर्जी जैसे अस्थमा, एक्जीमा आदि बीमारियां अपेक्षाकृत कम पायी जाती हैं ।
  • माँ का दूध पीने वाले बच्चे भावात्मक रूप से सुरक्षित अनुभव करते हैं व मां व बच्चे के बीच एक भावात्मक सूत्र रहता है ।
  • माँ के दूध में मिलावट आदि का खतरा नहीं रहता है ।
  • माँ के दूध से बच्चे को immunological benefits प्राप्त होते हैं, जिससे दूध पीने वाला बच्चा टीकों आदि के प्रति अपेक्षाकृत सुरक्षात्मक प्रतिक्रिया अपनाता है ।
  • जो बच्चे माँ का दूध पीते हैं, उन्हें बड़े होकर मधुमेह, मोटापे, उच्च रक्तचाप, हृदयरोग व कैंसर कम होते हैं ।
  • माँ का दूध पीने वाले बच्चे अधिक तेज होते हैं व उनकी आई. क्यू. भी अधिक होती है ।

माँ को होने वाले लाभ:

  • बच्चे को दूध पिलाने से यानिकी स्तनपान के दौरान oxytocin बनता है, जो गर्भाशय को अपने आकार में आने में सहायता करता है ।
  • बच्चे को दूध पिलाने से डिम्बोत्सर्ग देर से होता है, इसलिये मासिक भी देर से आता है, जिससे दो बच्चों के बीच में प्राकृतिक रूप से अंतर रखने में आसानी होती है ।
  • जो स्त्रियां बच्चे को दूध पिलाती हैं , उनमें स्तन व डिम्बग्रंथि के कैंसर का खतरा कम होता है ।
  • मां का दूध सदैव उपलब्ध रहता है । इसमें कम समय लगता है । इसके लिये बॉटल धोने, उसे साफ करने इत्यादि की आवश्यकता नहीं पड़ती है ।
  • बाज़ार से दूध खरीदने में पैसे लगते हैं जबकि माँ का दूध उसके शरीर में ही उत्पन्न होता है इसलिए यह आर्थिक दृष्टि से भी लाभदायी है ।
  • कई स्त्रियों को यह गलतफहमी रहती है कि स्तनपान से शरीर की बनावट खराब हो जाती है । यह एक गलतफहमी ही है | सच्चाई यह है की बच्चे को दूध पिलाने से शरीर को पहले की स्थिति में लाने में सहायता मिलती है ।

स्तनों में दूध बनने की प्रक्रिया:

स्तन मुख्यत: ग्रंथियां हैं । इनके अंदर छोटी-छोटी थैलियां (sacs) होती हैं, जिनके अंदर दूध उत्पन्न करने वाली कोशिकायें होती हैं । ये थैलियां lobes के रूप में एकत्र रहती हैं । प्रत्येक lobe में एक duct होता है, जो nipples में दूध पहुंचाने का कार्य करता है । गर्भावस्था में आपका शरीर आपके बच्चे के लिये दूध बनाने की तैयारी करता है, आप स्तनपान कराना चाहें अथवा नहीं, इसका कोई प्रभाव दूध बनने की प्रक्रिया पर नहीं पड़ता है । आपका स्तन आकार व वजन में धीर-धीरे बढ़ता जाता है । उनका वजन एक से डेढ़ पौण्ड तक बढ़ता है । आपके nipples भी अधिक फैल जाते हैं व उनका रंग भी अधिक गाढ़ा हो जाता है । स्तनों को रक्त पहुंचाने वाली नसे भी बढ़ जाती है व अधिक उभरी हुई दिखाई देती हैं । गर्भावस्था के चौथे अथवा पांचवें महीने में, कुछ स्त्रियों में इसके पश्चात् स्तनों में से थोडा (colostrum) का स्राव प्रारंभ हो जाता है । कोलस्ट्रम (colostrum) गाढ़ा पारदर्शी अथवा नारंगी या पीला तरल पदार्थ होता है । शिशु के जन्म के उपरान्त मां के स्तन से निकलने वाला यह प्रथम दूध है, जिससे दूध उत्पादन की प्रक्रिया प्रारंभ होती है । जैसे ही शिशु जन्म होता है व बच्चे की गर्भनाल placenta बाहर निकल जाती है, तब महिला के शरीर से एक हारमोन निकलता है, जो स्तनों को दूध उत्पन्न करने के संकेत प्रदान करता है । Colostrum में प्रोटीन व अन्य ऐसे पदार्थ होते हैं, जो बच्चे को पोषण प्रदान करते हैं व एन्टीबॉडी के समान बच्चे की रोग प्रतिशोधक क्षमता को बढ़ाते हैं व उसे इन्फेक्शन से बचाते हैं ।

