गर्भावस्था में पीलिया चर्बीदार लीवर एवं वायरल हेपेटाईटिस

यद्यपि पीलिया किसी को भी हो सकता है लेकिन गर्भावस्था में पीलिया होने पर माँ एवं शिशु दोनों को खतरा रहता है | इसलिए प्रेगनेंसी टिप्स नामक श्रेणी में यह जरुरी हो जाता है की आज हम इसके बारे में इस लेख के माध्यम से वार्तालाप करें, ताकि गर्भस्थ महिलाएं इस अवस्था से समय रहते अवगत एवं जागरूक हो सकें | गर्भावस्था में पीलिया नामक इस बीमारी को एक विशेष बीमारी Obstetric Cholestasis के नाम से जाना जाता है | यह बीमारी केवल गर्भवती महिलाओं को होती है और इसे Jaundice of pregnancy  यानिकी गर्भ का पीलिया भी कहते हैं ।

गर्भावस्था में पीलिया

गर्भावस्था में पीलिया के कारण (Cause of Obstetric Cholestasis hindi) :

हालांकि अभी तक Obstetric Cholestasis नामक इस जटिलता का सही कारणों का पता नहीं लगाया जा सका है | लेकिन इसके होने के कुछ संभावित कारणों की लिस्ट निम्नवत है |

  • दमे में कुछ बदलाव का होना इस रोग के होने का संभावित कारण है |
  • गर्भावस्था के दौरान Sex hormones में बढ़ोतरी भी इसका एक संभावित कारण है |
  • ऐसी महिलाएं जो Azathioprine दवा लेती हों को भी गर्भावस्था में पीलिया होने का खतरा रहता है |
  • Obstetric Cholestasis नामक इस बीमारी में लिवर से निकलनेवाले एंजाइम्स की मात्रा बढ़ जाती है और रक्त में Alkaline Phosphatise, Aminotransferase, Bilirubin एवं Bile salt का भी स्तर बढ़ जाता है |

Obstetric Cholestasis के लक्षण :

गर्भावस्था में पीलिया यानिकी Obstetric Cholestasis के मुख्य लक्षण इस प्रकार से हैं |

  • गर्भवती महिला को पूरे शरीर में खुजली होती है |
  • कभी कभी यह खुजली बहुत अधिक बढ़ जाती है |
  • खुजली के कारण गर्भवती महिला रातों को सो तक नहीं पाती है |
  • उपर्युक्त लक्षण दिखाई देने पर गर्भस्थ महिला को रक्त की जाँच जरुर करा लेनी चाहिए |
  • यह जांच बिलिरुविन (Bilirubin) और लिवर के अन्य एंजाइम नापे जाने के सम्बन्ध में होनी चाहिए ।
  • इस बीमारी का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर भी पड़ता है ।
  • समय पूर्व प्रसव या गर्भ में ही अचानक मौत होने की संभावना रहती है ।

Obstetric Cholestasis का ईलाज:

जहाँ तक Obstetric Cholestasis की ईलाज की बात है Ursedeoxycholic acid का सेवन खुजली कम करने में सहायक होता है | इसके अलावा बच्चे पर भी इसका प्रभाव लाभकारी होता है । अत्यधिक खुजली होने पर एंटीहिस्टामिन (Antihistamines) जैसे सेट्रिजिन इत्यादि खाने से और शरीर पर कालामाइन (Calamine) लोशन लगाने से आराम मिलता है । माँ एवं भ्रूण की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए समय पूर्व प्रसव करवाना ठीक रहता है ।

गर्भावस्था में पीलिया के लिए जिम्मेदार चर्बीदार लीवर (Acute fatty liver of pregnancy):

