किडनी रोग एवं मूत्र रोगों के लक्षण Symptoms of Kidney and Urinary Diseases.

किडनी रोग एवं मूत्र रोगों पर एक साथ बात करना इसलिए जरुरी हो जाता है क्योंकि किडनी एवं मूत्रवाहिनी उत्सर्जन तंत्र के दो प्रमुख भाग हैं | किडनी का काम खून की सफाई करके मूत्र बनने का होता है तथा मूत्राशय एवं मूत्रनली का कार्य मूत्र का संचयन करके उसे शरीर से बाहर निकालने का होता है । यद्यपि दोनों भाग उत्सर्जन तंत्र के अंग हैं पर इनकी बीमारियों में अलग-अलग प्रकार की तकलीफें होती हैं । किडनी रोग के प्रारम्भिक लक्षण, भूख की कमी, कमजोरी, थकान, उबकाई आना, उल्टी होना, खून की कमी एवं उच्च रक्तचाप आदि हैं, जो कई अन्य बीमारियों में भी हो सकते हैं । चेहरे एवं पैरों में सूजन आ सकती है । सुबह सो कर उठने पर आँखों के पपोटे सूजे हो सकते हैं । उपरोक्त लक्षणों से पीड़ित रोगी के मूत्र एवं रक्त की जाँच के बाद ही किडनी रोग का पता लग पाता है । अक्सर देखा गया है की इन लक्षणों को साधारण तकलीफ मान कर रोगी बहुत दिनों तक इन्हें नजरअन्दाज करते रहता है ।

किडनी रोग के लक्षण

किडनी रोग के लक्षण (Symptoms of Kidney diseases in Hindi):

किडनी रोग के मुख्य लक्षण इस प्रकार से हैं |

किडनी रोग में सूजन हो सकती है:

यह ज्ञात है कि शरीर के विभिन्न अंग-हृदय, आंत, लीवर, गुर्दे आदि मिल कर शरीर में नमक एवं जल की मात्रा सन्तुलित रखते हैं । जितना जल हम भोजन के साथ एवं पानी पीकर लेते हैं, जल की उतनी ही मात्रा पसीना, साँस, मल एवं मुख्यतया मूत्र से बाहर आ जाती है । इस सन्तुलन के बिगड़ने पर, जल की कमी होने से निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) होता है तथा जल की अधिकता होने पर शरीर में सूजन आ जाती है । किडनी रोग अर्थात गुर्दो की अनेक बीमारियाँ शरीर में सूजन कराती हैं । सूजन की स्थिति में जल का जमाव दिनभर खड़े एवं बैठे रहने के कारण प्रायः पैरों में, एड़ी के पास होता है क्योंकि जल नीचे की दिशा में बढ़ता है । लेटे रहने पर शरीर के अन्दर जल की मात्रा में वृद्धि होने पर यह त्वचा के नीचे जमा होने लगता है । इस कारण आँखों के पपोटे सूज जाते हैं तथा चेहरा एवं शरीर भारी-भारी-सा लगता है । सूजन का पता लगाने के लिए पैर की एड़ी के ऊपर त्वचा को अंगूठे से पूरे एक मिनट दबाते हैं, तत्पश्चात् अंगूठा हटाने पर अगर गड्ढा कुछ देर तक बना रहता है, तो इस अवस्था को सूजन कहते हैं । किडनी रोग में शरीर में जल का जमाव ज्यादा होने पर, त्वचा के अलावा अन्य स्थानों पर भी जल बढ़ जाता है । जब शरीर में एकत्र अधिक जल पेट में जमा होता है, तो उसे जलोदर (जल + उदर) कहते हैं । जल फेफड़ों को ढकनेवाली झिल्लियों के बीच (प्ल्युरल इंफ्युजन) एवं हृदय की बाहरी झिल्लियों के बीच (पेरिकॉर्डियल इंफ्युजन) भी जमा हो सकता है । शरीर में सूजन होने के अनेक कारण होते हैं । ऐसे व्यक्ति, जो अंगों से तो स्वस्थ हों पर जल एवं नमक की मात्रा ज्यादा लेते हों, वातानुकूलित कमरे में दिन भर रहते हों एवं शारीरिक गतिविधि नहीं करते हों उनके पैरों में भी सूजन आ सकती है । गुर्दा रोग या किडनी रोग के कारण होने वाली  सूजन को प्रायः मरीज या उसके साथी सुबह में आँखों के नीचे सूजन के रूप में नोटिस करते हैं, जो गुर्दा रोग की पहली निशानी हो सकती है ।

