किडनी रोग में डॉक्टरी जांचों की जानकारी ।

आधुनिक चिकित्सा पद्धति (Modern Medical Science) में प्रमाण आधारित चिकित्सा (Evidence Based Medicine) को अहमियत दी जाती है । रोगी के लक्षणों एवं शरीर की प्रारम्भिक जाँच (Clinical Examination) के बाद बनी सम्भावनाओं को सिद्ध करने के लिए रक्त, मूत्र, शरीर के चित्रांकन जाँचों (Imaging) आदि के द्वारा सबूत जुटाए जाते हैं एवं प्रायः पक्के सबूतों के आधार पर इलाज शुरू किया जाता है। उत्सर्जन तंत्र के विभिन्न रोगों के लक्षण मिलते-जुलते, एक समान होने के कारण रोगों के सटीक निदान में निम्न जाँचों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है।

tests in kidney diseases
  • मूत्र की जाँच (Test of Urine)
  • रक्त की जाँच (Test of Blood)
  • इमेजिंग-एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, सी.टी. स्कैन, एम.आर.आई.
  • अन्तर्दर्शीय जाँच (Endoscopy)
  • गुर्दा की बायोप्सी (Biopsy)
  • पथरी की रासायनिक विश्लेषण जाँच (Stone Analysis)

पूरा आर्टिकल (लेख) एक नज़र में.

 मूत्र की जाँच (Urine Test)

पेशाब की जाँच में इसमें उत्सर्जित हो रही शुगर, एल्ब्युमिन, युरोबिलिनोजन, सफेद एवं लाल रक्त कणों की मात्रा आदि देखी जाती है।

शुगर की जांच

डायबिटीज के रोगियों में जब रक्त में शुगर की मात्रा लगभग 200 मि.ग्रा. प्रति 100 मि.ली. ज्यादा हो जाती है, यह पेशाब में प्रवाहित होने लगता है। ऐसे व्यक्ति में शुगर की उपस्थिति के कारण आस्मोटिक प्रभाव से प्रायः पेशाब की मात्रा (वॉल्यूम) भी बढ़ जाती है।

प्रोटीन की जांच:

सामान्य व्यक्तियों में भी एल्ब्युमिन की एक सूक्ष्म मात्रा (150 मिलीग्राम प्रतिदिन से कम) प्रवाहित होती है। पेशाब के द्वारा शरीर से ज्यादा प्रोटीन का गिरना, गुर्दा रोग का द्योतक होता है।

यूरोबिलीनोजन :

जांडिस की स्थिति में हेपेटाइटिस में मूत्र में बिलिरुबिन एवं यूरोबिलीनोजन की मात्रा बढ़ जाती है। पित्त के प्रवाह में रुकावट के कारण हुए जांडिस (Obstructive Jaundice) में मूत्र में युरोबिलिनोजन की मात्रा घट जाती है।

सफेद रक्त कण एवं बैक्टीरिया:

पेशाब में सफेद रक्त कणों (Leucocytes) की ज्यादा मात्रा प्रायः संक्रमण के कारण होती है। मूत्र में बैक्टीरिया को सूक्ष्मदर्शी उपकरण (माइक्रोस्कोप) के द्वारा देखा जाता है। मूत्र के कल्चर एवं सेंसिटिविटी टेस्ट के द्वारा संक्रमण की गम्भीरता, बैक्टीरिया का प्रकार एवं इस पर असर करने वाले दवाओं की जानकारी मिल सकती है।

पेशाब में रक्त कण एवं रक्तस्राव:

रक्त मिश्रित पेशाब एवं पेशाब में लाल रक्त कणों का प्रवाह गुर्दा, मूत्रनली, मूत्राशय, पुरुष ग्रंथि और इंद्रिय के विकार में हो सकता है। पेशाब में रक्त आने पर शीघ्रातिशीघ्र चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए।

 मूत्र में ठोस कणों (क्रिस्टल) की सूक्ष्मदर्शी जाँच :