स्तनपान की महत्वता (Importance of Breast Feeding in Hindi)

शिशु के लिये मां का दूध सर्वाधिक संतुलित आहार होता है । इसमें बच्चे की आवश्यकतानुसार सभी पोषक तत्त्व उचित मात्रा में होते हैं । इसे बच्चे का पाचन तंत्र बहुत आसानी से स्वीकार कर लेता है । मां के दूध में मौजूद एण्टीबॉडीज बच्चे को बीमारी व इन्फेक्शन से बचाते हैं । स्तनपान विशेषकर उन बच्चों के लिये बहुत उपयोगी होता है, जो समय से पूर्व जन्मते हैं अथवा जो कमजोर होते हैं । यदि बच्चा माँ का दूध पीने योग्य ना हों अर्थात कमजोरी की वजह से  बच्चा स्तनों को नहीं चूस पा रहा हो, तो महिला दूध को पम्प की सहायता से अथवा स्तन को दबाकर निकाल सकती हैं व उसे एकत्र कर ट्यूब की सहायता से बच्चे को दे सकती हैं । इसे एकत्र करके बाद में भी प्रयोग किया जा सकता है, परन्तु इसे रखने के लिये अपने डॉक्टर अथवा लैक्टेशन विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लेनी चाहिए । स्तनपान मां के लिये भी उपयोगी है, क्योंकि जब बच्चा स्तनों को चूसता है तब ऐसा हारमोन उत्पन्न होता है, जो गर्भाशय को अपने पुराने आकार में लाने में सहायता करता है व गर्भाशय धीरे-धीरे सिकुड़ता है । जो स्त्रियां बच्चे को दूध पिलाती हैं, उनका वजन अपेक्षाकृत जल्दी कम होता है | बच्चे को दूध पिलाने की प्रक्रिया एक  ऐसी प्रक्रिया है, जो मां व बच्चे के बीच एक अनूठा रिश्ता कायम करती है । प्रत्येक स्त्री अपने बच्चे का जन्म होते ही उसे स्तनपान कराने व पोषण देने योग्य हो जाती है |

स्तनपान सम्बन्धी सवाल जवाब (FAQ on Breast Feeding)

स्तनपान के संबंध में कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो प्राय: स्त्रियों के मन में उठते रहते हैं । इसलिए इस लेख के माध्यम से उनके बारे में बात करना बेहद जरुरी हो गया है तो आइये जानते हैं ऐसे कौन कौन से सवाल हैं जो महिलाओं के मन में अक्सर इस सम्बन्ध में उठते रहते हैं |

सवाल : क्या स्तनों का आकार छोटे होने का प्रभाव स्तनपान पर पड़ता है? :

जवाब: स्तनों के आकार का स्तनपान पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है । स्तनों में दुग्ध का निर्माण स्तनों के आकार व आकृति पर कतई निर्भर नहीं करता है ।

सवाल: यदि पिछले प्रसव के बाद स्तनपान न कराया हो, तो क्या अगली बार यह संभव है? :

जवाब: यदि आप इससे पूर्व भी बच्चे को जन्म दे चुकी हैं व पिछली बार आपने बच्चे को दूध  नहीं पिलाया था, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि आप इस बार भी स्तनपान नहीं करा सकती हैं । इसी प्रकार यदि आपने पिछली बार बच्चे को अपने स्तनों का दूध पिलाने का प्रयास किया हो पर आप कराने में सफल नहीं हुई, तो भी इसका अर्थ यह नहीं कि इस बार भी आप नहीं करा सकेंगी । अपने अनुभव के विषय में आप अपने डॉक्टर, लैक्टेशन कन्सल्टेन्ट तथा अन्य माताएं जो अपने बच्चों को दूध पिलाती हैं से इस संबंध में चर्चा करें व उनके विचार जानें व अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करें । कई बार दूध पिलाने की विधि में कुछ परिवर्तन करने से भी सफलता मिल जाती है । यद्यपि यह प्राकृतिक प्रक्रिया है, फिर भी इसमें सीखना व अभ्यास करना महत्वपूर्ण होता है ।