गर्भावस्था में पीलिया के रोग में सहायक यह भी गर्भावस्था में होनेवाली अत्यंत ही गंभीर जटिलता है, जो लिवर में गड़बड़ी के कारण होता है । इसका आक्रमण अचानक बिना किसी पूर्व लक्षण के हो जाता है और अधिकांशत: गर्भ के आखिरी तीन महीनों में होता है । माँ को एकाएक कमजोरी, बदन में दर्द, मिचली, उलटी, भूख की कमी, पेट में दर्द, पीलिया और उच्च रक्तचाप हो जाता है । रक्त में अल्बुमिन, कॉलेस्ट्रॉल और फिब्रीनोजेन की कमी हो जाती है । गुर्दे में खराबी आ सकती है और फेफड़े में पानी जमा हो सकता है । धमनियों में लाल रक्त कण टूटने लगते हैं और रक्त में शुगर का स्तर कम हो जाता है । गर्भावस्था में पीलिया का प्रकोप इतनी शीघ्रता से बढ़ता है कि माँ को लिवरजनित मानसिक अचेतनता (Hepatic encephalopathy) हो सकती है । रक्त में थक्का बनाने की शक्ति कम हो जाने के कारण अत्यधिक रक्तस्राव होने का डर रहता है । ये सभी गंभीर समस्याएँ हैं और माँ एवं बच्चे के लिए प्राणघाती हो सकती हैं । इस बीमारी की चिकित्सा गहन चिकित्सा कक्ष में होनी चाहिए तथा प्रसव के समय रक्त, फ्रेश प्रक्रोजन प्लाज्मा (FFP), क्रायोप्रेसिपिटेट एवं प्लेटलेट्स की व्यवस्था रहनी चाहिए । यदि माँ का मृत्यु से बचाव हो गया तो प्रसव के बाद एक सप्ताह के अंदर यह स्थिति अपने आप सुधरने लगती है और वह पूर्णरूपेण स्वस्थ हो जाती है ।

गर्भावस्था में पीलिया के लिए जिम्मेदार वायरल हेपेटाइटिस (Viral Hepatitis):

वायरल हेपेटाइटिस भी गर्भावस्था में पीलिया को जन्म देने में सहायक होते हैं | ये पाँच प्रकार के होते हैं हेपेटाइटिस A, B, C , D & E । हेपेटाइटिस के तीव्र आक्रमण में मिचली आना , उलटी आना, सिरदर्द, बुखार, पीलिया इत्यादि होता है | इस बीमारी में रक्त में बिलरुबिन एवं SGPT की मात्रा बढ़ जाती है | अत्यधिक वमन होता है और रक्त में शुगर की कमी हो जाती है । ऐसी स्थिति में माँ को अस्पताल में रखकर चिकित्सा होनी चाहिए । हेपेटाइटिस के वायरस मल-मूत्र एवं वमन के द्वारा फैलते हैं, अत: उन्हें छूने के पहले हाथों में दोहरे दास्ताने पहनना जरूरी है ।

हेपेटाइटिस A:

यह रोग संक्रमित भोजन या पानी लेने से होता है । इसकी रोकथाम के लिए हेपेटाइटिस A का टीका उपलब्ध है । इसके साथ इम्यूनोग्लोबुलिन का टीका भी पड़ता है ।

हेपेटाइटिस B :

गर्भावस्था में पीलिया में यह भी सहायक होता है, यह वायरस रक्त या रक्तजनित वस्तुओं से फैलता है । यदि किसी संक्रमित व्यक्ति का खून या संक्रमित सूई किसी सामान्य व्यक्ति के बदन में प्रवेश कर जाए तब वह व्यक्ति भी हेपेटाइटिस B का शिकार हो जाता है । Hepatitis B से संक्रमित महिला के भ्रूण को भी संक्रमित होने का खतरा होता है । 80 प्रतिशत रोगी स्वत: ठीक हो जाते हैं, शेष 20 प्रतिशत में यह बीमारी रह जाती है । भूख नहीं लगना, मिचली एवं उलटी इसके लक्षण हैं । पीड़ित व्यक्ति का वजन धीरे-धीरे कम होता जाता है । यह बीमारी गुर्दा, हृदय एवं तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर सकती है । यदि हेपेटाइटिस B शरीर में बहुत दिन तक रह जाए, तब लीवर में सिरोसिस (Cirrhosis) एवं कैंसर होने का खतरा रहता है । हेपेटाइटिस B का टीका उपलब्ध है, पर उसे गर्भावस्था में नहीं दिया जाता है । गर्भ-धारण के पहले ही हेपेटाइटिस B का टीका लग जाना उचित है । हेपेटाइटिस B से संक्रमित माँ जब शिशु को जन्म देती है, तब नवजात को तुरंत ही हेपेटाइटिस B का टीका एवं इम्यूनोग्लोबुलिन की सुई देनी चाहिए, ताकि वह संक्रमित नहीं हो । गर्भावस्था में कभी-कभी जरूरत के अनुसार लैमिवुडाइन एवं इम्यूनोग्लोबुलिन दिया जाता है । माँ के भोजन में कार्बोहाइड्रेट एवं प्रोटीन भी प्रचुर मात्रा में होना चाहिए ।