पेशाब में ठोस कणों (क्रिस्टल) की जाँच सूक्ष्मदर्शी उपकरणों के द्वारा एक विशिष्ट पोलराइज्ड लाइट के सहयोग से की जाती है। क्रिस्टल के आकार एवं रंग से उसकी रासायनिक रचना का अनुमान लगाया जा सकता है, तथा अगर व्यक्ति पथरी रोग से ग्रस्त है, तो पथरी के प्रकार का अनुमान लगाकर उसे घुलाने का प्रयास किए जा सकते हैं।

मूत्र की पीएच जाँच (pH):

इस जाँच से पता चलता है कि मूत्र अम्लीय है अथवा क्षारीय। क्षारीय मूत्र में कैल्शियम फॉस्फेट स्टोन  बनने की सम्भावना ज्यादा होती है। मूत्र के संक्रमण में पी.एच. जाँच से सम्भावित कीटाणु का अनुमान लगाया जा सकता है तथा सटीक कीटाणुरोधक (एंटीबायटिक) दी जा सकती है।

कुछ दवाएँ भी गुर्दे में ठोस कणों का रूप धारण कर गुर्दो के कार्य में बाधा डाल सकती हैं। इन दवाओं (जैसे सल्फा ग्रुप, एमोक्सिसिलिन, एसाइक्लोविर आदि) का प्रयोग विशेष सावधानी से किया जाना चाहिए।

गुर्दा-मूत्र रोग में रक्त जाँच:

गुर्दा रोग की स्थिति में शरीर में हानिकारक यौगिकों-यूरिया, क्रिएटिनिन आदि की मात्रा बढ़ जाती है। इसके साथ रक्त में अनेक तत्त्वों का, जैसे सोडियम, पोटाशियम, कैल्शियम, फास्फेट आदि का सन्तुलन बिगड़ जाता है।  रक्त में इनकी मात्रा का पता लगाकर तथा सामान्य से तुलना करके गुर्दा रोग की स्थिति, प्रकार एवं भीषणता (Severity) का पता लगाया जाता है। रक्त में यूरिया एवं क्रिएटिनीन की बढ़ी मात्रा गुर्दो की कार्यक्षमता में कमी का द्योतक है।

किडनी रोग में रेडियोलॉजी एवं इमेजिंग जाँच:

एक्स-रे (X-Ray):

पेट का सादा एक्स-रे (KUB-Kidney, Ureter & Bladder Area) मूत्र तंत्र की लगभग नब्बे प्रतिशत पथरियों का पता लगाने में कारगर होता है। जिन पथरी में फास्फेट एवं ऑक्जेलेट की मात्रा होती है, वे एक्स-रे में दिखती हैं। यूरिक एसिड से बनी पथरियाँ पेट के सादे एक्स-रे जाँच में नहीं दिखती हैं। पेट के एक्स-रे में किडनी एक सफेद परछाईं-सी दिखती है जिससे उसकी ध्रुवीय लम्बाई का पता लगाया जा सकता है। वयस्कों की किडनी, एक्स-रे में 11-14 से.मी. लम्बी दिखती है। ध्यान देने योग्य बात है कि एक्स-रे में तकनीकी कारण (मैग्नीफिकेशन) से गुर्दा, अल्ट्रासाउंड जाँच की अपेक्षा बड़ा दिखता है। सामान्यतः दाहिना गुर्दा पेट के अन्दर बाएँ की अपेक्षा कुछ नीचे अवस्थित होता है तथा लम्बाई में इससे लगभग 1-2 सें.मी. छोटा होता है।

 यूरोग्राफी (Urography or Intravenous Pyelography) :

आई.वी.पी.-यूरोग्राफी एक विशेष प्रकार की एक्स-रे जाँच है। इसमें रोगी की बाँह की शिरा (वेन) में आयोडिन युक्त दवा की सूई लगाई जाती है, जो तेजी से गुर्दे से उत्सर्जित हो कर मूत्र में प्रवाहित होती है। सूई लगाने के बाद कुछ-कुछ मिनटों के अन्तराल पर पेट के पाँच-छह एक्स-रे चित्र लेने से मूत्र तंत्र-किडनी, यूरेटर, ब्लैडर आदि की पूरी बनावट देखी जा सकती है, और इनकी संरचना, मूत्र मार्ग में रुकावट, ट्यूमर आदि का पता लगता है। यूरोग्राफी जाँच एक महँगी जॉच है और इसकी तीन मुख्य हानियाँ है।

