Preeclampsia कारण लक्षण एवं ईलाज की जानकारी

Preeclampsia को सामान्य भाषा में समझने के लिए हिंदी में प्री-इक्लैंपसिया ह कह सकते हैं यह गर्भावस्था की उन विशेष जटिलताओं में से एक है, जो काफी गंभीर होते हैं | कहने का आशय यह है की Preeclampsia का शीघ्र तथा सही उपचार नहीं होने पर गर्भवती महिला की मृत्यु तक हो सकती है | प्री-इक्लैंपसिया में गर्भवती महिला का रक्तचाप बढ़ने लगता है और कभी-कभी यह बहुत ज्यादा बढ़ जाता है । यही कारण है अत्यधिक ब्लड प्रेशर के कारण बहुत सारी अन्य जटिलताएँ भी उत्पन्न होती हैं, जो काफी भयानक हो सकती हैं |

Preeclampsia

Preeclampsia के कारण:

यद्यपि Preeclampsia के होने के सटीक कारणों का अबी तक पता नहीं चल पाया है | चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े कुछ विशेषज्ञों का मानना है की गर्भावस्था में हाई ब्लड प्रेशर की शिकार महिलाओं में यह अधिकतर तौर पर पाया जाता है और यह गर्भनाल में शुरू होता है | चूँकि प्लेसेंटा यानिकी गर्भनाल का कार्य गर्भावस्था के दौरान भ्रूण को पोषण प्रदान करने का होता है इसलिए गर्भावस्था के शुरुआत में नै रक्त वाहिकाओं का उदय होता है जो गर्भनाल तक रक्त संचरण का कार्य करती हैं | लेकिन Preeclampsia में ये रक्त वाहिकाएं ठीक ढंग से कार्य करने में असमर्थ हो जाती हैं इसके कुछ सामान्य लक्षण इस प्रकार से हैं |

  • प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी समस्या
  • रक्त वाहिकाओं में चोट लगना
  • रक्तचाप का उच्च होना
  • गर्भाशय तक रक्त का पर्याप्त मात्रा में परिसंचरण न होना |

यूँ तो Preeclampsia या इक्लैंपसिया किसी भी गर्भवती को अचानक शुरू हो सकता है, पर अधिकांशत: ऐसी महिलाओं में यह समस्या अधिक देखने को मिलती है, जिन्हें पहले से उच्च रक्तचाप हो या पुराने रक्तचाप की बीमारी या गर्भजनित उच्च रक्तचाप हो । कम उम्र, प्रथम सगर्भा, बहुल गर्भ, मोटी और मधुमेह से ग्रसित महिलाओं को प्री-इक्लैंपसिया का अधिक डर रहता है । यदि पहले किसी गर्भ में प्री-इक्लैंपसिया हुआ हो तो बाद के गर्भ में भी होने की संभावना अधिक रहती है । आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्ग में यह ज्यादा पाया जाता है ।

प्री-इक्लैंपसिया के लक्षण:

प्रीइक्लैंपसिया में पूरे शरीर की रक्त वाहिनियों में कुछ ऐसे परिवर्तन हो जाते हैं, जिनके कारण उनमें रक्त-प्रवाह की मात्रा बेहद कम हो जाती है । रक्त वाहिनियों में इस परिवर्तन के कारण शरीर के विभिन्न तंत्रों में रक्त-आपूर्ति की कमी हो जाती है और सभी तंत्र कुप्रभावित होते हैं । यह असर पूरे शरीर पर पड़ता है और मस्तिष्क, आँखें, हृदय, फेफड़े, लिवर, किडनी एवं गर्भाशय सभी प्रभावित होते हैं । अधिकांशत: प्री-इक्लैंपसिया गर्भावस्था के उत्तरार्ध में होता है, यानी 20 सप्ताह के बाद पर यदा-कदा उसके पहले भी हो सकता है । उच्च रक्तचाप के साथ यदि सिर दर्द, दृष्टि-दोष, कलेजे में या पेट की दाई ओर ऊपरी भाग में दर्द होने लगे तो ये प्री-इक्लैंपसिया Preeclampsia के काफी गंभीर होने के लक्षण हैं । प्री-इक्लैंपसिया के साथ यदि माँ को झटके या दौरे आने लगें तो इस बीमारी को इक्लैंपसिया कहते हैं । लेकिन इससे पहले यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है कि दौरों का कोई अन्य कारण, जैसे मिरगी इत्यादि नहीं है । इक्लैंपसिया के इन दौरों में शरीर की सभी पेशियाँ बार-बार संकुचित व शिथिल होती हैं और यह दौर करीब एक मिनट तक चलता है, जिसके बाद माँ शिथिल, शांत और थोड़ी देर के लिए बेहोश हो जाती है । यह क्रम बार-बार चलता रहता है ।

Preeclampsia से बचाव:

हालांकि Preeclampsia से बचाव के लिए कोई भी ऐसी जाँच नहीं है, जिससे यह पता चल सके कि प्री-इक्लैंपसिया होने वाला है । बहुत सारी जाँचें इसके लिए प्रयोग में लाई गई हैं पर अंत में यही निष्कर्ष निकला कि किसी भी जाँच पर शत-प्रतिशत भरोसा किया जाना सही नहीं होगा । गर्भवती महिला का बार-बार परीक्षण, उसके रक्तचाप एवं मूत्र की जाँच ही यह बता सकता है कि प्री-इक्लैंपसिया होने वाला है या नहीं । यद्यपि Preeclampsia  से बचाव के लिए खाने में अधिक नमक नहीं लेना, मछली के तेल-युक्त भोजन, कैल्सियम की गोलियाँ एवं व्यायाम बहुत उपयोगी माना गया है । चिकित्सकों द्वारा इससे बचाव के लिए यह भी सुझाया गया है की गर्भवती महिला को 50 से 75 मिलीग्राम एस्प्रीन की गोली रोज एक बार लेनी चाहिए । ऐसी गर्भवती महिलाएं जिन्हें Preeclampsia प्री-इक्लैंपसिया होने की अधिक संभावना हो उन्हें चिकत्सक द्वारा हेपारिन की सुई भी लगाई जा सकती है | लेकिन यह उपचार कितना प्रभवे होगा इसकी कोई गारंटी नहीं है ।

