मूत्राशय की पथरी के कारण लक्षण एवं ईलाज. Urinary Stone Cause symptoms and treatment

मूत्राशय की पथरी होना वर्तमान में आम हो गया है मूत्र तंत्र में पथरी के कारण रोगी को मूत्र त्याग करने में कठिनाई एवं दर्द महसूस हो सकता है | कुछ लोगों का मानना होता है की भोजन के साथ कंकड़ इत्यादि पेट में जाने के कारण पथरी होती है जो की सत्य नहीं है | मूत्राशय की पथरी उत्सर्जन तंत्र में ही विकसित होती है न की खाने के साथ शरीर के अन्दर प्रविष्ट करती हैं | किडनी के द्वारा छाने जा रहे मूत्र में जब उपर्युक्त पदार्थो के महीन कण ज्यादा आटे हैं तो वे आपस में चिपक कर पथरी का केंद्र बन सकते हैं | उसके बाद धीरे धीरे इस प्रकार से निर्मित सूक्ष्म केंद्र पर प्रोटीन एवं नए कण चिपक कर पथरी का आकार बढ़ा देते हैं | कहने का अभिप्राय यह है की मूत्र प्रणाली में कहीं रुकावट होने पर जैम मूत्र के महीन कण मूत्राशय की पथरी बना सकते हैं | आज हम हमारे इस लेख के माध्यम से मूत्र की पथरी के कारण, लक्षण एवं ईलाज के बारे में जानने की कोशिश करेंगे |

मूत्राशय की पथरी

 

मूत्राशय की पथरी के कारण (Cause for Urinary Stone in Hindi):

मूत्राशय में पथरी बनने के लिए अनेक बातें जिम्मेदार होती हैं । कुछ बातें हमारे बाहरी परिवेश एवं पर्यावरण से जुड़ी हैं, जबकि कुछ हमारी शरीर के अन्दरूनी संरचना से । तो आइये जानते हैं इन दोनों कारणों के बारे में |

मूत्राशय की पथरी के बाहरी कारण:

  • जिन इलाकों में गर्मी के साथ-साथ आर्द्रता (ह्यूमिडिटी) ज्यादा होती है वहाँ मूत्र तंत्र में पथरी ज्यादा बनती है । इस मामले में लगभग पूरे उत्तर भारत में रहनेवालों में पथरी बनने की सम्भावना पूरी रहती है ।
  • खान-पान में दूध और दूध की बनी चीजें एवं टमाटर, साग, चाकलेट, काजू, खीरा आदि का अत्यधिक प्रयोग भी पथरी को बढ़ावा देता है ।

मूत्राशय की पथरी के आंतरिक कारण:

  • कुछ व्यक्तियों की जेनेटिक संरचना पथरी को बढ़ावा देती है । एक ही प्रकार का भोजन लेने तथा जलवायु में रहने वाले दो व्यक्तियों में सम्भव है कि एक व्यक्ति पथरी का बार-बार शिकार हो रहा हो तो दूसरा बिलकुल ही नहीं ।
  • सामान्यतया शरीर की आंतें, कैल्शियम एवं ऑक्जेलेट आदि पथरी करानेवाले पदार्थों की उतनी मात्रा ही सोखती है जितनी कि शरीर को जरूरत होती है । अगर इनकी ज्यादा मात्रा ली जाए, या आंत इन्हें ज्यादा सोख ले, तो मूत्र में इनके उत्सर्जित होने की मात्रा भी बढ़ेगी, जो पथरी बनने को बढ़ावा देगी ।
  • जीन की विविधता के कारण कुछ व्यक्ति ‘पथरी बनानेवाले (Stone Former) और इसके विपरीत, कुछ लोग ‘पथरी नहीं बनानेवाले (Non-Stone Former) होते हैं । ‘स्टोन फॉर्मर’ के मूत्र में रह-रहकर महीन कण या बालू के आकार की पथरियाँ निकलती रह सकती हैं जिन्हें कैल्सियुरिया कहते हैं ।
  • इनके मूत्र की सूक्ष्मदर्शी जाँच में बहुतायत में क्रिस्टल देखे जा सकते हैं जिन्हें क्रिस्टल्युरिया कहते हैं । इन क्रिस्टल की आकृति देख कर उनके रासायनिक गुण का पता लग सकता है तथा बचाव एवं इलाज के उपाय किए जा सकते हैं ।