सवाल: क्या स्तनपान से स्तनों का आकार खराब हो जाता है ? :

जवाब: प्राय: यह धारणा रहती है कि बच्चे को स्तनों से दूध पिलाने से स्तनों का आकार व सौंदर्य खराब हो जाता है तथा वे नीचे की ओर लटक जाते हैं । यह धारणा सही नहीं है । सच तो यह है कि गर्भा वस्था से ही महिला के स्तनों की बनावट में परिवर्तन आ जाता है । प्रत्येक गर्भावस्था बच्चे के पोषण के लिये और दूध के निर्माण के लिये स्तनों को विकसित करती है व उनके आकार को बढ़ा देती है । स्तनों के आकार में यह परिवर्तन होना स्वाभाविक होता है । इसलिए कोई महिला अपने बच्चे को स्तनों से दूध पिलाती है या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है । गर्भावस्था के दौरान स्तनों का वजन व आकार बढ़ जाता है, अत: वजन बढ़ने के कारण ही ये नीचे की ओर खिंचते हैं । अच्छी व सुविधाजनक ब्रा पहनने से महिलाओं को इस स्थिति में आराम होता है ।

सवाल: स्तनपान के लिये अपने निप्पलों को किस प्रकार तैयार करें ? :

जवाब: महिला के स्तनों के निप्पल का आकार व उनकी बनावट का स्तनपान से कोई संबंध नहीं है । जिन स्त्रियों का वक्षस्थल उभरा हुआ नहीं होता है व उनके निप्पल अंदर की ओर दबे हुए होते हैं, वे भी अपने शिशु को स्तनों से दूध पिला सकती हैं । स्तनों को दूध पिलाने हेतु तैयार करने के लिये कई विधियां हैं । इसके लिये आप गर्भावस्था के अंतिम माह में यदि प्लास्टिक के breast shells पहनें, तो यह निप्पल को उभारते हैं, परन्तु यदि आपके निप्पल पहले ही उभरे हुए हैं, तो इन्हें पहनने की आवश्यकता नहीं है ।

सवाल: स्तनपान कब व किस मात्रा में करायें ? :

जवाब: प्रसव के बाद जितना जल्दी संभव हो स्तनपान कराना अच्छा होता है, परन्तु इसके लिये आवश्यक है कि आपका बच्चा जगा हुआ हो सक्रिय हो व स्तनों से दूध पीने में सक्षम हो । बच्चे को जल्दी दूध पिलाने से स्तन के अत्यधिक भरे होने (breast enqorgement) की स्थिति व असुविधा  से बचा जा सकता है । साथ ही बच्चे को भी कोलस्टम का अधिकाधिक लाभ मिल सकता है । कोलस्टम वह पहला दुग्ध है, जो प्रसव के बाद निकलता है व पोषक तत्त्वों व एन्टीबॉडीस से परिपूर्ण होता है । जन्म के 24 घंटे के भीतर बच्चे को प्रत्येक बार प्रत्येक स्तन से कम से कम 5 मिनट तक स्तनों से दूध पिलाना चाहिये । इस समय को धीरे-धीरे तब तक बढ़ाएं जब तक यह 15 मिनट अथवा उससे अधिक ना पहुंच जाये । अधिकतर दूध तो बच्चा 5 से 10 मिनट में ही पी लेता है, बाकी समय में वो स्तन को मुंह में लिये रहता है, वह ऐसा करना चाहता है । इस बारे में सभी बच्चे अलग होते हैं । व अपना अलग-अलग पैटर्न बना लेते हैं । इसलिये अपने बच्चे पर ध्यान दें न कि केवल घडी पर | कुछ बच्चे प्रति 4 घंटे में दूध पीना पसंद करते है व कुछ एक या डेढ़ घंटे के बाद, विशेषकर ऐसा जन्म के कुछ सप्ताह तक होता है । यदि आपको यह चिन्ता है कि आपका बच्चा पर्याप्त मात्रा में दूध पी रहा है । अथवा नहीं, तो आप इस संबंध में बच्चे के डॉक्टर से संपर्क करें, क्योंकि वे आपके बच्चे के विकास व उसके वजन आदि का रिकॉर्ड रखते है । अत: वे आपको बता सकते हैं कि बच्चे का विकास पर्याप्त रूप में हो रहा है अथवा नहीं । बच्चा पर्याप्त मात्रा में दूध ले रहा है कि नहीं, इसका अंदाजा आप इस बात से भी लगा सकती हैं कि बच्चा दिन में कितनी बार पेशाब करता है । यह संख्या 5-6 बार होनी चाहिये । एक बार बच्चा स्तनपान करने लगता है, तो फिर मां के लिये यह आसान हो जाता है । बोतल से दूध पीना उसके लिये स्तनों से दूध पीने से आसान होता है, क्योंकि उसके लिये उसे अधिक प्रयास नहीं करना पड़ता है । इसके अतिरिक्त यदि मां अधिक समय तक बच्चे को स्तनों से दूध नहीं पिलाती है, तो धीरे-धीरे स्तनों में दूध की मात्रा घटती जाती है । बच्चे के पोषण के लिये व उसे दूध पिलाने के लिये आप निम्नलिखित में से कोई भी एक तरीका अपना सकती हैं |