Preeclampsia का ईलाज:

Preeclampsia का ईलाज बीमारी की तीव्रता एवं गर्भावस्था की अवधि पर निर्भर करता है । इसमें महिला की गहन देखभाल आवश्यक है, जिसमें रक्तचाप की जाँच, मूत्र में प्रोटीन की जाँच, रक्त में लिवर के एंजाइम्स की जाँच और प्लेटलेट्स की संख्या बहुत ही महत्वपूर्ण है । Preeclampsia से मुक्ति एवं इसमें निहित खतरों से बचाव गर्भ की समाप्ति यानी प्रसव के बाद ही संभव है । यदि प्रसव की अवधि काफी कम हो तथा भ्रूण इतना विकसित नहीं हो पाया हो कि वह बाहर भी जीवित रह सके, तब दुविधा की स्थिति उत्पन्न हो जाती है; क्योंकि एक तरफ प्री-इक्लैंपसिया के कारण गर्भवती महिला और भ्रूण दोनों को खतरा रहता है तो दूसरी तरफ समय पूर्व प्रसव के कारण नवजात की जान को भी खतरा हो सकता है । यदि गर्भ की अवधि 37 सप्ताह या उससे अधिक हो चुकी हो, तब उत्प्रेरण द्वारा प्रसव शुरू कराया जा सकता है । कभी-कभी अन्य कारणों से सिजेरियन प्रसव भी करना पड़ सकता है । सैंतीसवें सप्ताह के पहले Preeclampsia के लक्षण होने पर माँ को कॉर्टिकोस्टीरॉयड की सुई दी जाती है और उसके 48 घंटों के बाद प्रसव-पीड़ा शुरू कराई जाती है । पर कभी कभी प्रसव-पीड़ा या सिजेरियन द्वारा प्रसव कराना अत्यंत आवश्यक हो जाता है, चाहे गर्भ की जो भी अवधि हो; जैसे-रक्तचाप का अचानक तेजी से बढ़ना, मूत्र में प्रोटीन आना, हेल्प सिंड्रोम के लक्षण या इक्लैंपसिया होने की संभावना होने के कारण । यदि प्री-इक्लैंपसिया Preeclampsia से पीड़ित माँ को पेट के ऊपरी भाग में या सिर में तीव्र दर्द होने लगे और रक्त जाँच में प्लेटलेट्स की कमी तथा लिवर एंजाइम्स की मात्रा में वृद्धि हो जाए तो यह संभावित इक्लैंपसिया का लक्षण है ।  इसके अलावा  यदि किसी गर्भवती का डायस्टोलिक रक्तचाप 80 से अधिक हो और उसके वजन में पार्टी सप्ताह दो पौंड से अधिक की वृद्धि होने लगे तो यह Preeclampsia हो सकता है | इसलिए ऐसी गर्भवती महिला की जांच प्रति सप्ताह अवश्य होनी चाहिए | तीव्र प्री इक्लेंपसिया से निजत दिलाने के लिए सम्बंधित महिला को चिकित्सका द्वारा दवाइयां दी जा सकती हैं | इक्लेंपसिया न हो इसके लिए भी दौरा रोकने वाली दवाइयां दी जाती हैं और उत्प्रेरण द्वारा प्रसव क्रिया करने की तैयारी की जाती है सामान्य प्रसव में जटिलता होने के कारण सिजेरियन प्रसव के द्वारा बच्चे को बाहर निकाला जा सकता है | यदि Preeclampsia की तीव्रता कम हो एवं गर्भ का समय भी पूरा न हुआ हो तो इस स्थिति में सम्पूर्ण निगरानी के साथ गर्भ की अवधि को आगे बढ़ाना ठीक रहता है | लेकिन ध्यान रहे इस स्थिति में भ्रूण के स्वास्थ्य की नित्य जांच, ब्लड प्रेशर की प्रतिदिन दो बार जांच एवं मूत में प्रतिदिन प्रोटीन की जांच करनी आवश्यक होती है |  यदि Preeclampsia के लक्षण 26-34 सप्ताह की अवधि में शुरू हो जाएँ तो गर्भवती महिला को चिकित्सक द्वारा कॉर्टिकोस्टीरॉयड की सूई दी जा सकती है वह इसलिए क्योंकि इससे समयपूर्व प्रसव से होने वाले बच्चे को नुकसान कम हो जाते हैं | कॉर्टिकोस्टीरॉयड का फायदा हेल्प सिंड्रोम में भी देखा गया है । गर्भ की अवधि 24 से 32 सप्ताह होने पर चिकित्सक या पीड़िता के परिजनों की इच्छा आशान्वित उपचार की होती है; पर इससे भ्रूण या गर्भवती महिला को विशेष फायदा नहीं पहुँचता है । आशान्वित उपचार के दौरान तीव्र Preeclampsia प्री-इक्लैंपसिया से पीड़ित माँ को अपरा के पृथक्करण, इक्लैंपसिया होने की संभावना, मस्तिष्क में रक्तस्राव, हेल्प सिंड्रोम तथा माँ की मृत्यु होने का भय रहता है |

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