गुर्दा रोगों के ईलाज करने के विभिन्न तरीके (Treatment of Kidneys diseases)

गुर्दा रोगों का इलाज, रोग प्रक्रिया के सटीक निदान, उसके कारण की पहचान तथा गम्भीरता की स्थिति पर निर्भर करता है । रोग की विशिष्ट पहचान के साथ-साथ उसकी तीव्रता या मात्रा का भी निर्णय चिकित्सक को करना पड़ता है । दूसरे शब्दों में, रोग की ‘क्वालिटी के साथ-साथ ‘क्वांटिटी’ का भी अनुमान लगाना होता है । गुर्दा रोगियों एवं उनकी सेवा करने वालों को भी इस बात की जानकारी होनी चाहिए।

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किडनी की सूजन का ईलाज:

जैसा की बताया जा चुका है, शरीर में सूजन गुर्दा के अनेक रोगों का एक प्रमुख लक्षण है और इसे घटाने के लिए चिकित्सक मूत्र बढ़ाने की दवा-डायुरेटिक (Diuretic) देते हैं । साथ में प्रायः नमक की मात्रा (3 ग्राम प्रतिदिन) तथा जल का सेवन (एक लीटर प्रतिदिन) से कम करने की सलाह दी जाती है । इन सुझावों को गम्भीरतापूर्वक अपनाना चाहिए । कभी-कभी चिकित्सक पिछले चौबीस घंटों में हुए पूरे मूत्र की मात्रा जानना चाहते हैं जिसके आधार पर उस व्यक्ति को अगले चौबीस घंटों में दिए जाने वाले पानी की मात्रा की गणना की जाती है। दिए जानेवाले जल की मात्रा, मूत्र की मात्रा से कुछ कम रखकर शरीर से सूजन घटाने का प्रयास किया जाता है । प्रतिदिन एक निश्चित समय पर एक समान कपड़ों तथा एक निश्चित वजन मशीन पर वजन तौलकर शरीर में सूजन के घटने या बढ़ने का अनुमान लगाया जाता है। विभिन्न लक्षणों एवं रोगों का इलाज दवाओं, आहार, परहेज एवं जल की मात्रा के नियंत्रण से किया जाता है।

डायलिसिस प्रक्रिया  (Dialysis)

गुर्दो के सही ढंग से काम नहीं कर पाने की स्थिति में जब उपकरण आधारित विधियों से रक्त की सफाई की जाती है तो उसे डायलिसिस कहते हैं।  डायलिसिस के द्वारा खून के व्यर्थ विषैले रसायनों (यूरिया, क्रिएटिनीन) आदि को दूर किया जाता है। यह शरीर में जल, अम्ल एवं क्षार की मात्रा को सन्तुलित करता है। गुर्दा रोग के मरीज जिनका रक्त में क्रिएटिनिन का स्तर 7 मि.ग्रा. प्रति 100 मि.ली. से ऊपर बढ़ने लगता है, उन्हें कमजोरी, थकान, उबकाई एवं साँस तकलीफ होने लगती है । ऐसे रोगी को प्रायः डायलिसिस की जरूरत पड़ती है ।

डायलिसिस की दो प्रमुख विधियाँ हैं

(1) हीमोडायलिसिस (Haemo-dialysis)

(2) पेरिटोनियल डायलिसिस (Peritoneal Dialysis)

1. हीमोडायलिसिस (Haemodialysis):

आज के आधुनिक युग में वैज्ञानिकों ने ऐसी मशीन का आविष्कार किया है जिसके द्वारा शरीर से खून बाहर निकालकर इसे कृत्रिम गुर्दे द्वारा साफ करके शरीर में वापस भेजा जाता है और गुर्दा रोगी को सामान्य जीवन प्रदान किया जाता है। इस प्रक्रिया को हीमोडायलिसिस कहते हैं । हीमोडायलिसिस में शरीर की एक शिरा (Vein) से रक्त निकालकर कृत्रिम गुर्दा मशीन (आर्टीफीशियल किडनी) में भेजी जाती है, जहाँ रक्त महीन झिल्लियों के बीच से प्रवाहित होता है जिसके दूसरी तरफ तरल द्रव्य (डायलाइसेट) रहता है । झिल्ली के सूक्ष्म छिद्रों के द्वारा यूरिया एवं क्रिएटिनीन के अणु रक्त से बाहर चले जाते हैं। एक जटिल मशीनी प्रक्रिया के द्वारा रक्त के अन्य उपयोगी अवयवों को रोक लिया जाता है। सामान्यतया एक बार में डायलिसिस लगभग चार घंटे की जाती है, तथा हफ्ते में तीन बार इसकी जरूरत पड़ती है। त्वरित गुर्दा हास के मरीजों को कुछ दिनों तक हीमोडायलिसिस करना पड़ सकता है, जब तक उनकी किडनी पुनः काम न शुरू डायलिसिस मशीन कर दे। चिरकालिक गुर्दा ह्रास में जब किडनी की कार्यक्षमता शून्य के स्तर पर पहुँचने लगती है, तब हफ्ते में दो-तीन हीमोडायलिसिस करके रोगी के शरीर को ठीक रखा जाता है। प्रायः ऐसे रोगियों को नये गुर्दे (प्रत्यारोपण) की जरूरत पड़ती है।

2. पेरीटोनियल डायलिसिस (Peritoneal Dialysis):

बच्चों में गुर्दा रोग होने पर पेट में एक छिद्र बनाकर एक प्लास्टिक की नली पेट में डाली जाती है और इसके द्वारा एक विशेष प्रकार का पानी पेट में प्रवेश कराकर खून की सफाई की जाती है। इस प्रक्रिया को पेरिटोनियल डायलिसिस के नाम से जाना जाता है। इसमें पेट की अन्दरूनी झिल्ली पेरीटोनियम का इस्तेमाल अर्धपारगम्य झिल्ली (सेमीपरमिएबल मेम्ब्रेन) की तरह किया जाता है। एक विशेष नली के द्वारा पेट में तरल द्रव्य डाला जाता है और उसे लगभग छह घंटे बाद निकाल लिया जाता है। इस प्रक्रिया को बार-बार दुहराया जाता है। पेरिटोनियल कैविटी में डाले गए द्रव्य की रासायनिक रचना ऐसी होती है कि वह पेरिटोनियम की सतह पर पड़े सूक्ष्म रक्त नलिकाओं (कैपिलरी) में बहते रक्त को शुद्ध कर देता है। बच्चों में रक्त के शुद्धिकरण के लिए प्रायः इसी विधि का सहारा लिया जाता है। हृदय से कमजोर, बुजुर्ग गुर्दा हास के रोगी, जिनमें हीमोडायलिसिस सम्भव नहीं है, उन्हें लम्बे अरसे तक पेरिटोनियल डायलिसिस पर रखा जा सकता है। इसके लिए उनके पेट में स्थायी रूप से कैथेटर डाल दिया जाता है एवं द्रव्य डालने तथा निकालने का काम मशीन द्वारा किया जाता है। इस अवधि में रोगी अपना कार्य, पठन-पाठन सामान्य रूप से कर सकता है। इस प्रक्रिया को कन्टीन्युअस एम्बुलेटरी पेरिटोनियल डायलिसिस (CAPD, Continuous Ambulatory Peritoneal Dialysis) कहा जाता है।

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