हेपेटाइटिस C :

यदि कोई सामान्य व्यक्ति किसी हेपेटाइटिस C से संक्रमित व्यक्ति के खून या शरीर के अन्य द्रव के संपर्क में आता है, तब उसे भी हेपेटाइटिस C होने का खतरा होता है और यह भी गर्भावस्था में पीलिया पैदा करने में सहायक होता है । गर्भस्थ शिशु अपनी माँ के द्वारा भी संक्रमित हो सकता है । संक्रमित व्यक्ति का इलाज दवाओं द्वारा किया जाता है । इसका टीका उपलब्ध नहीं है ।

हेपेटाइटिस E:

गर्भावस्था में पीलिया का यह भी एक मुख्य कारण है, यह बीमारी माँ के लिए बहुत ही घातक सिद्ध हो सकती है । यह संक्रमित भोजन या पानी के सेवन से होता है । माँ को प्रसवोपरांत अत्यधिक रक्तस्राव, मानसिक अचेतनता, किडनी खराब होना (Renal failure), खून में थक्के का नहीं बनना, संक्रमण एवं मृत्यु होने की संभावना रहती है । शिशु पर भी इसका गंभीर असर पड़ता है और गर्भपात, समय से पूर्व जन्म या गर्भ में ही भ्रूण की मृत्यु हो सकती है। इसमें शिशु मृत्यु-दर 20-70 प्रतिशत है और मातृ मृत्यु-दर 15-20 प्रतिशत है । हेपेटाइटिस ई से बचाव के लिए भोजन हमेशा हाथ धोकर ही करना चाहिए तथा पानी को उबालकर पीना उचित है ।

गर्भावस्था में पीलिया के लिए जिम्मेदार हेल्प सिंड्रोम:

प्री-इक्लैंपसिया की अनेक जटिलताओं में हेल्प सिंड्रोम भी एक गंभीर जटिलता है । इस सिंड्रोम में लिवर प्रभावित होने के कारण उससे निकलनेवाले एंजाइम की मात्रा बढ़ जाती है, रक्त में प्लेटलेट्स की संख्या कम हो जाती है और लाल रक्त कोशिकाएँ टूटने लगती हैं । मिचली, उलटी, पेट के ऊपरी हिस्से में बहुत दर्द, कमजोरी और बेचैनी इसके मुख्य लक्षण है । गर्भावस्था में पीलिया का यह भी एक कारण हो सकता है क्योंकि लिवर के कुप्रभावित होने के कारण रक्त में थक्का बनानेवाले तत्वों (Clotting factors) की कमी हो जाती है, जिससे माँ को अत्यधिक रक्तस्राव हो सकता है । चूँकि हेल्प सिंड्रोम तीव्र इक्लैंपसिया का लक्षण है और माँ के लिए अत्यंत खतरनाक होता है, अत: प्रसव शीघ्र कराना आवश्यक हो जाता है । प्रसव कराने के बाद ही माँ में सुधार की उम्मीद होती है । इस बीमारी में मातृ मृत्यु-दर 25 प्रतिशत तक है और शिशु मृत्यु-दर 5 से 60 प्रतिशत तक है ।

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