मूत्राशय की पथरी के लक्षण (Symptoms of Urinary Stone in Hindi):

  • मूत्राशय की पथरी के लक्षण उनके स्थान (यथा गुर्दा, मूत्रवाहिनी, मूत्राशय), आकार (साइज) एवं बनावट (शेप) आदि पर निर्भर करता है । गुर्दो में पथरी वर्षों तक बिना तकलीफ दिए (साइलेंट) पड़ी रह सकती है, और किसी अन्य कारण से की गई एक्स-रे अथवा अल्ट्रासाउंड जाँच में झलक सकती है । लेकिन फिर भी इसके कुछ प्रमुख लक्षण हैं जो इस प्रकार से हैं |
  • मूत्र तंत्र की पथरी का प्रमुख लक्षण पेट में दर्द है जो पथरी के लगभग तीन-चौथाई मरीजों में मिलता है । दर्द का प्रकार एवं तीव्रता पथरी के स्थान पर निर्भर करता है ।
  • जब पथरी मूत्रवाहिनी नली (यूरेटर) के द्वारा गुर्दे से मूत्राशय की दिशा में बढ़ती है पेट के बाएँ या दाएँ तरफ (जिधर पथरी हो) तीव्र एवं छटपटाहट कराने वाला दर्द होता है । यह दर्द अत्यन्त कष्टदायक होता है तथा रुक-रुककर होता है ।
  • मरीज को बार-बार पेशाब करने की इच्छा होती है । पेशाब थोड़ी-थोड़ी मात्रा में एवं रक्त कणों की उपस्थिति के कारण भूरा या कोका-कोला के रंग का हो सकता है ।
  • मूत्रवाहिनी की नली कुछ स्थानों पर संकरी होती है जहाँ पथरी अटक कर तीव्र दर्द कराती है ।
  • मूत्रवाहिनी की पथरी का दर्द पेट में उसी तरफ (दायाँ अथवा बायाँ) होता है जिस तरफ की मूत्राशय में पथरी रहती है । तथा पेट में ऊपर से नीचे की तरफ बढ़ता है । दर्द के साथ मरीज को उल्टी भी हो सकती है ।
  • मूत्राशय की पथरी का दर्द पेडू (नाभि के नीचे पेट का भाग) में होता है, जो पेशाब करते समय बढ़ जाता है । दर्द पेडू से उतरकर बाह्य जननांगों (पेनिस के छोर) पर जा सकता है । बच्चे के मूत्राशय में अगर पथरी होती है तो पेशाब करते समय वह चीखने-चिल्लाने लगता है और अपने शिश्न (Penis) को खुजलाने/नोचने लगता है । ध्यान देने योग्य बात है कि पेट दर्द के अनेक कारण होते हैं । और हर पेट दर्द को पथरी का लक्षण मान कर परेशान या ‘पैनिकी’ (Panicky) नहीं होना चाहिए ।

पथरी के कारण मूत्र में रक्त कब आता है

मूत्राशय की पथरी के अपनी जगह से नीचे खिसकने पर,जैसे यूरेटर में उतरते समय, पेशाब रक्तिम हो सकता है । मूत्राशय में पथरी होने पर, पेशाब के अन्त में खून की एक-दो बूंदें आ सकती हैं, जो मूत्राशय की अन्दरूनी झिल्ली के छिलने से होती है ।

