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किडनी की संरचना एवं कार्य

किडनी की संरचना एवं कार्य Structure and function of kidneys

किडनी की संरचना एवं कार्यों के बारे में जानने से पहले मनुष्य के उत्सर्जन तंत्र (Excretory System) को समझ लेना चाहिए उत्सर्जन तंत्र हमारे पेट में स्थित अंगों के उस समूह को कहते हैं, जो मूत्र बनाता है, संचय करता है और थोड़े-थोड़े समय के अन्तराल पर उसे विसर्जित करता है । इस अंग समूह में दो गुर्दे (किडनी), दो मूत्रवाहिनी (यूरेटर), एक मूत्राशय (यूरिनरी ब्लैडर) तथा एक मूत्रनली (यूरेथ्रा) होती है । दोनों गुर्दो को अलग-अलग मूत्रवाहिनी नली मूत्राशय को जोड़ती है, जब कि मूत्राशय से मूत्र त्याग एक ही मूत्रनली से होता है । शरीर की विभिन्न चयापचय (मेटाबोलिक) क्रियाओं के क्रम में उत्तकों, अंगों, मांसपेशियों आदि में कुछ व्यर्थ एवं हानिकारक पदार्थ जैसे नाइट्रोजन युक्त अमोनिया, यूरिया, यूरिक एसिड, आयंस (जैसे सोडियम, पोटेशियम, फॉस्फेट, सल्फेट आदि) बनते हैं । गुर्दो का काम रक्त के इन सभी विषैले अवयवों को छान कर मूत्र बनाना है, जो मूत्रवाहिनी के द्वारा मूत्राशय में जमा किया जाता है । कहने का आशय यह है की हमारे शरीर में किडनी की संरचना रक्त की सफाई करने के उद्देश्य से हुई है |

किडनी की संरचना एवं कार्य

किडनी की संरचना (Structure of kidneys) :

लगभग दस सेंटीमीटर लम्बे एवं 150 ग्राम वजन के काजू के आकार के गुर्दे पेट में रीढ़ की हड्डियों के अगल-बगल अवस्थित होते हैं । हर गुर्दा लगभग दस लाख से ज्यादा सूक्ष्म तंतुनुमा, नेफ्रॉन (Nephron) का बना होता है, जो अपने आप में अलग-अलग एक पूर्ण छनन इकाई होती है । ये नेफ्रॉन मूत्र बनाने की प्रक्रिया में पहले रक्त को छानते हैं, उस छने द्रव्य से कुछ उपयोगी तत्त्वों को सोखते हैं, तत्पश्चात् कुछ अनुपयोगी पदार्थ की मात्रा तरल रूप में पुनः विसर्जित करते हैं । यह तरल पदार्थ महीन नलियों से बहता हुआ बड़ी नलियों में पहुँचता है तथा यह मूत्र वक्राकार गुर्दे की गुफा समान थैली, पेल्विस में आ जाता है । गुर्दे की आंतरिक संरचना में बाहरी भाग कार्टेक्स में छनन ईकाई, ग्लोमेरूलस होती है तथा उसके भीतर मेड्यूला में सूक्ष्म नलिकाएँ होती हैं ।

नेफ्रॉन के भाग:

नेफ्रॉन को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है |

  • ग्लोमेरूलस (Glomerulus):

यह अतिसूक्ष्म रक्तनलिकाओं (Capillaries) का प्रजाल (Network) है, जिसके एक सिरे आगत रक्त नलिका से अशुद्ध रक्त प्रवेश करता है तथा दूसरे सिरे बाह्यगामी रक्त नलिका से छना हुआ रक्त बाहर निकल जाता है ।

  • रीनल ट्युब्यूल (Renal Tubule):