  • केवल अपना दूध पिलाना
  • कुछ समय तक जैसे 6 सप्ताह या तीन महीने तक अपना दूध पिलाना व उसके बाद बोतल का दूध
  • बारी-बारी से अपना दूध व बोतल का दूध
  • दिन में कुछ समय अपना दूध पिलाना व कुछ समय बोतल का दूध

यद्यपि देखा जाय तो आजकल डॉक्टर लोग केवल स्तनपान के ही पक्ष में रहते हैं । उनके विचार से मां का दूध ही बच्चे के लिये श्रेष्ठ है व पर्याप्त भी है माँ का दूध पीने के बाद बच्चे को बोतल के दूध की आवश्यकता नहीं होती है । साथ ही बोतल का दूध बच्चे के स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उसके लिये हानिकारक हो सकता है । अत: बच्चे को छ: माह तक अथवा कम से कम चार माह तक केवल मां का दूध पिलाना ही श्रेष्ठ है । डॉक्टर की राय के अनुसार चार माह तक बच्चे को मां के दूध के अतिरिक्त और किसी चीज की भी आवश्यकता नहीं होती है । यहां तक कि बच्चे को पानी की भी आवश्यकता नहीं होती है । मां का दूध उसकी सारी आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है । निम्नलिखित परिस्थितियों में बोतल का दूध दिया जा सकता है |

  • यदि बच्चा ऑपरेशन से हुआ हो और मां बच्चे को दूध पिलाने की स्थिति में ना हो ।
  • यदि मां के स्तनों में पर्याप्त दूध नहीं बनता हो या दूध उतर ही ना रहा हो ।
  • यदि बच्चा स्तनपान ना कर पा रहा हो ।

वर्तमान में मां के दूध को स्टोर करके भी रखा जा सकता है । यदि मां नौकरी करती है व उसे काम पर जाना हो, तो वह दूध को निकाल कर सुरक्षित करके रख सकती है । इसे फ्रिज में 72 घंटे तक रखा जा सकता है । आपके डॉक्टर आपको बच्चे को तब तक स्तनपान कराने की सलाह देते हैं, जब तक वह धीरे-धीरे कुछ ठोस पदार्थ लेने न लग जाये । यह अवस्था छ माह की होती है । आप उसके बाद भी बच्चे को अपना दूध पिलाना जारी रख सकती हैं, यह आपकी भावनाओं व आपके बच्चे की जरूरतों पर निर्भर करता है । जब आप अपना दूध छुड़ाना चाहती हैं, तो उसे अचानक न छुड़ाये, धीरे-धीरे छुड़ायें, क्योंकि अचानक माँ का दूध छुड़ाने का बच्चे पर विपरीत मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है व बच्चे में असुरक्षा की भावना आ जाती है । धीरे-धीरे, एक-एक फीडिंग को स्तनपान से बॉटल फीडिंग में परिवर्तित करें । इस कार्य में कई सप्ताह भी लग सकते हैं । आजकल डॉक्टर बॉटल फीडिंग के लिये भी मना करते हैं । ऐसी स्थिति में बच्चे को चम्मच से दूध पिलाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रहता है ।