  • इस जाँच में अनेक एक्स-रे लिए जाते हैं, जिसमें प्रयुक्त विकिरण (रेडियेशन) शरीर के लिए हानिकारक हो सकती है। गर्भ के प्रथम तीन महीनों में यह जाँच, शिशु के अंग विकास पर बुराप्रभाव ला सकता है।
  • यूरोग्राफी में दी जानेवाली आयोडिन युक्त दवा से रोगी को एलर्जी हो सकती है जिससे उसकी जान भी खतरे में पड़ सकती है।
  • यह दवा गुर्दो को थोड़ा और नुकसान पहुँचा सकती है, अतः गुर्दो के अंशतः क्षतिग्रस्त होने पर यह जाँच नहीं की जा सकती है।

यूरोग्राफी जाँच, रक्त में यूरिया एवं क्रिएटिनीन के स्तर के सामान्य होने पर ही की जाती है। गर्भावस्था में यूरोग्राफी जाँच (और सादा एक्स-रे भी) नहीं करना चाहिए, क्योंकि एक्स-रे विकिरण भ्रूण को हानि पहुँचा सकते हैं। मूत्रवाहिनी नली (यूरेटर), गुर्दो में बने मूत्र को मूत्राशय तक पहुँचाती है। इसका छायांकन यूरोग्राफी द्वारा ही सम्भव है। मूत्रवाहिनी में पथरी, सिकुड़न, कैंसर आदि का पता लगाने के लिए यूरोग्राफी जाँच अन्य जाँचों से ज्यादा उपयोगी है।

यूरेथ्रोग्राफी (Urethrography):

यूरेथ्रोग्राफी में मूत्रनली में आयोडीनयुक्त द्रव्य (Iodine Containing Contrast Agent) प्रवाहित करके मूत्र मार्ग के एक्स-रे चित्र लिए जाते हैं। इससे मूत्र मार्ग की सिकुड़न का पता लगाया जा सकता है।  

अल्ट्रासाउंड (Ultrasound) :

अल्ट्रासोनोग्राफी एक सुरक्षित, सरल, सस्ती एवं दर्दरहित जाँच प्रक्रिया है जिससे पेट के अन्दर के सभी अंगों के चित्र लिए जा सकते हैं और रोगों का पता लगाया जा सकता है।  अल्ट्रासाउंड जाँच द्वारा सुनिश्चित किया जा सकता है कि व्यक्ति के दो गुर्दे हैं, या एक तथा उनका स्थान और आकार क्या है। अल्ट्रासाउंड नाप में वयस्क व्यक्तियों के गुर्दे की लम्बाई 9-12 सेंटीमीटर होती है। आकार के साथ-साथ उसकी बनावट की विस्तृत जानकारी, जैसे कोर्टक्स, मेड्यूला और मूत्र संग्रहण का भाग (पेल्विस), अल्ट्रासाउंड जाँच से ली जाती है। कुछ व्यक्तियों में गुर्दे अपने स्थान से नीचे खिसके (Ectopic) होते हैं। गुर्दो के बनावट की लगभग सभी विकृतियाँ अल्ट्रासोनोग्राफी के द्वारा पता लगायी जा सकती हैं। गुर्दो के छोटे एवं सिकुड़े होने का अर्थ होता है कि गुर्दे की बीमारी लम्बे अरसे से चल रही है। अल्ट्रासाउंड के द्वारा गुर्दे की पथरी तथा उससे पैदा की जा रही रुकावट का सही अनुमान लगाया जा सकता है। गुर्दो की सूजन, ठोस गाँठ या तरल भरी सिस्ट (Cyst) की जानकारी इससे मिलती है। अल्ट्रासाउंड जाँच उपलब्ध होने के बाद अब अनेक स्वस्थ व्यक्तियों के गुर्दो मे भी एक या दो सिस्ट दिखते हैं, जो बढ़ती उम्र के कारण शरीर में हो रहे परिवर्तनों के कारण हैं। अगर सिस्ट के भीतर कोई ठोस गांठ (Solid Nodule) या पर्दे (Septa) नहीं है तो इसे साधारण सिस्ट (Simple Cyst) कहते हैं, और इसे रोग नहीं माना जाता है। पचास वर्ष से ऊपर लगभग पचास प्रतिशत व्यक्तियों के गुर्दो में एक-दो सिस्ट पाए जाते हैं।