यह रक्त के छनने से बनी मूत्र को ग्रहण करनेवाली नलिका है, जिसका एक सिरा कप के आकार (Bowman’s Capsule) में फैल कर ग्लोमेरूलस को घेर लेता है, और इसकी परतें छानने (Filter) का काम करती हैं । कई ट्युब्यूल के दूसरे सिरे आपस में जुट कर संग्राही नली (Collecting Duct) बनाते हैं जो गुर्दे की मूत्रग्राही थैली (Renal Pelvis) में खुलती है । ग्लोमेरूलस एवं बोमैन्स कैप्सूल को संयुक्त रूप से मैलपीजियन बॉडी (Malpighian Body) कहते हैं । मूत्र बनकर किडनी की गुफा समान पेल्विस में आता है, तत्पश्चात मूत्रवाहिनी के द्वारा मूत्राशय तक पहुँच जाता है । दोनों गुर्दो को मिलाकर वयस्क मनुष्य में प्रति मिनट लगभग 1200 मिलीलिटर रक्त प्रवाहित होता है, जो हृदय के द्वारा प्रति मिनट पम्प किए जा रहे रक्त की मात्रा का लगभग चौथाई हिस्सा है । इस रक्त के छानने से प्रति मिनट लगभग एक से दो मिलीलिटर मूत्र बनता है ।

किडनी का कार्य (Function of Kidneys in Hindi):

एक कहावत है-‘जल ही जीवन है । यह मात्र एक कहावत नहीं, अपितु यथार्थ एवं सत्य है । वयस्क मानव के शरीर को लगभग साठ प्रतिशत एवं शिशुओं में लगभग पचहत्तर प्रतिशत भाग जल होता है । शरीर के सभी महत्त्वपूर्ण द्रव्यों जैसे खून, पाचक रस, लार, आँसू, मूत्र आदि का बड़ा भाग जल होता है । हमारे शरीर के प्रायः सभी पोषक तत्त्व, यथा एमीनो एसिड, ग्लूकोज, विटामिन, खनिज धातु (मिनरल) आदि जल में घुलनशील होते हैं एवं जल के माध्यम से ही शरीर की कोशिकाओं में प्रवेश करते एवं इनसे बाहर निकलते हुए एक सन्तुलन की स्थिति बनाए रखते हैं ।  हम भोजन के तरल रूप-दाल, दूध, जूस तथा सीधे पानी पीकर जल ग्रहण करते हैं । दूसरी तरफ शरीर से जल; साँस से निकली वायु के द्वारा, पसीना, मूत्र एवं मल से बाहर निकलता है । शरीर के द्वारा ग्रहण किए गए एवं ह्रास किए गए जल के बीच सन्तुलन बनाए रखने का महत्त्वपूर्ण कार्य गुर्दो के द्वारा किया जाता है । गुर्दे मूत्र की मात्रा बढ़ा-घटा कर करते हैं । हमारी दैनिक आवश्यकता की जल की मात्रा, उम्र, शारीरिक गतिविधि, वातावरण के आर्द्रता-तापमान एवं अन्य कुछ कारकों (यथा स्त्रियों में गर्भावस्था) पर निर्भर करती है । वयस्कों में भोजन के साथ लिए गए अंश को मिलाकर जल की आवश्यक मात्रा दो से चार लीटर हो सकती है । कम पानी पीने, अधिक पसीना, दस्त, अतिमूत्रता आदि के कारण हमारे शरीर में जल की कमी हो सकती है और हम निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) के शिकार हो सकते हैं । शरीर के जलांश में बीस प्रतिशत से ज्यादा कमी जान के लिए खतरनाक सिद्ध हो सकती है । शरीर में जल की कमी होने पर प्यास लगती है, जो मस्तिष्क के द्वारा जल की कमी होने का सिग्नल है । शरीर में जल की अधिकता होने पर सूजन आ सकता है एवं पेट में छाती की झिल्लियों में पानी जमा हो सकता है । किडनी या गुर्दों के प्रमुख कार्य निम्न प्रकार हैं |

  • शरीर में जल की मात्रा नियंत्रित रखना:

आपने ध्यान दिया होगा ज्यादा पानी पीने से पेशाब ज्यादा बनता है एवं कम पीने से कम । साथ ही, जब गर्मी के दिनों में पसीने से ज्यादा पानी निकल आता है तो पेशाब की मात्रा घट जाती है । इस पद्धति से किडनी शरीर में जल की मात्रा को सन्तुलित रखते हैं । गुर्दो के सूक्ष्म फिल्टर एवं नलिकाएँ, रासायनिक हॉरमोन, जैसे वेसोप्रेसिन एवं एल्डोस्टेरोन आदि के प्रभाव से इस सन्तुलन को रख पाती है ।

  • खून की सफाई करते हैं किडनी:

गुर्दो या किडनी का प्रमुख कार्य रक्त को शुद्ध करना होता है । खाना पचाने, अवशोषित होने एवं लिवर में संशोधित होने के क्रम में यूरिया, यूरिक एसिड, क्रिएटिनीन जैसे हानिकारक यौगिक बनते हैं जिन्हें छान कर, गुर्दे मूत्र के द्वारा बाहर निकालते हैं । इसलिए गुर्दो के सही ढंग से काम न कर पाने पर रक्त में इनकी मात्रा बढ़ जाती है जिसे रक्त में यूरिया एवं क्रियेटिनीन की रासायनिक जाँच करके पता लगाया जाता है ।

  • शरीर में अम्ल-क्षार की मात्रा संतुलित रखना:

किडनी शरीर में हाइड्रोजन आयन (अम्लीय) एवं बाइकार्बोनेट (क्षारीय) की मात्रा के नियंत्रण के साथ-साथ सोडियम, पोटेशियम, मैग्नीशियम (Anion) एवं क्लोराइड, फॉस्फेट, बाइकॉर्बोनेट (Cation) की मात्रा ठीक रखते हैं, जिससे शरीर की कोशिकाएँ एवं उत्तक सही ढंग से काम कर पाते हैं ।

  • रक्तचाप पर नियंत्रण रखते हैं गुर्दे:

किडनी अनेक ऐसे हार्मोन बनाते हैं, जिनसे शरीर का रक्तचाप नियंत्रित रहता है । इन हार्मोनों-रेनिन, एंजियोटेंशिन, एल्डोस्टेरोन, प्रोस्टाग्लैंडिन आदि के प्रभाव से रक्तचाप, जल की मात्रा, अम्ल-क्षार (अर्थात PH) सभी के सन्तुलन एवं नियंत्रण में मदद मिलती है ।

  • विटामिनडीका निर्माण करती हैं किडनी:

कोलेस्ट्रॉल के अणु को गुर्दे रासायनिक प्रक्रिया के द्वारा कोलेकैल्सिफेरॉल के अणु-विटामिन ‘डी’ में बदल देते हैं जो हड्डियों एवं दांतों में कैल्शियम तथा फास्फोरस की मात्रा बढ़ाकर उसे मजबूत बनाते हैं । कुछ बच्चों में गुर्दो के अस्वस्थ होने पर विटामिन ‘डी’ की कमी के दुष्प्रभाव से हड्डियाँ कमजोर हो जाती हैं, शरीर का विकास रुक जाता है और ‘सूखा’ रोग हो जाता है, जिसे रीनल रिकेट्स (Renal Rickets) कहते हैं ।

  • लाल रक्त कणों के निर्माण में मदद :

हमारे शरीर में लाल रक्त कण (Red Blood Cell), फेफड़ों से ऑक्सीजन ग्रहण कर उसे उत्तकों तक पहुँचाते हैं । लाल रक्त कणों का निर्माण हड्डियों के अन्दर स्थित मज्जा (Bone Marrow) में होता है । किडनी द्वारा बनायी गई इरिथ्रोपायटीन (Erythropoietin) मज्जा में लाल रक्त कणों के उत्पादन को उत्प्रेरित करती है । दीर्घावधि गुर्दा रोगों (क्रोनिक किडनी डिसीज) में इरिथ्रोपायटिन की कमी के कारण शरीर में लाल रक्त कणों की कमी हो जाती है जिसे एनीमिया (Anaemia) कहा जाता है ।

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