सवाल: स्तनपान कब तक कराना चाहिये? :

जवाब:  जन्म से 4 से 6 माह तक स्तनपान आवश्यक होता है व उसका वजन सही तरह से बढ़ता है । माँ का दूध पीने वाले बच्चे को दस्त नहीं लगते व उसके वजन में पर्याप्त मात्रा में वृद्धि होती है । 4-6 माह के बाद बच्चे को अन्य आहार दिया जाता है, परन्तु कम से कम एक वर्ष की आयु तक बच्चे को माँ का दूध पिलाते रहना चाहिए | माँ का दूध इससे भी अधिक समय तक भी बच्चे को पिलाया जा सकता है, परन्तु बच्चे को दाल, सब्जी, फल अनाज द्वारा पर्याप्त पोषण भी मिलता रहे, यह सुनिश्चित कर लें ।

सवाल: क्या बीमार बच्चे को स्तनपान कराना चाहिये ? :

जवाब: बीमारी की स्थिति में बच्चे के लिये माँ का दूध एक आदर्श आहार है । कई बार बीमारी में बच्चा अन्य भोजन नहीं लेता है, पर माँ का दूध पीता है । यदि बच्चा सक्रिय व समर्थ है, तो उसे बीमारी में माँ का दूध पिलाते रहना चाहिए ।

सवाल : क्या मां की बीमारी में बच्चे को स्तनपान कराया जा सकता है ? :

जवाब:  मां की कई बीमारियों में बच्चे को दूध पिलाने में कोई परहेज नहीं होता है । मां के दूध में एण्टीबॉडीज होते हैं, जो बच्चे की रक्षा करते हैं । पीलिया होने पर भी मां स्तनपान करा सकती है । यदि मां अधिक बीमार है अथवा उसको कैंसर व एड्स जैसी बीमारियां हैं, तो स्तनपान वर्जित होता है । ऐसी स्थिति में बोतल से दूध पिलाना चाहिये ।

सवाल: स्तनपान कराने वाली मां को कौन सी दवाएं नहीं लेनी चाहिये ? :

जवाब: स्तनपान कराने वाली मां को उपशामक दवाएं (sedatives) नहीं लेनी चाहिये, इनसे बच्चा आलसी व निष्क्रिय हो जाता है ।

  • laxative आदि लेने से माँ का दूध पीने वाले बच्चे को डायरिया हो जाता है ।
  • यदि आप थायरॉयड की दवा ले रही हैं, तो बच्चे को अपना दूध पिलाने से पूर्व डॉक्टर की सलाह अवश्य लें ।
  • एण्टीबायटिक दवाएं लेने से भी बच्चे को डायरिया हो सकता है।
  • हृदय रोग की दवा लेने वाली स्त्रियों को भी बच्चे को अपना दूध पिलाने के लिये डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिये ।

स्तनपान के दौरान मां का आहार :

स्तनपान कराने वाली मां को सामान्य भोजन के अतिरिक्त भोजन की आवश्यकता होती है, जिससे उसके शरीर में बच्चे के लिये पर्याप्त मात्रा में दूध बन सके व बच्चे का उचित पोषण हो सके । उदाहरण के लिये बच्चे को अपना दूध पिलाने वाली स्त्री को कैल्शियम की अधिक आवश्यकता होती है, जो उसको  डेयरी उत्पादों से मिल सकती है । यदि महिला को डेयरी उत्पादों से एलर्जी इत्यादि है, तो अपने डॉक्टर से कैल्शियम के अन्य स्रोत पूछ सकती हैं । अपना दूध पिलाने वाली स्त्री को गर्भावस्था के दौरान अधिक पोषण की आवश्यकता होती है । बच्चे को दूध पिलाने के दौरान महिला को पूर्ण संतुलित आहार लेना चाहिये । अधिक पानी व तरल पदार्थ पीने चाहिये । अपना दूध पिलाने वाली माँ  को भारत में पारंपरिक रूप से कुछ लड्डू आदि दिये जाते हैं, जो दूध की मात्रा व पोषण को बढ़ाते हैं । एक दूध पिलाने वाली स्त्री को एक सामान्य स्त्री की अपेक्षा 500 अतिरिक्त कैलोरीज की आवश्यकता होती है । गर्भावस्था की भांति ही महिला को इस अवस्था में भी अपने भोजन पर विशेष ध्यान देना चाहिये । इस अवस्था में भी महिला को धूम्रपान अल्कोहल, अधिक निकोटीन, कैफीन व ड्रग्स आदि से बचना चाहिये ।