पथरी के कारण पेशाब में रुकावट कब होती है

मूत्राशय की पथरी होने पर रुक-रुककर पेशाब हो सकता है या पेशाब होते-होते रुक जाता है । ऐसा मूत्रनली के अन्दरूनी द्वार पर पथरी के आ जाने से होता है । रोगी जब अपनी पोजीशन बदलता है, उठता-बैठता या हिलता-डुलता है तब पथरी के आंतरिक मूत्र-द्वार से हट जाने के कारण पेशाब दोबारा होने लगता है । मूत्रवाहिनी (यूरेटर) में पथरी हो जाने पर, पथरी से ऊपर का हिस्सा तथा गुर्दो की मूत्रग्राही थैली फैल जाती है, जिसे ‘हाइड्रोनेफ्रोसिस’ कहते हैं । इस स्थिति में गुर्दो के उत्तकों को क्षति पहुँचती है ।

मूत्राशय की पथरी में  संक्रमण:

पथरी के कारण मूत्र तंत्र में संक्रमण हो सकता है जिस कारण मरीज के पेशाब में पीब (Pus) आ सकता है और उसे बुखार भी आ सकता है । पथरी के कारण मूत्र मार्ग में अवरोध होने से पेशाब का गुर्दे में या मूत्राशय में जमाव हो जाता है, जिसमें बैक्टीरिया के पनपने से संक्रमण हो जाता है ।

मूत्राशय की पथरी का ईलाज (Treatment of Urinary Stone in Hindi)

मूत्राशय की पथरी का इलाज तीन स्तरों पर किया जाता है

  • पथरी के लक्षण-मुख्यतया दर्द का इलाज ।
  • मूत्र तंत्र से पथरी को हटाना ।
  • भविष्य में दोबारा पथरी बनने की सम्भावना को कम करना ।

मूत्राशय की पथरी के दर्द का ईलाज :

पथरी के दर्द से मुक्ति पाने के लिए दर्द निवारक गोली या ज्यादा तकलीफदेह दर्द होने पर इंजेक्शन दिया जाता है । पथरी से प्रभावित व्यक्ति को दर्द कभी भी, किसी समय हो सकता है । अतः डॉक्टर की राय से दर्द की गोली साथ रखना उचित होता है, जिससे रात को, या डॉक्टर से दूर रहने पर दर्द होने पर दवा ली जा सके । दर्द के दौरान बार-बार पेशाब जाने एवं पेशाब में जलन (Dysuria) के लिए दवा एवं संक्रमण से बचने के लिए एंटीबायोटिक दवाएँ दी जाती हैं ।

मूत्राशय की पथरी को हटाना:

मटर के आकार तक की, अर्थात पाँच-छह मिलीमीटर से छोटी पथरियाँ प्रायः मूत्र तंत्र से स्वयं उत्सर्जित हो जाती हैं । जल की प्रचुर मात्रा लेने से मूत्र प्रवाह के साथ, मूत्र मार्ग के सभी सँकरे बिंदुओं को ये पार कर जाती हैं । बड़ी पथरियों को हटाने के लिए पथरी के स्थान पर निर्भर अनेक उपाय उपलब्ध हैं ।

मूत्रवाहिनी, यूरेटर की पथरी का ईलाज:

मूत्रवाहिनी में कुछ अंश संकरे होते हैं  जहाँ पथरी अटककर दर्द कराती है । कुछ दशक पूर्व तक इन्हें सर्जरी करके हटाया जाता था, परन्तु अब महीन दूरदर्शी उपकरण–सिस्टोस्कोप एवं युरेट्रोस्कोप उपलब्ध हो गये हैं । इन्हें मूत्र नली से प्रवेश कराके मूत्राशय एवं मूत्रवाहिनी के पथरी को चूर किया जा सकता है या जालीनुमा बास्केट में फंसाकर निकाला जा सकता है ।

मूत्राशय की पथरी को निकालना :

मूत्राशय की छोटी पथरी दूरदर्शी उपकरण, सिस्टोस्कोप से निकाली जा सकती है जबकि बड़ी पथरी (पाँच से.मी. से बड़ी) के लिए ऑपरेशन की जरूरत पड़ सकती है । पथरियों को हटाने के विभिन्न उपायों के कारण अब मूत्र तंत्र की कोई भी पथरी लाइलाज नहीं है । स्वाभाविक है, चिकित्सक उन उपायों को प्रमुखता देते हैं जिनमें शरीर में कम-से-कम काट-छाँट और हानि पहुँचती हो ।

दर्दरहित (साइलेंट) पथरी के खतरे:

मूत्र तंत्र की पथरी कभी-कभी प्रारम्भिक अवस्था में दर्द कराके शान्त (साइलेंट) हो जाती है और रोगी उन्हें भूल जाता है । दर्द न कराने वाली पथरी भी वस्तुतः शान्त नहीं होती और प्रायः वह धीरे-धीरे आकार में बढ़ती रहती है और अपना दुष्प्रभाव डालती रहती है । अगर पथरी गुर्दे के मूत्रग्राही थैले (पेल्विस) में है तो वह धीरे-धीरे पेल्विस को भरकर, अपनी शाखाएँ कैलिक्स में भेजने लगती है । ऐसी शाखानुमा पथरी गुर्दो के उत्तकों को नष्ट करती है और कभी-कभी गुर्दा ह्रास की अन्तिम अवस्था (एंड-स्टेज रीनल डिसीज) पर पहुँचा सकती है । अगर पथरी मूत्रवाहिनी के संकरे भाग में फँसी हो तो गुर्दे के मूत्रग्राही भाग को फैलाकर (हाइड्रोनेफ्रोसिस) गुर्दे को नष्ट करती है । इन मामलों में दर्द का खत्म हो जाना प्रायः गुर्दे की कार्य क्षमता में कमी इंगित करता है । मूत्र प्रवाह में लम्बे अरसे तक रुकावट से गुर्दो का रक्त संचार घटता है, तथा जमा हुए मूत्र में संक्रमण की सम्भावना बढ़ जाती है । मूत्रवाहिनी में पथरी के लम्बे अरसे तक फंसे रहने के बाद जब उसे हटा भी दिया जाता है, तो उस बिंदु पर भविष्य में सिकुड़न (स्ट्रिक्चर) होने की पूरी सम्भावना रहती है ।  मूत्राशय की पथरी की जानकारी हो जाने पर, उसे नजरअन्दाज नहीं करना चाहिए । अगर पथरी के कारण दर्द, मूत्र में रक्त आना, संक्रमण आदि न भी हो, तो भी उसका यथाशीघ्र सक्रिय इलाज कराना चाहिए । मूत्राशय की पथरी अगर दर्द नहीं कर रही हो तो ज्यादा हानिकारक सिद्ध हो सकती है ।

मूत्राशय की पथरी से बचाव:

  • मूत्र तंत्र में बार-बार पथरी बनने पर विशेषज्ञ की सलाह से कुछ दवाएँ ली जा सकती हैं । कैल्शियम ऑक्जेलेट स्टोन होने पर थायजाइड डायूरेटिक दी जा सकती है । यूरिक एसिड की पथरी बनानेवाले रोगी को एलोप्यूरिनॉल नामक दवा बचाव के लिए दी जाती है, जो रक्त में यूरिक एसिड के स्तर को गिराती है । इन दवाओं का सेवन गुर्दा रोग विशेषज्ञ के परामर्श से ही होना चाहिए ।
  • क्षारीय (एल्केलाइन) मूत्र में बनते हैं जिसे कैल्शियम फास्फेट स्टोन कहा जाता है । अतः बचाव हेतू मूत्र को अम्लीय बनाने की दवा (एस्कॉर्बिक एसिड, विटामिन सी) दी जा सकती है । एस्कॉर्बिक एसिड नीबू, संतरा एवं मौसमी में प्रचुर मात्रा में होता है ।
  • यूरिक एसिड स्टोन अम्लीय मूत्र में बनते हैं, जो यूरिक एसिड की घुलनशीलता को कम कराके इसके क्रिस्टल रूप दे देता है । मूत्र को क्षारीय बनाने से युरिक एसिड स्टोन घुल सकते हैं ।

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