गर्भावस्था में किडनी में होने वाले परिवर्तन एवं बीमारियाँ

गर्भावस्था में किडनी की देखरेख की बात करें तो गर्भावस्था में गर्भाशय के बढ़ने तथा शिशु के विकास के कारण हृदय को लगभग 30-40 प्रतिशत ज्यादा काम करना पड़ता है, ठीक इसी प्रकार किडनी को भी 30-40 प्रतिशत ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है । गर्भावस्था के दौरान स्त्री का वजन 8-12 किलोग्राम बढ़ता है । इसलिए इस दौरान महिला के गुर्दों में भी परिवर्तन हो सकते हैं | तो आइये जानते हैं गर्भावस्था के दौरान गुर्दो में होने वाले परिवर्तनों के बारे में ।

गर्भावस्था में किडनी

गर्भावस्था में किडनी में होने वाले परिवर्तन:

गर्भावस्था में किडनी में होने वाले कुछ प्रमुख परिवर्तनों की लिस्ट इस प्रकार से है |

  • गर्भावस्था में गुर्दो का आकार एवं वजन बढ़ता है तथा इसकी लम्बाई एक सेंटीमीटर तक बढ़ सकती है ।
  • मूत्रवाहिनी (यूरेटर) के निचले अंश पर गर्भाशय का दबाव पड़ने के कारण इसका ऊपरी अंश तथा गुर्दो के मूत्रग्राही भाग (कलेक्टिंग सिस्टम) में फैलाव आ सकता है ।
  • मूत्र में शुगर एवं एल्ब्युमिन का अत्यधिक क्षय हो सकता है । जिसे ग्लाइकोसुरिया एवं एल्ब्युमिनुरिया कहा जाता है ।
  • स्त्री के रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) में वृद्धि हो सकती है ।

 गर्भावस्था में उत्सर्जन तंत्र से सम्बन्धित रोग एवं स्थितियाँ:

गर्भावस्था में किडनी रोग की जानकारी के लिए उत्सर्जन तंत्र से जुड़ी बीमारियों को जानना इसलिए जरुरी हो जाता है क्योंकि किडनी भी उत्सर्जन तंत्र का ही एक हिस्सा है |

मूत्र तंत्र में संक्रमण (यू.टी.आई., यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्सन):

गर्भावस्था के क्रम में शरीर में होने वाली संरचनात्मक, कार्यिकी एवं हारमोंस के परिवर्तन के कारण मूत्र तंत्र में संक्रमण ज्यादा होता है  | मूत्राशय एवं गुर्दो में जीवाणु संक्रमण के कारण पेशाब में जलन, बार-बार पेशाब जाना, बदबूदार पेशाब तथा पेशाब में रक्त आने की शिकायत हो सकती है । उपरोक्त लक्षणों के साथ पेट में एवं पेडू में दर्द, बुखार एवं मितली हो सकती है, जो संक्रमण के गम्भीर होने एवं पाइलोनेफ्राइटिस के द्योतक हैं । गर्भावस्था में किडनी एवं मूत्र तंत्र की इस तकलीफ के लिए मूत्र की साधारण एवं कल्चर जाँच के आलोक में ऐसी जीवाणुरोधक दवा दी जाती है जो गर्भावस्था के लिए सुरक्षित हो ।

गर्भावस्था में रक्तचाप में वृद्धि (Pregnancy Induced Hypertension):

लगभग 5-10 प्रतिशत गर्भवती महिलाएँ उच्च रक्तचाप का शिकार होती हैं । रक्तचाप का बढ़ना पहले से ही उच्च रक्तचाप से प्रभावित महिला में हो सकता है या पहली बार गर्भावस्था के दौरान दिख सकता है । इन दोनों स्थितियों (क्रोनिक हाइपरटेंशन एवं जेस्टेसनल हाइपरटेंशन) में विभेद करना, चिकित्सक के लिए इलाज की दिशा एवं प्रकार के निर्धारण में मददगार सिद्ध होता है । गर्भावस्था के दौरान रक्तचाप ज्यादा बढ़ जाने पर शरीर में सूजन एवं मूत्र में एल्ब्यूमिन का अत्यधिक स्राव हो सकता है जिस स्थिति को प्री-इक्लैंप्सिया कहते हैं । रक्तचाप का सही समय पर नियंत्रण नहीं करने पर मरीज को मिर्गी समान दौरा आ सकता है । साथ ही, गर्भस्थ शिशु के विकास पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है तथा उसकी जान खतरे में जा सकती है । गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप की इन स्थितियों में गुर्दे भी सही ढंग से काम नहीं करते हैं । जिससे गर्भवस्था में किडनी रोग होने की संभावना बढ़ जाती है | गर्भावस्था में बढ़े रक्तचाप एवं मूत्र में एल्ब्यूमिन के अत्यधिक स्राव को खतरे की घंटी एवं आपातुस्थिति मान कर विशेषज्ञों की देख-रेख में इलाज कराने पर ही माँ एवं गर्भस्थ शिशु की जीवन रक्षा की जा सकती है ।

गर्भावस्था का मूत्र तंत्र पर प्रभाव:

गर्भ के कारण गर्भाशय के आकार में वृद्धि होने के कारण मूत्र-वाहिनी (यूरेटर) पर बाहर से दबाव पड़ता है एवं इसके द्वारा मूत्र-प्रवाह में रुकावट पैदा होती है, जिस कारण ऊपरी कलैक्टिंग सिस्टम फैल जाता है । यूरेटर में कुछ फैलाव हॉरमोन के असर से भी होता है । इस रुकावट के कारण जमा हुए मूत्र में संक्रमण हो सकता है । जिससे गर्भवस्था में किडनी पर भी विपरीत असर पड़ने का खतरा रहता है |

गर्भावस्था की मधुमेह (Gestational Diabetes) :

गर्भावस्था में किडनी सुचारू रूप से कार्य करें इसके लिए महिला का डायबिटीज से मुक्त रहना जरुरी है लेकिन लगभग पाँच से दस प्रतिशत गर्भधारण करने वाली स्त्रियों को गर्भ के पाँचवें माह के आस-पास, रक्त में शुगर का स्तर बढ़ने की शिकायत होती है । मधुमेह (डायबिटीज) की यह स्थिति, चूँकि गर्भ (जेस्टेशन) के दौरान पहली बार दिखती है, अतः इसे ‘जेस्टेशनल डायबिटीज’ कहते हैं । गर्भावस्था में प्लेसेंटा (Placenta) के द्वारा ऐसे हार्मोन बनाए जाते हैं, जो इन्सुलिन की कार्य क्षमता घटाते हैं एवं इन्सुलिन प्रतिरोध (Insulin Resistance) की स्थिति पैदा करते हैं । जो स्त्रियाँ गर्भ पूर्व से मधुमेह की रोगी होती हैं, इन्सुलिन प्रतिरोध के कारण उनके रक्तशुगर में भी बढ़ोत्तरी होती है तथा शुगर कंट्रोल के लिए दवाओं एवं इन्सुलिन की खुराक बढ़ानी पड़ सकती है । गर्भावस्था की मधुमेह से बचने के लिए गर्भावस्था के प्रारम्भ से ही टहलना, जॉगिंग, योग, हल्के (एरोबिक्स) व्यायाम करना चाहिए । ऐसे व्यायाम एवं योग न करें जिससे पेट पर दबाव पड़ता हो । भोजन में दानेदार अनाज (दलिया, चावल), ताजे फल और सब्जियों का सेवन ज्यादा करें । रिफाइंड भोज्य पदार्थ (मैदा, चीनी, चॉकलेट, टॉफी आदि) कम प्रयोग करें ।

किडनी रोग में गर्भधारण:

गुर्दा रोग से प्रभावित स्त्रियों में गर्भधारण की सम्भावना घट जाती है । साथ ही गर्भ धारित होने पर गर्भपात, शिशु के कमजोर होने तथा समय पूर्व प्रसव की सम्भावना बढ़ जाती है । गुर्दा रोग के साथ गर्भ का होना, मां एवं शिशु दोनों के लिए जोखिम भरी स्थिति है । गुर्दा रोग के साथ गर्भ ठहरने पर रक्तचाप बढ़ने तथा मूत्र में एल्यूमिन स्राव की शिकायत ज्यादा होती है ।

किडनी प्रत्यारोपण के बाद गर्भधारण:

किडनी प्रत्यारोपित करने के बाद जब नया गुर्दा सही ढंग से काम करता है तथा शरीर से व्यर्थ रसायन बाहर चले जाते हैं, तब स्त्री के जननांग भी बेहतर कार्य करने लगते हैं । सफल गुर्दा प्रत्यारोपण के बाद कामेच्छा (लिबिडो) एवं गर्भधारण की सम्भावना बढ़ जाती है । अक्सर देखा गया है की गुर्दा प्रत्यारोपण के बाद स्त्री गर्भधारण नहीं करना चाहती है एवं चिकित्सक भी इसे प्रोत्साहित नहीं करते हैं, क्योंकि गर्भधारण हृदय एवं गुर्दो-दोनों से 30-40% ज्यादा कार्य की अपेक्षा करता है । गर्भधारण की सलाह प्रायः तब की दी जाती है, जब प्रत्यारोपित गुर्दा कम-से-कम एक साल तक ठीक काम कर चुका हो तथा रिजेक्शन रोकने की दवा की मात्रा कम हो चुकी हो । इस स्थिति में गर्भ निरोध के लिए कंडोम का प्रयोग सबसे सुरक्षित है । गर्भ निरोधक गोली के सेवन करने से हार्मोन के प्रभाव से रक्तचाप बढ़ने की सम्भावना होती हैं दूसरी तरफ गर्भाशय में कॉपर-टी जैसी इन्ट्रा-यूटेराइन कंट्रासेप्टिव डिवाइस (IUCD) लगाने से जनन एवं मूत्र तंत्र में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है । संक्रमण हो जाने पर प्रत्यारोपित गुर्दा की कार्यक्षमता घट सकती है और रिजेक्शन का अन्देशा बढ़ सकता है । यह सच है की गर्भावस्था में किडनी का कार्य बढ़ जाता है इसलिए इनका ध्यान रखना बेहद जरुरी हो जाता है |

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