अल्ट्रासाउंड के द्वारा उत्सर्जन तंत्र के सभी अंग गुर्दा, मूत्रवाहिनी, मूत्राशय, पुरःस्थ ग्रंथि एवं मूत्र नली की जाँच कर उनके रोगों का निदान किया जा सकता है। इस तंत्र की पथरी, ट्यूमर, पुरःस्थ ग्रंथि में सूजन, मूत्रत्याग में रुकावट जैसे रोगों का पता अल्ट्रासाउंड जाँच के द्वारा किया जा सकता है। इनके अलावा किडनी में घाव (Abscess) और खून का थक्का (Haematoma) आदि का पता भी सोनोग्राफी से चलता है।  पॉलिसिस्टिक गुर्दा रोग के मरीजों के सगे-सम्बन्धियों (भाई-बहन, पुत्र-पुत्री आदि) की गुर्दा की स्क्रीनिंग कर उनमें इस रोग की सम्भावना का पता लगाया जाता है। बुजुर्गों में मूत्राशय के द्वार पर स्थित प्रोस्टेट ग्लैंड (पुरस्थ ग्रंथि, गदूद) के बढ़ने से पेशाब के प्रवाह में रुकावट होती है। अल्ट्रासाउंड जाँच के द्वारा इस ग्रंथि की बढ़त का पता लगाया जा सकता है। साथ ही, पेशाब करने के बाद मूत्राशय में मूत्र की बची मात्रा माप कर, मूत्रत्याग में होने वाली रुकावट का अनुमान लगाया जा सकता है। सोनोग्राफी में देखते हुए गुर्दे की बायोप्सी भी की जा सकती है एवं प्राप्त उत्तक की सूक्ष्मदर्शी उपकरण से अध्ययन करके गुर्दा रोग का सटीक निदान (डायग्नोसिस) किया जा सकता है।

अब अल्ट्रासोनोग्राफी के छोटे, पोर्टेबल उपकरण भी उपलब्ध हैं जो सघन चिकित्सा कक्ष में गम्भीर रूप से बीमार मरीजों के बिस्तर के समीप ले जाकर रोग निदान में प्रयोग किए जा सकते हैं। गुर्दे में धमनी (आर्टरी) के द्वारा पहुँचाए जा रहे तथा शिरा (वेन) के द्वारा वापस लाए जा रहे रक्त के प्रवाह का विश्लेषण, डॉप्लर अल्ट्रासाउंड के सहयोग से किया जा सकता है। प्रत्यारोपित गुर्दे (ट्रांसप्लांट किडनी) तथा इसके रक्त संचालन की जाँच के लिए डॉप्लर अल्ट्रासाउंड की विशेष उपयोगिता है। प्रत्यापित गुर्दे की डॉप्लर जाँच कर ‘रिजेक्शन की प्रारम्भिक अवस्था की जानकारी ली जा सकती है और बचाव के उपाय किए जा सकते हैं। वर्तमान समय में उत्सर्जन तंत्र के रोग निदान हेतु अल्ट्रासाउंड जाँच प्रथम एवं सर्वाधिक लाभप्रद जाँच है।

 रेडियो आइसोटोप रीनल स्कैन (Radio Isotope Renal Scan):

इस जाँच के द्वारा गुर्दो की कार्यशीलता (Function) का अनुमान लगाया जाता है। जाँच हेतु रेडियोसक्रिय पदार्थ (रेडियोएक्टीव मेटेरियल) की एक सूक्ष्म मात्रा शिरा के द्वारा रक्त में डाली जाती है जो गुर्दो में सांद्रित हो कर उत्सर्जित होती है। इस जाँच से पता लगता है कि दोनों गुर्दे अलग-अलग कितना प्रतिशत काम कर रहे हैं, और इसकी तुलनात्मक जानकारी ली जा सकती है।

सी.टी. स्कैन एवं एम.आर.आई. जाँच (Computerised Axial Tomographic Scan and Magnetic Resonance Imaging) :

इन आधुनिक मशीनों द्वारा पेट के अन्दर के चित्र लिए जाते हैं जिनका विश्लेषण करके रोगों का पता चलता है। प्रायः अल्ट्रासाउंड जाँच से मिली जानकारी को बढ़ाने के लिए तथा सम्पुष्ट (Confirm) करने के लिए ये जाँचें की जाती हैं। मूत्र तंत्र में कैंसर होने पर, ट्यूमर का फैलाव, लिम्फनोड्स की स्थिति का इससे पता लगता है।

 मूत्र मार्ग की अन्तर्दर्शी जाँच (Cysto-Urethroscopy):

 मूत्र रोग विशेषज्ञ एक पतली नलीनुमा उपकरण पेशाब के रास्ते में डालकर मूत्रनली, मूत्राशय आदि की अन्दरूनी कक्ष को देखते हैं और बीमारी का पता लगाते हैं। सिस्टो-युरेथ्रोस्कोपी जाँच के द्वारा मूत्र नली में सिकुड़न, मूत्राशय में ट्यूमर एवं पथरी आदि को देखा जा सकता है। पेशाब में रक्त आने की स्थिति में रक्तस्राव का कारण पता लगाने में यह जाँच मदद कर सकती है। इस उपकरण की मदद से मूत्राशय के ट्यूमर का ऑपरेशन तथा मूत्राशय और मूत्रवाहिनी में स्थित पथरी को तोड़ा या निकाला जा सकता है। इस जाँच विधि में महीन औजारों की सहायता से मूत्र नली में सिकुड़न एवं प्रोस्टेट ग्रंथि के द्वारा किए जा रहे अवरोध को भी हटाया जा सकता है। इस ऑपरेशन को टी.यू.आर.पी.-ट्रांस-यूरेथ्रल रिसेक्सन ऑफ प्रोस्टेट कहा जाता है।

गुर्दे की बायोप्सी:

बायोप्सी जाँच में गुर्दे का एक महीन (2-3 मिलीमिटर मोटा) डोरे जैसा टुकड़ा निकाला जाता है और उसकी उत्तकीय (हिस्टोपैथोलॉजी) जाँच सूक्ष्मदर्शी उपकरण की सहायता से की जाती है। | अल्ट्रासाउंड मशीनों के उपलब्ध हो जाने के कारण अब सामान्यतया इस मशीन के द्वारा गुर्दो को देखते हुए उसके निचले छोर के समीप से बायोप्सी की जाती है। यह कार्य प्रशिक्षित गुर्दा रोग विशेषज्ञ, नेफ्रोलोजिस्ट के द्वारा किया जाता है। उत्तक की हिस्टोपैथोलॉजी जाँच से बीमारी का कारण, प्रकार एवं गम्भीरता पता चलती है, जिसे जानकारी के आधार पर सही दवाएँ दी जा सकती हैं। उपचार के पश्चात दोबारा बायोप्सी करके इलाज का प्रभाव एवं रोग की गम्भीरता में बदलाव का अध्ययन किया जा सकता है। गुर्दाशोथ (नेफ्राइटिस) के रोगियों में बायोप्सी का विशेष महत्त्व है। | गुर्दे की बायोप्सी यह सुनिश्चित करने के बाद ही की जाती है कि रोगी का गुर्दा एकल (Single) या अश्वनाल आकार (Horse-Shoe Shape) तो नहीं है। दोनों गुर्दो की उपस्थिति सुनिश्चित करके ही बायोप्सी जाँच की जानी चाहिए।

पथरी का रासायनिक विश्लेषण (Stone Analysis):

 मूत्र तंत्र से विसर्जित या सर्जरी के द्वारा निकाले गए मूत्र तंत्र की पथरी को रासायनिक जाँच करके उसमें विद्यमान कैल्शियम, फॉस्फेट, ऑक्जेलेट, यूरिक एसिड एवं सिस्टीन जैसे पदार्थों की मात्रा का पता लगाया जाता है। पथरी की रासायनिक संरचना के आधार पर दवाएँ लेकर एवं परहेज करने से पथरी के दोबारा होने की सम्भावना घट सकती है।

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