मूत्र की मात्रा में परिवर्तन:

गुर्दा रोगों के विश्लेषण में एक अत्यन्त सरल परन्तु महत्त्वपूर्ण बात है पूरे दिन में किए गए मूत्र की मात्रा (Volume) जानना । पेशाब की मात्रा में अत्यन्त कमी या अत्यन्त वृद्धि गुर्दा रोग का संकेत है । गुर्दो का काम मूत्र के माध्यम से शरीर के हानिकारक तत्त्वों को हटाना है, जिसके लिए मूत्र की एक निश्चित मात्रा (वॉल्यूम) की जरूरत होती है । एक वयस्क में प्रतिदिन 800 मिलीलिटर से 2500 मिलीलिटर मूत्र बनता है । पेशाब की मात्रा, दिन भर में पिए गए जल एवं अन्य द्रव्यों की मात्रा तथा पसीने एवं मल से उत्सर्जित जल के अंश पर निर्भर करती है । डायरिया एवं उल्टी से जल निकल जाने पर पेशाब की मात्रा घट जाती है ।

मूत्र की मात्रा में कमी (Oliguria):

अगर मूत्र की मात्रा एक दिन में 400-500 मिलीलिटर से कम हो जाती है तो शरीर से हानिकारक तत्त्व पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाते हैं, और इस स्थिति को अल्पमूत्रता (ऑलिगुरिया) कहते हैं ।

मूत्र न आना (Anuria):

जब शरीर के द्वारा बनाए जा रहे मूत्र की मात्रा 100 मिलीलिटर से कम या शून्य हो जाती है तो उस स्थिति को अमूत्रता (एन्युरिया) कहते हैं । अमूत्रता की स्थिति जान के लिए खतरा हो सकती है । कभी-कभी व्यक्ति के गुर्दे मूत्र तो बनाते हैं, पर पेशाब के बहाव में रुकावट हो जाती है, जिसके कारण पेट का निचला हिस्सा, पेडू फूल जाता है एवं व्यक्ति दर्द से छटपटाने लगता है । चिकित्सक पेडू पर हाथ रखकर पेशाब से भरे थैले को परख लेते हैं । ऐसी स्थिति में मूत्र मार्ग (यूरेथ्रा) से एक महीन नली (कैथेटर) डालने पर पेशाब बाहर निकाला जा सकता है । चिकित्सक के द्वारा उक्त दो स्थितियों, पेशाब का नहीं बनना (जो किडनी रोग है) तथा पेशाब का नहीं उतरना (जो मूत्र करने में रुकावट है) में अन्तर करना बहुत आवश्यक होता है ।

ज्यादा पेशाब आना (Polyuria):

पेशाब ज्यादा होने के दो पहलू हैं एक तो पेशाब की मात्रा का ज्यादा होना, अर्थात् वयस्क के लिए चौबीस घंटे में चार लीटर (4000 मिली लीटर) से ज्यादा पेशाब का बनना । दूसरा पहलू है पेशाब करने की बारम्बारता में वृद्धि–इसमें रोगी बार-बार पेशाब करने जाता है परन्तु पेशाब की मात्रा ज्यादा नहीं होती है । किडनी रोग के अलावा अतिमूत्रता यानिकी पेशाब की मात्रा ज्यादा होना (Polyuria) के कई

