दवाओं का किडनी पर दुष्प्रभाव (Side Effects of Medicines on kidneys)

विभिन्न दवाओं के किडनी पर दुष्प्रभाव हो सकते हैं क्योंकि हमारे द्वारा सेवन की गई दवाओं की ज्यादातर मात्रा, मेटाबोलिज्म के द्वारा रूपांतरित हो शरीर के द्वारा उपयोग कर ली जाती है और नष्ट हो जाती है । जो अंश मेटाबोलिज्म के कारण नष्ट नहीं होता है, वह मात्रा प्रायः गुर्दो के द्वारा ही शरीर से बाहर आता है । कभी-कभी दवाओं की मात्रा गुर्दो में इतनी हो जाती है कि इनका किडनी पर दुष्प्रभाव हो सकते हैं अर्थात ये गुर्दो के उत्तकों को नुकसान पहुँचा सकती है ।

दवाओं का किडनी पर दुष्प्रभाव

कौन कौन सी दवाओं का किडनी पर दुष्प्रभाव हो सकता है?

निम्न श्रेणी की दवाओं का अधिकतर सेवन से इनका किडनी पर दुष्प्रभाव हो सकता है |

  • दर्दनाशक दवाओं का किडनी पर दुष्प्रभाव:

दर्द एवं सूजन घटाने की अनेक दवाएँ (नॉन स्टीरॉयड एंटी इंफलामेटरी ड्रग्स) गुर्दो को नुकसान पहुँचा सकती है । कई लोग सरदर्द, देहदर्द एवं जोड़ों के दर्द आदि के लिए प्रायः बिना किसी चिकित्सक की सलाह लिए इन दवाओं का सेवन करते हैं । सरकार एवं दवा-नियंत्रक पदाधिकारियों के द्वारा भी इन्हें बिना डॉक्टरी सलाह के ओ.टी.सी. (ओवर द काउंटर) प्रोडक्ट के रूप में बेचने की अनुमति मिली हुई है, जिस कारण इनका प्रयोग आवश्यकता से अधिक हो रहा है । दर्दनाशक दवाएँ जिनमें एस्पिरिन, फेनासेटिन, आईबूप्रोफेन, डाइक्लोफेनाक सोडियम, निमुसेलाइड और रेफोकोक्सिब जैसे अवयव मिले हों उनका प्रयोग स्वस्थ व्यक्ति के द्वारा कम-से-कम होना चाहिए एवं गुर्दा के रोगियों को तो ये दवाएँ लेनी ही नही चाहिए । दर्दनाशक दवाएँ गुर्दो को हानि पहुँचाने के साथ-साथ शरीर के कुछ  अन्य अंगों में भी तकलीफ कराती हैं । ये आमाशय की झिल्ली में सूजन और घाव (पेप्टिक अल्सर), एसिडिटी, गैस और पेट दर्द करा सकती हैं । साँस के मरीजों को दमा का अटैक करा सकती हैं । ये लिवर को हानि पहुँचा सकती हैं एवं रक्तचाप भी बढ़ा सकती हैं । दर्दनाशक दवाओं के प्रयोग से खून के थक्का बनने में बाधा पहुँच सकती है एवं कटने, चोट लगने, ऑपरेशन होने पर अत्यधिक रक्तस्राव हो सकता है । इस कोटि की दवाओं के रक्त को तरल बनाने के प्रभाव का लाभ हृदय रोगियों की एस्पिरिन की छोटी खुराक (लो-डोज-एस्पिरिन) देकर, हृदयाघात (हार्ट अटैक) से बचाने का प्रयास किया जाता है । परन्तु अगर रोगी को साथ में किडनी रोग भी है तो आमाशय से रक्तस्राव (गैस्ट्रिक ब्लीडिंग) की सम्भावना बढ़ जाती है, जिस स्थिति में इससे परहेज ही उचित है । दर्द नाशक दवाओं में पैरासिटामोल अभी गुर्दो के लिए सुरक्षित मानी जाती है, पर इसका ज्यादा प्रयोग लिवर को क्षति पहुँचा सकता है । इसलिए दर्दनाशक दवाओं का किडनी पर दुष्प्रभाव को देखते हुए कहा जा सकता है की किडनी रोगी को इनका सेवन नहीं करना चाहिए |

दर्दनाशक दवाओं के दुष्प्रभाव के लक्षण:

दर्दनाशक दवाओं के किडनी पर दुष्प्रभाव होने की पहली निशानी मूत्र में एल्ब्यूमिन की अधिक मात्रा का गिरना होता है । ज्यादा खराबी हो जाने पर रक्त में यूरिया एवं क्रिएटिनिन का स्तर बढ़ जाता है । दर्दनाशक दवाओं के किडनी पर दुष्प्रभाव होने के प्रारम्भिक अवस्था में अगर दवा रोक दी जाती है, तो शरीर गुर्दो में हुई हानि की क्षतिपूर्ति कर लेता है, परन्तु ज्यादा क्षति हो जाने पर शरीर उसकी भरपाई नहीं कर पाता है ।

  • एमिनोग्लाइकोसाइड ग्रुप की दवाएँ:

स्ट्रेप्टोमाइसिन (तपेदिक की दवा), जेंटामाइसिन (एंटीबायोटिक) एवं अमिकासिन भी किडनी पर दुष्प्रभाव डालती हैं | कुछ दशक पूर्व स्ट्रेप्टोमाइसिन तपेदिक की प्रमुख दवा थी, परन्तु अब नई एवं सुरक्षित दवाओं के उपलब्ध होने से इसका उपयोग घट गया है । इसलिए आज इस रोग के ईलाज में उपयोग होने वाली दवाएं अधिक सुरक्षित हैं |

  •   कंट्रास्ट एजेंट:

मूत्र तंत्र की इमेजिंग जाँच, यूरोग्राफी में आयोडीनयुक्त कंट्रास्ट एजेंट उपयोग में लाया जाता है । गुर्दा रोगियों में इस जाँच को करने के पहले सम्भावित हानि का अनुमान लगा लेना चाहिए । आजकल अल्ट्रासाउंड जैसी सुरक्षित जाँच उपलब्ध हो जाने के बाद यूरोग्राफी की उपयोगिता बहुत घट गई है । यूरोग्राफी जाँच की संख्या अब घट गई है, परन्तु आयोडिन युक्त कंट्रास्ट दवाओं का उपयोग सी.टी. स्कैन जाँच एवं एंजियोग्राफी जाँच में बहुलता से हो रहा है । रक्त में यूरिया एवं क्रिएटिनीन का स्तर थोड़ा भी बढ़ा होने पर, आयोडिन कंट्रास्ट दवा के प्रयोग से बचना चाहिए, क्योंकि वे किडनी की कार्यक्षमता तेजी से घटा सकती है । और किडनी पर दुष्प्रभाव छोड़ सकती हैं |

  • एलर्जी:

कुछ दवाएँ ऐसी होती हैं, जो सभी सेवन करनेवालों को हानि नहीं पहुँचाती है, परन्तु कुछ व्यक्तियों के गुर्दो को, एलर्जी जैसी प्रक्रिया से हानि पहुँचा सकती है जैसे पेनिसिलीन, रिफाम्पीसिन, सिप्रोफ्लॉक्सेसिन, सल्फोनामाइड आदि। इन दवाओं के प्रयोग के बाद अगर चेहरे पर या शरीर में सूजन आए तो दवा का सेवन तुरन्त रोक कर, चिकित्सक से सम्पर्क करना चाहिए । क्योंकि ये लक्षण इन दवाओं के कारण हुए किडनी पर दुष्प्रभाव के हो सकते हैं |

  •  आयुर्वेदिक दवाओं का किडनी पर दुष्प्रभाव:

कुछ आयुर्वेदिक दवाओं में जस्ते, लोहे या पारद का भस्म प्रयोग किया जाता है, जो गुर्दो को क्षति पहुँचा सकती हैं । यह धारणा कि आयुर्वेदिक एवं होम्योपैथी दवाएँ शरीर एवं गुर्दो के लिए पूर्णतया सुरक्षित होती हैं, यह मिथ्या है । हमें समझी-बूझी एवं वैज्ञानिक जाँच के द्वारा सुरक्षित एवं उपयोगी सिद्ध की गई दवाओं का ही प्रयोग करना चाहिए ।

किडनी को दवाओं के दुष्प्रभाव से कैसे बचाएं:

  • गुर्दो की सुरक्षा के लिए दर्दनाशक दवाओं का सेवन कम-से-कम करना चाहिए ।
  • बुजुर्गों में होनेवाले जोड़ों के दर्द की चिकित्सा मालिश, गर्म सिकाई एवं मांसपेशियों को ताकत देने वाले कसरतों (फिजियोथेरेपी) से करना चाहिए ।
  • दवाओं का किडनी पर दुष्प्रभाव को रोकने के लिए दर्दनाशक दवाओं का सेवन करते समय पानी की समुचित मात्रा लेनी चाहिए जिससे ये मूत्र में आसानी से निकल जाएँ तथा गुर्दो में इनका सांद्रन ज्यादा न हो ।
  • बुजुर्गों, मधुमेह तथा रक्तचाप के रोगियों तथा निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) के शिकार व्यक्तियों के गुर्दो पर दवाओं का दुष्प्रभाव ज्यादा होता है । इसलिए ऐसे रोगियों को इन दवाओं का किडनी पर दुष्प्रभाव से बचने के लिए इनका सेवन नहीं करना चाहिए |

किडनी रोगी दवाओं के दुष्प्रभाव से कैसे बचें?

दवाओं का किडनी पर दुष्प्रभाव से बचने के लिए किडनी रोगी निम्नलखित टिप्स का अनुसरण कर सकते हैं |

  • किडनी रोगी को बिना जरूरत के कोई भी दवा नहीं लेनी चाहिए, भले ही वह विटामिन की गोली क्यों न हो ।
  • विटामिन की जरूरतों को भी प्राकृतिक स्रोतों (फल, सब्जी एवं सलाद आदि) से पूरा किया जा सकता है । अगर दवा लेना आवश्यक हो, तो उस रासायनिक ग्रुप की सबसे सुरक्षित उपलब्ध दवा लेने का प्रयास करना चाहिए ।
  • अगर व्यक्ति के गुर्दे में पहले से ही कुछ खराबी हो और खून में यूरिया, क्रियेटिनीन की मात्रा ज्यादा हो तो दवा की खुराक घटा देनी चाहिए । कुछ एंटीबायोटिक्स की खुराक 30-50% घटानी पड़ती है ।
  • किडनी रोगी को दवाओं का किडनी पर दुष्प्रभाव ज्यादा होने की सम्भावना रहती है, अतः सेवन के क्रम में दुष्प्रभाव के लक्षणों, जैसे शरीर में सूजन, मूत्र में एल्ब्युमिन आदि पर विशेष निगाह रखने की जरूरत होती है ।
  • किडनी रोगी के रक्तचाप एवं मूत्र की मात्रा पर ध्यान रखते हुए उसे किडनी पर दुष्प्रभाव से बचाने के लिए जल एवं द्रव्यों की मात्रा डॉक्टरी सलाह पर बढ़ाकर 2-3 लीटर प्रतिदिन किया जा सकता है, जिससे दवा की अतिरिक्त मात्रा मूत्र से निकल जाए ।
  • होम्योपैथी एवं आयुर्वेदिक दवाएँ भी गुर्दो को क्षति पहुँचा सकती हैं । इनका सेवन बहुत सोच-समझ कर करना चाहिए । आयुर्वेदिक दवाओं में कभी-कभी पारा (मरकरी), जस्ता आदि का भस्म एवं पोटैशियम लवण आदि दे दिए जाते हैं, जो गुर्दो के लिए हानिकारक सिद्ध होते हैं ।

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