स्तनपान कराने वाली स्त्री को क्या नहीं खाना चाहिये? :

स्तनपान कराने वाली स्त्री को सामान्य भोजन करना चाहिये, परन्तु अधिक मिर्च-मसाला नहीं खाना चाहिये । किसी भी भोज्य पदार्थ का बहुत अधिक सेवन नहीं करना चाहिये । कुछ भोज्य पदार्थ जैसे उड़द की दाल, काबली चना, किडनी, बीन्स आदि एक दूध पिलाने वाली मां को नहीं खाने चाहिये । इससे बच्चे को गैस, दस्त आदि की परेशानी हो सकती है ।

स्तनपान के दौरान होने वाली समस्यायें (Common Problem During Breast Feeding):

स्तनपान कराने वाली स्त्रियों में कुछ समस्याओं का होना स्वाभाविक व सामान्य होता है । ये समस्यायें निम्नलिखित हैं |

  1. स्तनों में भारीपन (Breast engorgement) :

यदि आपका बच्चा अच्छी तरह आपके स्तनों में से पर्याप्त मात्रा में दूध नहीं निकाल पाता है, तो आपके स्तनों में भारीपन हो जाता है । स्तन कड़े हो जाते हैं व उनमें दर्द होता है । इस समस्या को निम्नलिखित प्रकार से दूर किया जा सकता है |

  • 24 घंटे में 8 से 12 बार बच्चे को दूध पिलायें ।
  • यदि डॉक्टर न कहें तो जन्म से कुछ सप्ताह तक बच्चे को अपना दूध पिलाने के अतिरक्त दूध, पानी आदि कुछ न दें ।
  • यदि बच्चा किसी समय दूध न पियें, तो स्तन को दबाकर दूध निकाल दें ।
  • माँ का दूध धीरे-धीरे छुड़ायें ।
  1. निप्पल में दर्द (Nipple soreness) :

बच्चे को अपना दूध पिलाने वाली स्त्रियों की दूसरी समस्या है, निप्पल में दर्द | थोडी मात्रा में यह समस्या हो, तो अपने आप ठीक हो जाती है । अधिक परेशानी हो तो अपने डॉक्टर से संपर्क करें ।

स्तनपान के दौरान सेक्स (Sex During Breast Feeding) :

जो स्त्रियां स्तनपान कराती हैं, वे प्रसव के पश्चात् अपना सेक्स जीवन अपेक्षाकृत शीघ्र प्रारंभ कर सकती हैं । प्रसव के पश्चात् योनि में रूखापन रहता है, जिस कारण सेक्स के दौरान तकलीफ होती है, परन्तु बच्चे को अपना दूध पिलाने वाली स्त्रियों में यह तकलीफ नहीं होती है । सामान्यत: ऐसी अवस्था में क्रीम व जैली आदि का प्रयोग भी किया जा सकता है । यह भी माना जाता है कि जो स्त्रियां बच्चे को अपना दूध पिलाती हैं, उन्हें गर्भ नहीं ठहरता है । यह सच है कि स्तनपान कराने वाली स्त्रियों में ओव्यूलेशन व मासिक देर से होता है । यद्यपि स्तनपान कराने वाली स्त्रियों के गर्भवती होने की संभावना कम होती है, तो भी इसे परिवार नियोजन का कारण मानकर निश्चिंत नहीं हो जाना चाहिये । स्तनपान के दौरान आप अपनी डॉक्टर की सलाह से परिवार नियोजन की दवा आदि ले सकती हैं । अत: माँ को बच्चे को दूध पिलाना माँ एवं बच्चे दोनों के लिये लाभदायक है । बच्चे के लिये यह सर्वाधिक पोषक व एण्टीबाडीज युक्त होता है, जिससे बच्चे को जल्दी इन्फेक्शन नहीं होता है । बच्चे को अपना दूध पिलाने वाली स्त्रियों में स्तन कैंसर व ओवरी के कैंसर की संभावना कम होती है । प्रसव के बाद स्तनपान आपकी कैलोरीज को बर्न करने व आपके वजन को कम करने में भी सहायक होता है ।

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