कारण होते हैं ।

  • रक्त में शुगर की मात्रा का बढ़ना (डायबिटीज),
  • रोगी ज्यादा पानी पी रहा हो,
  • हार्मोन ए.डी.एच. की कमी,
  • दवाओं का प्रभाव-जैसे मैनिटॉल, लैसिक्स, लिथियम का सेवन,
  • शराब का सेवन ।

पेशाब बार-बार जाना (Increased Frequency of Micturition) का प्रमुख कारण पेशाब की थैली में संक्रमण (सिस्टाइटिस) होता है । इसके अलावा परेशानी, तनाव, नर्वसनेस में भी व्यक्ति बार-बार पेशाब करने जा सकता है ।

किडनी रोग में प्रोटीनमेह (प्रोटीनुरिया):

हमारे रक्त में विभिन्न प्रकार के ग्लोबुलिन, एल्ब्युमिन आदि प्रोटीन की मात्रा लगभग 7-8 ग्राम प्रति 100 मि.ली. रक्त में होती है । मूत्र से प्रोटीन की एक सूक्ष्म मात्रा, लगभग 150 मि.ग्रा. प्रतिदिन हमारे शरीर से विसर्जित होती है । किडनी रोग में शरीर से उत्सर्जित एल्ब्युमिन की मात्रा सामान्य से बढ़ जाती है जिस अवस्था को प्रोटीनुरिया या और सटीक अभिव्यक्ति में एल्ब्युमिनुरिया कहते हैं और यह किडनी  रोग का महत्त्वपर्ण संकेत होता है । बुखार के दौरान बिना किसी गुर्दा क्षति के ही एल्ब्युमिन की एक सूक्ष्म मात्रा मूत्र में आ सकती है । एल्ब्युमिनुरिया के सही अनुमान के लिए चौबीस घंटे के मूत्र को एकत्र करके उसमें एल्ब्युमिन की मात्रा नापी जाती है ।  मूत्र के किसी एक सैम्पल में एल्ब्युमिन की मात्रा जानने के लिए रासायनिक पट्टी (डिप-स्टिक या एल्बुस्टिक) का प्रयोग किया जाता है । इसमें एक रसायन लेपित कागज की पट्टी एक या दो मिनट के लिए मूत्र में डुबाई जाती है जिसके रसायन में रंग परिवर्तन के आधार पर मूत्र में एल्ब्युमिन की मात्रा का अनुमान लगाया जाता है ।

युरीमिया (रक्त यूरिया एवं क्रिएटिनिन में वृद्धि) के लक्षण:

इनके बढ़ने से भूख में कमी, हूल आना, उल्टी (Anorexia, Nausea, Vomiting) इत्यादि हो सकते हैं | किडनी रोग में रक्त में बढ़े हुए यूरिया तथा क्रिएटिनीन जैसे हानिकारक रसायनों से मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है तथा भूख खत्म हो जाती है, हूल आता है और उल्टी हो सकती है । कमजोरी, थकान, नींद की कमी या हरदम उनींदा रहना हो सकता है, जो युरीमिया के लक्षण हैं ।

मूत्र रोग के लक्षण:

कभी कभी रोगी मूत्र रोग के लक्षणों को किडनी रोग का लक्षण समझ बैठता है इसलिए यहाँ पर मूत्र रोग के लक्षणों के बारे में भी जानना बेहद जरुरी हो जाता है |

पेशाब में जलन एवं बार-बार पेशाब जाना:

ये दोनों लक्षण कई कारणों से हो सकते हैं परन्तु प्रायः मूत्र मार्ग में संक्रमण के कारण होते हैं । इनके साथ नाभि के नीचे पेट में तथा पीछे कमर मे भी दर्द हो सकता है । दर्द अंडकोषों एवं गुदा-मार्ग की दिशा में बढ़ सकता है । मूत्राशय के शोथ (सिस्टाइटिस) में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दर्द के साथ बार-बार पेशाब होता है । साथ ही पेशाब के अन्त में एक-दो बूंद ताजा खून या रक्त-मिश्रित मूत्र आ सकता है ।  मूत्र नली में संकरापन, मूत्राशय में पथरी एवं प्रोस्टेट ग्रंथि के विकार से भी पेशाब में जलन एवं बारम्बारता में वृद्धि हो सकती है ।

मूत्र में रुकावट (Obstruction, Retention of Urine):

मूत्र के प्रवाह में रुकावट मूत्रवाहिनी या मूत्रनली में हो सकती है । मूत्रवाहिनी में रुकावट (जैसे पथरी के कारण) होने पर उस तरफ के गुर्दे की मूत्रग्राही थैली फैल जाती है और गुर्दे के उत्तकों पर दबाव पड़ता है । मूत्रनली में रुकावट होने पर मूत्राशय को ज्यादा ताकत लगानी पड़ती है । रोगी कुंथते हुए बेचैनी से पेशाब करता है । लम्बी अवधि तक रुकावट रहने पर मूत्राशय की मांसपेशियाँ मोटी हो जाती हैं । रुकावट के तीव्रता ज्यादा होने पर मूत्राशय से बैलून जैसे उभार (Diverticulum) निकल आते हैं, और दोनों गुर्दो में फैलाव (Hydronephrosis) भी हो सकता है ।

मूत्र में रक्त आना (हीमैचुरिया):

ज्यादा मात्रा में रक्तस्राव होने पर पेशाब का रंग गुलाबी, चाय या कोला रंग का हो जाता है । कम मात्रा में रक्तस्राव की जानकारी मूत्र की सूक्ष्मदर्शी जाँच में रक्त कण पाए जाने पर मिलती है । उत्सर्जन तंत्र के किसी भी भाग गुर्दा, यूरेटर और मूत्राशय में रक्तस्राव होने पर लाल, रक्त मिश्रित मूत्र बाहर आ जाता है । मूत्रनली (यूरेथ्रा) में रक्तस्राव होने पर शुद्ध लाल रक्त निकलता है । पेशाब में रक्त का आना सदैव किसी रोग का सूचक होता है तथा प्रायः बात गम्भीर होती है । अतः शीघ्रातिशीघ्र रक्तस्राव का कारण पता लगाना जरूरी होता है । रक्तस्राव के कारणों की सूची बहुत लम्बी है, अतः इस निदान को विशेषज्ञ चिकित्सकों के भरोसे रखना ही उचित है ।

किडनी रोग के अन्य लक्षण:

किडनी रोग होने पर अर्थात गुर्दो के अस्वस्थ होने पर शरीर के अनेक अंग–हृदय, पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र, तंत्रिका तंत्र आदि प्रभावित होते हैं । शरीर में रक्त की कमी (एनीमिया) हो सकती है, जो कमजोरी एवं थकान कराने के साथ-साथ हृदय की कार्यक्षमता घटा कर हार्ट फेल्योर (Heart-Failure) तक करा सकती है ।

  • किडनी रोग से प्रभावित व्यक्ति के रक्तचाप में वृद्धि होती है जो हार्ट-अटैक का कारण बन सकता है ।
  • शरीर में हार्मोनों के असन्तुलन के चलते कामेच्छा (Libido) में कमी आ सकती है ।
  • रोग प्रतिरोध क्षमता में कमी होने से विभिन्न अंगों में संक्रमण (Infection) हो सकता है ।

यह भी पढ़ें:

जन्म से ही होने वाली किडनी की विकृतियाँ

किडनी की रचना एवं कार्य

About Author:

HBG Health desk is a team of Experienced professionals holding various skills. They are expert to do research online and offline on health, beauty, wellness, and other components of health in Hindi.

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *